रांची: झारखंड के शहरी इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए पानी से जुड़ी अहम खबर है। राज्य में नया वाटर कनेक्शन लेना आने वाले दिनों में महंगा हो सकता है। शुल्क बढ़ाने की दिशा में नगर निकायों ने समीक्षा शुरू कर दी है और राज्य के 30 नगर निकायों ने पिछले तीन वर्षों की वाटर कनेक्शन और जलापूर्ति व्यवस्था से जुड़ी रिपोर्ट नगर विकास एवं आवास विभाग को सौंप दी है।
इन रिपोर्टों और उपलब्ध आंकड़ों का विभाग स्तर पर अध्ययन किया जा रहा है। हालांकि, अभी नई दरों को अंतिम रूप नहीं दिया गया है और शुल्क में कितनी बढ़ोतरी होगी, इसे लेकर भी कोई आधिकारिक आंकड़ा सामने नहीं आया है।
नगर निकायों का तर्क है कि मौजूदा जलापूर्ति व्यवस्था को बेहतर तरीके से चलाने के लिए अतिरिक्त राजस्व की जरूरत है। पाइपलाइन नेटवर्क के रखरखाव, जलापूर्ति व्यवस्था की निगरानी और नियमित सप्लाई सुनिश्चित करने में लगातार खर्च बढ़ रहा है।
इसके अलावा नए इलाकों तक पाइपलाइन पहुंचाने और जलापूर्ति से जुड़े बुनियादी ढांचे का विस्तार करने के लिए भी अतिरिक्त धन की आवश्यकता है। इसी वजह से वाटर कनेक्शन शुल्क की मौजूदा दरों की समीक्षा की जा रही है।
राज्य के 30 नगर निकायों ने पिछले तीन वर्षों के दौरान वाटर कनेक्शन और जलापूर्ति व्यवस्था से संबंधित आंकड़े और समीक्षा रिपोर्ट विभाग को उपलब्ध करा दी है।
नगर विकास एवं आवास विभाग इन आंकड़ों का विस्तृत अध्ययन कर रहा है। इसी समीक्षा के आधार पर शुल्क में बदलाव को लेकर अंतिम प्रस्ताव तैयार किए जाने की संभावना है।
विभाग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, यदि शुल्क संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है, तो नई दरें राज्य के सभी 49 नगर निकायों में लागू की जा सकती हैं।
इसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ेगा, जो भविष्य में अपने घर या व्यावसायिक प्रतिष्ठान के लिए नया वाटर कनेक्शन लेना चाहते हैं।
फिलहाल यह तय नहीं है कि वाटर कनेक्शन शुल्क में कितनी बढ़ोतरी होगी। विभाग अभी 30 नगर निकायों से मिले आंकड़ों का अध्ययन कर रहा है।
अंतिम दर तय होने से पहले राज्य स्तर पर प्रस्ताव तैयार किया जाएगा और संबंधित प्रक्रिया पूरी की जाएगी। इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि आम उपभोक्ताओं को नया कनेक्शन लेने के लिए कितनी अतिरिक्त राशि चुकानी पड़ेगी।
अगर शुल्क संशोधन को मंजूरी मिलती है, तो शहरी क्षेत्रों में नया पानी कनेक्शन लेने वाले लोगों को मौजूदा दर से अधिक भुगतान करना पड़ सकता है। हालांकि, नगर निकायों का कहना है कि अतिरिक्त राजस्व का इस्तेमाल जलापूर्ति व्यवस्था के रखरखाव और विस्तार में किया जा सकता है।
अब लोगों की नजर नगर विकास एवं आवास विभाग के अंतिम प्रस्ताव और नई दरों पर है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
