घरेलू शेयर बाजार में लगातार तीसरे दिन गिरावट ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। शुक्रवार को शुरुआती कारोबार में BSE Sensex करीब 800 अंक लुढ़क गया, जबकि Nifty 50 में भी 200 अंकों से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई। तीन दिनों में सेंसेक्स करीब 2,400 अंक टूट चुका है, जो बाजार में बढ़ती अनिश्चितता का संकेत देता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी इसका बड़ा कारण है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 106 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है, जिससे वैश्विक बाजारों पर दबाव बना हुआ है और इसका असर भारतीय बाजार पर भी साफ दिख रहा है।
आज के कारोबार में आईटी सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित रहा। HCL Technologies और Infosys के शेयरों में 2% से अधिक गिरावट आई। इसके अलावा Tata Consultancy Services, Sun Pharmaceutical, ICICI Bank और Bharti Airtel जैसे दिग्गज शेयर भी दबाव में रहे।
हालांकि, कुछ शेयरों ने बाजार को संभालने की कोशिश की। State Bank of India, Mahindra & Mahindra, Hindustan Unilever और IndiGo में हल्की तेजी देखने को मिली।
देश की सबसे वैल्यूएबल कंपनी Reliance Industries आज अपने चौथी तिमाही के नतीजे जारी करने वाली है। रिजल्ट से पहले कंपनी के शेयरों में हल्की गिरावट देखी गई।
बीएसई पर रिलायंस का शेयर करीब 0.5% गिरकर 1334 रुपये तक आ गया। गौर करने वाली बात यह है कि यह स्टॉक जनवरी के अपने उच्च स्तर से करीब 15% नीचे आ चुका है, जिससे निवेशकों की चिंता बढ़ी है।
शेयर बाजार की गिरावट के साथ-साथ भारतीय रुपया भी दबाव में नजर आया। डॉलर के मुकाबले रुपया हल्की गिरावट के साथ 94.21 के स्तर पर खुला, जो विदेशी निवेशकों के रुझान और वैश्विक परिस्थितियों को दर्शाता है।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक वैश्विक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता नहीं आती, तब तक बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। निवेशकों को सतर्क रहने और लंबी अवधि के नजरिए से निवेश करने की सलाह दी जा रही है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
घरेलू शेयर बाजार में शुक्रवार को आईटी सेक्टर में भारी बिकवाली देखने को मिली। एशियाई बाजारों में मजबूती के बावजूद भारतीय बाजार दबाव में रहे और इसका सबसे बड़ा असर आईटी कंपनियों के शेयरों पर दिखाई दिया। निफ्टी आईटी इंडेक्स में करीब 6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि देश की दिग्गज आईटी कंपनियां टीसीएस और इन्फोसिस अपने 52 हफ्तों के निचले स्तर पर पहुंच गईं। इस तेज गिरावट से निवेशकों की कुल संपत्ति में लगभग ₹1.35 लाख करोड़ की कमी दर्ज की गई। टीसीएस और इन्फोसिस को सबसे बड़ा झटका देश की सबसे बड़ी आईटी कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) का शेयर करीब 7 प्रतिशत टूटकर ₹2,060.50 तक पहुंच गया, जो इसका 52 सप्ताह का निचला स्तर है। वहीं इन्फोसिस का शेयर लगभग 9 प्रतिशत की गिरावट के साथ ₹1,030.35 पर पहुंच गया। इस गिरावट से कंपनी के मार्केट कैपिटलाइजेशन में करीब ₹40,000 करोड़ की कमी आई और उसका कुल मार्केट कैप घटकर लगभग ₹3.63 लाख करोड़ रह गया। अन्य आईटी कंपनियों में भी बिकवाली केवल टीसीएस और इन्फोसिस ही नहीं, बल्कि अन्य प्रमुख आईटी कंपनियों के शेयरों में भी भारी