मुंबई, एजेंसियां। सप्ताह के पहले कारोबारी दिन सोमवार को भारतीय शेयर बाजार ने मजबूत शुरुआत की। पिछले सत्र की गिरावट को पीछे छोड़ते हुए सेंसेक्स 423.30 अंक (0.55%) की बढ़त के साथ 77,226.20 पर खुला, जबकि निफ्टी 119.11 अंक (0.50%) चढ़कर 24,132.20 के स्तर पर पहुंच गया। शुरुआती कारोबार में आई इस तेजी से निवेशकों का भरोसा फिर मजबूत होता नजर आया। आईटी और ऑटो सेक्टर के शेयरों में अच्छी खरीदारी देखने को मिली, जिसमें एचसीएल टेक और मारुति शुरुआती कारोबार के प्रमुख गेनर्स रहे।
बाजार में तेजी के बावजूद निवेशकों की नजर मॉनसून की प्रगति पर बनी हुई है। इस वर्ष जून में अब तक सामान्य से करीब 38 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मॉनसून में और देरी होती है तो खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हो सकती है। इससे खाद्य महंगाई बढ़ने और ग्रामीण मांग कमजोर पड़ने का खतरा रहेगा, जिसका असर देश की अर्थव्यवस्था और कंपनियों की आय पर भी पड़ सकता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजारों का रुख मिला-जुला रहा। जापान का टॉपिक्स इंडेक्स 1.3 फीसदी और ऑस्ट्रेलिया का S&P/ASX 200 0.1 फीसदी की बढ़त के साथ कारोबार करता दिखा। वहीं अमेरिकी S&P 500 फ्यूचर्स में 0.4 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। एशिया में हैंग सेंग 1.3 फीसदी और शंघाई कंपोजिट 0.2 फीसदी कमजोर रहे। इसके अलावा यूरो स्टॉक्स 50 फ्यूचर्स भी 0.3 फीसदी फिसले।
विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल घरेलू बाजार में सकारात्मक माहौल बना हुआ है, लेकिन आने वाले दिनों में बाजार की दिशा मॉनसून की प्रगति, महंगाई के आंकड़ों और वैश्विक बाजारों के रुख पर निर्भर करेगी। ऐसे में निवेशकों को जल्दबाजी से बचते हुए बाजार की चाल पर लगातार नजर बनाए रखने की सलाह दी जा रही है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। भारती एयरटेल ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में मजबूत वित्तीय प्रदर्शन दर्ज किया है। कंपनी का समेकित शुद्ध लाभ सालाना आधार पर 37.3 प्रतिशत बढ़कर ₹8,167 करोड़ पहुंच गया। कंपनी के बेहतर प्रदर्शन में मजबूत ग्राहक आधार, औसत राजस्व प्रति उपयोगकर्ता (ARPU) में सुधार और कारोबार की स्थिर वृद्धि का अहम योगदान रहा। ARPU में सुधार से कंपनी को मिला फायदा भारती एयरटेल के प्रदर्शन में ARPU में लगातार सुधार महत्वपूर्ण रहा है। ARPU यानी प्रति ग्राहक औसत राजस्व बढ़ने से कंपनी की कमाई को मजबूती मिली है। मोबाइल सेवाओं के साथ डिजिटल और अन्य दूरसंचार सेवाओं में भी कंपनी की स्थिति मजबूत बनी हुई है。 कंपनी लगातार बेहतर ग्राहक गुणवत्ता और अधिक मूल्य वाले प्लान पर फोकस कर रही है। इससे प्रति ग्राहक होने वाली कमाई में सुधार देखने को मिल रहा है। ग्राहक आधार बना मजबूत एयरटेल का बड़ा और मजबूत ग्राहक आधार कंपनी की आय का प्रमुख आधार बना हुआ है। कंपनी ने मोबाइल, ब्रॉडबैंड और डिजिटल सेवाओं के क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने पर जोर दिया है。 मोबाइल डेटा की बढ़ती खपत और तेज इंटरनेट सेवाओं की मांग से भी दूरसंचार कारोबार को समर्थन मिल रहा है। 