धनबाद। झारखंड के धनबाद जिले में होमगार्ड बहाली प्रक्रिया अब अंतिम चरण में पहुंच गई है। चयनित 1,096 अभ्यर्थियों के मेडिकल टेस्ट और मूल प्रमाण-पत्रों के सत्यापन की प्रक्रिया 17 अगस्त 2026 से शुरू होगी। जिला प्रशासन की ओर से इसके लिए विस्तृत कार्यक्रम जारी कर दिया गया है। 17 से 31 अगस्त तक चलेगी प्रक्रिया अभ्यर्थियों की मेडिकल जांच, मूल दस्तावेज सत्यापन, पुलिस चरित्र सत्यापन और बॉन्ड निष्पादन की प्रक्रिया 17 से 31 अगस्त तक चलेगी। सत्यापन शिविर धनबाद समाहरणालय परिसर में लगाया जाएगा। अभ्यर्थियों को निर्धारित तारीख के अनुसार सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे के बीच उपस्थित होना होगा। ग्रामीण क्षेत्र के लिए जारी हुआ कार्यक्रम 17 अगस्त को पूर्वी टुंडी के 98 अभ्यर्थियों का सत्यापन होगा। 18 अगस्त को टुंडी और बलियापुर के 98, 19 अगस्त को कलियासोल और बाघमारा के 110 तथा 20 अगस्त को निरसा और गोविंदपुर के 112 अभ्यर्थियों की जांच होगी। इसके बाद 21 अगस्त को तोपचांची के 56 और 22 अगस्त को एग्यारकुंड एवं धनबाद ग्रामीण क्षेत्र के 114 अभ्यर्थियों का मेडिकल और दस्तावेज सत्यापन किया जाएगा। शहरी क्षेत्र के अभ्यर्थियों की जांच 24 अगस्त से शहरी क्षेत्र के अभ्यर्थियों के लिए सत्यापन प्रक्रिया 24 अगस्त से शुरू होगी। 24 अगस्त को शहरी गैर-तकनीकी धनबाद और चिरकुंडा क्षेत्र के 77 अभ्यर्थियों को बुलाया गया है। इसके बाद मेरिट सूची के क्रम के अनुसार अन्य अभ्यर्थियों का सत्यापन किया जाएगा। तकनीकी श्रेणी के अभ्यर्थियों के लिए 29 और 31 अगस्त को मेडिकल जांच एवं दस्तावेज सत्यापन निर्धारित है। अनुपस्थित अभ्यर्थियों को मिलेगा अंतिम मौका निर्धारित तारीख पर उपस्थित नहीं हो पाने वाले अभ्यर्थियों को 1 सितंबर 2026 को अंतिम अवसर दिया जाएगा। प्रशासन ने अभ्यर्थियों से अपने निर्धारित दिन पर सभी जरूरी मूल प्रमाण-पत्रों और संबंधित दस्तावेजों के साथ समाहरणालय परिसर में पहुंचने को कहा है।
रांची। झारखंड में JPSC और JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों का आंदोलन लगातार जारी है। मंगलवार, 11 अगस्त 2026 को छात्रों ने रांची में मौन जुलूस निकालकर परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता और कथित गड़बड़ियों की निष्पक्ष जांच की मांग की। यह प्रदर्शन हालिया पुलिस कार्रवाई के विरोध में भी किया गया। मौन जुलूस के जरिए जताया विरोध छात्रों ने बिना नारेबाजी के मौन जुलूस निकालकर अपना विरोध दर्ज कराया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि भर्ती परीक्षाओं में किसी भी तरह की अनियमितता से मेहनत करने वाले अभ्यर्थियों के भविष्य पर सीधा असर पड़ता है। छात्रों ने परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग की। JPSC-JSSC परीक्षाओं की जांच की मांग आंदोलन कर रहे अभ्यर्थी JPSC और JSSC से जुड़ी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की व्यापक जांच की मांग कर रहे हैं। इसी बीच JPSC प्रारंभिक परीक्षा के 454 सफल अभ्यर्थियों द्वारा सीआईडी को OMR शीट उपलब्ध नहीं कराने का मामला भी सामने आया है, जिसकी जांच चल रही है। सरकार ने 14वीं JPSC परीक्षा रद्द करने का किया ऐलान आंदोलन के बीच झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने विधानसभा में 14वीं JPSC सिविल सेवा परीक्षा रद्द करने की घोषणा की है। मुख्यमंत्री ने दो अन्य JPSC परीक्षाओं को भी रद्द करने और TDPL द्वारा आयोजित परीक्षाओं की जांच शुरू कराने की बात कही है। छात्रों का कहना है कि केवल कुछ परीक्षाओं को रद्द करना पर्याप्त नहीं है और भर्ती प्रक्रिया में भरोसा बहाल करने के लिए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई जरूरी है।