दबाव देखने को मिला। विप्रो के शेयर में 4 प्रतिशत से अधिक गिरावट एचसीएल टेक में 5 प्रतिशत से ज्यादा कमजोरी टेक महिंद्रा में भी 5 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आखिर क्यों आई इतनी बड़ी गिरावट? इस बिकवाली की मुख्य वजह ग्लोबल आईटी दिग्गज Accenture का कमजोर आउटलुक माना जा रहा है। कंपनी ने वित्त वर्ष 2026 के लिए अपने राजस्व वृद्धि अनुमान की ऊपरी सीमा को 5 प्रतिशत से घटाकर 4 प्रतिशत कर दिया है। इसके अलावा चौथी तिमाही के लिए कंपनी का राजस्व अनुमान भी बाजार की अपेक्षाओं से कम रहा। इससे निवेशकों के बीच यह चिंता बढ़ गई कि वैश्विक कंपनियां आईटी कंसल्टिंग और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन प्रोजेक्ट्स पर खर्च कम कर सकती हैं। भारतीय आईटी कंपनियों पर क्यों पड़ा असर? भारतीय आईटी कंपनियों का बड़ा कारोबार उत्तरी अमेरिका से आता है। ऐसे में यदि अमेरिकी और वैश्विक कंपनियां तकनीकी सेवाओं पर खर्च घटाती हैं, तो इसका सीधा असर भारतीय आईटी कंपनियों की आय पर पड़ सकता है। इसी आशंका के कारण निवेशकों ने आईटी शेयरों में जमकर बिकवाली की। निफ्टी आईटी इंडेक्स में करीब 6% की गिरावट शुक्रवार के कारोबार में निफ्टी आईटी इंडेक्स सबसे कमजोर सेक्टर इंडेक्स रहा। निवेशकों की चिंता और वैश्विक संकेतों के दबाव में पूरे आईटी सेक्टर में कमजोरी देखने को मिली। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर अमेरिकी बाजार और वैश्विक आईटी खर्च से जुड़े संकेतों पर बनी रहेगी।
मुंबई, एजेंसियां। भारतीय शेयर बाजार ने शुक्रवार को बेहद कमजोर शुरुआत की। शुरुआती कारोबार में भारी बिकवाली के चलते बीएसई सेंसेक्स 750 अंक से अधिक टूटकर 76,700 के करीब पहुंच गया, जबकि एनएसई निफ्टी 24,000 के अहम स्तर से नीचे फिसल गया। बाजार में सबसे ज्यादा दबाव आईटी सेक्टर पर देखने को मिला, जिससे निवेशकों की धारणा कमजोर हुई। आईटी कंपनियों के शेयरों में तेज गिरावट की मुख्य वजह वैश्विक आईटी कंपनी एक्सेंचर द्वारा अपने राजस्व वृद्धि अनुमान में कटौती को माना जा रहा है। इसका असर भारतीय आईटी कंपनियों पर भी दिखा। इंफोसिस के शेयर आठ प्रतिशत से अधिक टूट गए, जबकि टीसीएस, टेक महिंद्रा और एचसीएल टेक में भी चार से छह प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा एचडीएफसी बैंक और टाटा स्टील के शेयर भी दबाव में रहे। हालांकि, एनटीपीसी, भारती एयरटेल, ट्रेंट और पावर ग्रिड जैसे शेयरों ने कुछ मजबूती दिखाई। रुपये में मजबूती और तेल की नरम कीमतों से उम्मीद शेयर बाजार की कमजोरी के बीच विदेशी मुद्रा बाजार से सकारात्मक संकेत मिले। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 10 पैसे मजबूत होकर 84.30 के स्तर पर पहुंच गया। वहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में भी नरमी देखने को मिली, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था और बाजार के लिए राहत की उम्मीद बनी हुई है। बाजार विशेषज्ञों का क्या हैं मानना बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते से पश्चिम एशिया में तनाव कम हो सकता है, जिसका सकारात्मक असर वैश्विक बाजारों पर पड़ेगा। हालांकि, फिलहाल वैश्विक बाजारों की कमजोरी और विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की लगातार बिकवाली भारतीय बाजार पर दबाव बनाए हुए है। विशेषज्ञों का कहना है कि अल्पकाल में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है, लेकिन मजबूत आर्थिक संकेतकों और स्थिर रुपये के चलते लंबी अवधि में बाजार में रिकवरी की संभावना बनी हुई है।