5G सेवाओं के विस्तार ने कंपनी के लिए नए अवसर पैदा किए हैं। टेलीकॉम कारोबार पर निवेशकों की नजर भारती एयरटेल का प्रदर्शन ऐसे समय आया है जब भारतीय दूरसंचार क्षेत्र में कंपनियां ग्राहकों को बेहतर सेवाएं देने के साथ-साथ प्रति ग्राहक राजस्व बढ़ाने पर जोर दे रही हैं। टैरिफ में संभावित बदलाव, 5G नेटवर्क का विस्तार और डिजिटल सेवाओं की बढ़ती मांग आने वाले समय में एयरटेल के वित्तीय प्रदर्शन के लिए महत्वपूर्ण कारक रहेंगे। कंपनी के शेयरों पर भी नजर मुनाफे में 37.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी और मजबूत परिचालन प्रदर्शन से निवेशकों का भरोसा बढ़ सकता है। हालांकि, शेयर बाजार में कंपनी के प्रदर्शन पर वैश्विक संकेतों, बाजार की धारणा और भविष्य की कमाई के अनुमान का भी असर पड़ेगा। कुल मिलाकर, ₹8,167 करोड़ का शुद्ध लाभ भारती एयरटेल की मजबूत वित्तीय स्थिति को दर्शाता है। ARPU में सुधार और ग्राहक आधार में मजबूती कंपनी के आगे के विकास के लिए महत्वपूर्ण आधार बने हुए हैं।
मुंबई, एजेंसियां। PGIM इंडिया म्यूचुअल फंड ने अपने तीन अंतरराष्ट्रीय फंड ऑफ फंड्स में सिस्टमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) और सिस्टमेटिक ट्रांसफर प्लान (STP) के मौजूदा रजिस्ट्रेशन को अस्थायी रूप से निलंबित करने का फैसला किया है। यह बदलाव 7 अगस्त 2026 से लागू होगा। इन तीन फंड्स पर पड़ेगा असर PGIM इंडिया की ओर से जिन योजनाओं में SIP और STP रजिस्ट्रेशन को अस्थायी रूप से रोका गया है, उनमें शामिल हैं: PGIM India Global Equity Opportunities Fund of Fund PGIM India Emerging Markets Equity Fund of Fund PGIM India Global Select Real Estate Securities Fund of Fund इन योजनाओं में पहले से चल रहे SIP और STP रजिस्ट्रेशन पर नए निर्देशों का असर पड़ेगा। 7 अगस्त से लागू होगा फैसला म्यूचुअल फंड हाउस का यह निर्णय 7 अगस्त 2026 से प्रभावी होगा। यानी निवेशकों को इन तीन अंतरराष्ट्रीय योजनाओं में SIP और STP के जरिए निवेश जारी रखने को लेकर नए नियमों का सामना करना पड़ेगा। PGIM इंडिया ने इससे पहले भी अपने अंतरराष्ट्रीय फंड्स में निवेश सीमा और SIP से जुड़े नियमों में बदलाव किए हैं। इन योजनाओं पर विदेशी निवेश से जुड़ी नियामकीय सीमाओं का प्रभाव रहा है। अंतरराष्ट्रीय निवेश पर बढ़ा नियामकीय दबाव भारतीय म्यूचुअल फंड कंपनियों के अंतरराष्ट्रीय फंड्स में निवेश पर SEBI और विदेशी निवेश की निर्धारित सीमाओं से जुड़े नियमों का असर पड़ता है। इसी वजह से कई फंड हाउस समय-समय पर लंपसम निवेश, SIP और STP की सीमा या उपलब्धता में बदलाव करते रहे हैं। PGIM इंडिया का ताजा कदम भी उसके अंतरराष्ट्रीय फंड ऑफ फंड्स में निवेश प्रवाह को नियंत्रित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। निवेशकों के लिए जरूरी है कि वे अपने SIP या STP पर लागू नए नियमों की जानकारी फंड हाउस से जरूर जांच लें। निवेशकों को क्या करना चाहिए जिन निवेशकों का इन तीन योजनाओं में SIP या STP चल रहा है, उन्हें 7 अगस्त 2026 से लागू होने वाले बदलावों को ध्यान से देखना चाहिए। नई SIP/STP व्यवस्था शुरू करने या मौजूदा निवेश में बदलाव करने से पहले संबंधित योजना के आधिकारिक नोटिस और फंड हाउस की जानकारी देखना बेहतर होगा。 यह फैसला निवेश को खत्म करने या फंड से पैसा निकालने का निर्देश नहीं है, बल्कि SIP और STP रजिस्ट्रेशन से जुड़ा अस्थायी बदलाव है।