रांची नगर निगम अब शहर में सार्वजनिक शौचालय और शहरी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए जमीन की उपलब्धता सुनिश्चित करने को लेकर लैंड बैंक तैयार करेगा। इसका उद्देश्य जमीन से जुड़े विवाद, दस्तावेजों की कमी और स्थल चयन की अड़चन को पहले ही दूर करना है। इससे करोड़ों रुपये की प्रस्तावित योजनाओं को समय पर धरातल पर उतारने में मदद मिलेगी। 43.25 करोड़ रुपये से बनेंगे सार्वजनिक शौचालय स्वच्छ भारत मिशन 2.0 के तहत राज्य सरकार और नगर विकास एवं आवास विभाग ने रांची नगर निगम को विभिन्न प्रकार के सार्वजनिक शौचालयों के निर्माण के लिए 43.25 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। इसके अलावा निगम क्षेत्र में 47 अर्बन आयुष्मान आरोग्य मंदिर संचालित किए जाने हैं। इन योजनाओं के लिए उपयुक्त जमीन उपलब्ध कराना निगम के सामने बड़ी चुनौती है। इसी को देखते हुए लैंड बैंक तैयार करने का फैसला लिया गया है। हर वार्ड में होगी जमीन की जांच मंगलवार को नगर निगम सभागार में नगर आयुक्त सुशांत गौरव की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में स्थल चयन को लेकर विस्तृत रणनीति बनाई गई। हर वार्ड में अधिकारियों और कर्मचारियों की टीम जाकर संभावित जमीन का निरीक्षण करेगी। सहायक नगर आयुक्त, नगर प्रबंधक, सहायक अभियंता, कनीय अभियंता और राजस्व निरीक्षक को इस काम की जिम्मेदारी दी जाएगी। निरीक्षण के दौरान जमीन की उपलब्धता, उपयोगिता, तकनीकी जरूरत, स्थानीय आपत्तियों और अन्य पहलुओं की जांच की जाएगी। खतियान और डीड समेत सुरक्षित होंगे जरूरी दस्तावेज नगर निगम के प्रस्तावित लैंड बैंक में सिर्फ जमीन की जानकारी दर्ज नहीं होगी, बल्कि उससे जुड़े खतियान, डीड और अन्य आवश्यक दस्तावेजों का भी रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा। इससे भविष्य में किसी सार्वजनिक सुविधा के निर्माण के लिए जमीन तलाशने और उसके दस्तावेजों की जांच में कम समय लगेगा। साथ ही निर्माण शुरू होने के बाद जमीन को लेकर विवाद पैदा होने की आशंका भी कम होगी। स्थानीय लोगों और संगठनों से भी लिया जाएगा सहयोग जमीन के चयन को लेकर स्थानीय स्तर पर होने वाली आपत्तियों के समाधान के लिए एरिया लेवल फेडरेशन और सामुदायिक संगठनों को भी प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा। निगम का प्रयास है कि किसी स्थल पर निर्माण शुरू करने से पहले ही स्थानीय लोगों की आपत्तियों और जमीन से जुड़े विवादों को दूर कर लिया जाए। इससे योजनाओं के क्रियान्वयन में बाद में रुकावट आने की संभावना कम होगी। स्वास्थ्य और स्वच्छता सुविधाओं के विस्तार पर जोर लैंड बैंक तैयार होने के बाद रांची नगर निगम के पास सार्वजनिक सुविधाओं के लिए चिन्हित जमीन का व्यवस्थित रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा। इससे सार्वजनिक शौचालयों के साथ-साथ शहरी स्वास्थ्य केंद्रों जैसी जरूरी सुविधाओं के विस्तार में भी मदद मिलने की उम्मीद है। नगर निगम की योजना है कि जमीन से जुड़ी औपचारिकताएं पहले पूरी कर ली जाएं, ताकि योजना स्वीकृत होने के बाद निर्माण कार्य शुरू करने में अनावश्यक देरी न हो।