Loan Default News: कर्ज लेकर भुगतान नहीं करने वाले बड़े डिफॉल्टरों पर सरकार अब शिकंजा कसने की तैयारी में है। बैंकों की रिकवरी प्रक्रिया को तेज और प्रभावी बनाने के लिए केंद्र सरकार एक नया सिस्टम विकसित कर रही है, जिससे डिफॉल्टरों की चल संपत्तियों का पता लगाना पहले के मुकाबले कहीं अधिक आसान हो जाएगा। सरकार का उद्देश्य उन मामलों में तेजी लाना है, जहां कर्ज वसूली ट्रिब्यूनल (Debt Recovery Tribunal - DRT) संपत्ति जब्त करने के आदेश जारी करता है, लेकिन संपत्तियों की जानकारी जुटाने में लंबा समय लग जाता है। अभी कैसे होती है वसूली प्रक्रिया? वर्तमान व्यवस्था में बैंक डिफॉल्टरों की चल संपत्तियों जैसे वाहन, मशीनरी और अन्य परिसंपत्तियों की जानकारी जुटाने के लिए DRT के रिकवरी अधिकारियों की मदद लेते हैं। इसके बाद संबंधित अधिकारियों की ओर से संपत्ति अटैच करने के आदेश जारी किए जाते हैं। हालांकि, यह प्रक्रिया काफी जटिल और समय लेने वाली मानी जाती है। क्या है सबसे बड़ी समस्या? बैंकिंग क्षेत्र के अधिकारियों के अनुसार, फिलहाल ऐसी कोई एकीकृत व्यवस्था (Single Window System) मौजूद नहीं है, जहां डिफॉल्टरों की सभी चल संपत्तियों का रिकॉर्ड उपलब्ध हो। अलग-अलग स्रोतों से जानकारी जुटाने में काफी समय खर्च होता है, जिससे वसूली प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है। सरकार का नया प्लान क्या है? सरकार और बैंक मिलकर एक सेंट्रलाइज्ड रिकॉर्ड सिस्टम तैयार कर रहे हैं। इसके तहत डिफॉल्टरों की चल संपत्तियों का एक साझा डेटाबेस बनाया जाएगा, जिससे जरूरत पड़ने पर बैंक तेजी से जानकारी हासिल कर सकेंगे। इसके अलावा बैंक आपस में भी सूचना साझा करने की व्यवस्था विकसित कर रहे हैं, ताकि पारदर्शिता बढ़े और मामलों के निपटारे में तेजी लाई जा सके। लंबित मामलों को जल्द निपटाने पर जोर हाल ही में सरकार ने DRT और DRAT (Debt Recovery Appellate Tribunal) के अधिकारियों के साथ बैठक कर लंबित मामलों के तेजी से निपटारे पर चर्चा की थी। वित्त मंत्रालय के अनुसार: ट्रिब्यूनल्स के इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जाएगा। अधिकारियों के प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। सफल DRT मॉडल को अन्य ट्रिब्यूनलों में भी अपनाया जाएगा। बड़े कर्जदारों पर रहेगा खास फोकस सरकार ने बैंकों को निर्देश दिए हैं कि वे बड़े ऋण वाले मामलों को प्राथमिकता दें, ताकि अधिकतम राशि की वसूली हो सके। इसके साथ ही विवादों के निपटारे के लिए लोक अदालतों के अधिक इस्तेमाल पर भी जोर दिया जा रहा है। 2026 में लगेंगी विशेष लोक अदालतें वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पहले ही घोषणा कर चुकी हैं कि वर्ष 2026 में DRT और DRAT में लंबित मामलों के समाधान के लिए चार विशेष लोक अदालतों का आयोजन किया जाएगा। आंकड़ों के मुताबिक, लंबित मामलों में करीब 71 प्रतिशत ऐसे हैं जिनमें बकाया राशि 100 करोड़ रुपये या उससे अधिक है। डिफॉल्टरों के लिए बढ़ेगी मुश्किल सरकार की इस नई पहल के बाद बड़े कर्जदारों की संपत्तियों को छिपाना आसान नहीं होगा। यदि नया सिस्टम प्रभावी ढंग से लागू होता है, तो बैंकों की रिकवरी क्षमता में सुधार होगा और वर्षों से लंबित मामलों के निपटारे में भी तेजी आने की उम्मीद है।