नई दिल्ली: UPI भुगतान पर संभावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) या शुल्क लगाने की चर्चा के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि डिजिटल भुगतान प्रणाली को मजबूत और टिकाऊ बनाए रखने के लिए उसकी लागत किसी न किसी को वहन करनी ही पड़ती है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि फिलहाल इस मुद्दे पर कोई अंतिम राय बनाना जल्दबाजी होगी और RBI का पूरा ध्यान भुगतान अवसंरचना (Payment Infrastructure) को और मजबूत करने पर है। हाल ही में केंद्र सरकार ने संसद में पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स कानून में संशोधन से जुड़ा एक विधेयक पेश किया है। इस प्रस्ताव के बाद यह अटकलें तेज हो गई हैं कि सरकार भविष्य में 2,000 रुपये से अधिक के UPI कारोबारी लेनदेन पर मर्चेंट फीस लगाने की अनुमति दे सकती है। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह शुल्क 0.25% से 0.40% तक हो सकता है, हालांकि सरकार ने अभी तक इस पर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है। क्या बोले RBI गवर्नर? मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक के बाद मीडिया से बातचीत में संजय मल्होत्रा ने कहा कि इस समय शुल्क लागू करने पर चर्चा करना जल्दबाजी होगी। उन्होंने कहा कि UPI जैसी सार्वजनिक डिजिटल सेवा को लगातार बेहतर बनाने और उसकी क्षमता बढ़ाने के लिए निवेश जरूरी है। उन्होंने कहा कि भले ही शुल्क सीधे तौर पर ग्राहकों से न लिया जाए, लेकिन इसकी लागत किसी न किसी रूप में पहले से ही पूरी अर्थव्यवस्था वहन कर रही है। उनके अनुसार, उपभोक्ता अप्रत्यक्ष रूप से इस खर्च का हिस्सा बनते हैं, भले ही उन्हें यह सीधे दिखाई न दे। सरकार की योजना क्या है? संसद में पेश संशोधन विधेयक में उस कानूनी प्रावधान को बदलने का प्रस्ताव है, जो अब तक UPI ट्रांजैक्शन पर किसी भी प्रकार की मर्चेंट फीस लगाने पर रोक लगाता था। माना जा रहा है कि सरकार बड़े मूल्य के कारोबारी UPI भुगतान पर MDR की अनुमति देने पर विचार कर सकती है। अगर ऐसा होता है, तो शुल्क सीधे ग्राहकों पर नहीं बल्कि व्यापारियों (Merchants) पर लागू होगा। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि व्यापारी भविष्य में इस अतिरिक्त लागत का असर उत्पादों और सेवाओं की कीमतों में जोड़ सकते हैं। UPI के विस्तार पर रहेगा फोकस RBI गवर्नर ने कहा कि केंद्रीय बैंक का लक्ष्य देश में UPI के उपयोग को लगातार बढ़ाना है। उन्होंने बताया कि RBI रोजाना करीब 80 करोड़ UPI ट्रांजैक्शन का लक्ष्य लेकर चल रहा है। ऐसे में किसी भी शुल्क संबंधी निर्णय से पहले यह देखना जरूरी होगा कि उसका डिजिटल भुगतान अपनाने की गति पर क्या प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि UPI के निरंतर विकास, नई तकनीक और सुरक्षित भुगतान व्यवस्था के लिए स्थायी राजस्व स्रोत (Revenue Model) की आवश्यकता है, ताकि इस डिजिटल इकोसिस्टम में निवेश जारी रह सके। फिलहाल क्या बदलेगा? अभी UPI भुगतान पर किसी नए शुल्क की घोषणा नहीं हुई है। सरकार ने केवल कानून में संशोधन का प्रस्ताव रखा है और RBI ने भी स्पष्ट किया है कि इस समय किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। इसलिए फिलहाल आम उपभोक्ताओं के लिए UPI भुगतान पहले की तरह ही जारी रहेगा।