लोहरदगा। झारखंड के लोहरदगा जिले के कुड़ू थाना क्षेत्र में एक नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म का मामला सामने आया है। आरोप है कि जंगल से लकड़ी लेकर घर लौट रही नाबालिग को दो युवकों ने रास्ते में जबरन जंगल के अंदर ले जाकर वारदात को अंजाम दिया। घटना के बाद दोनों आरोपी फरार हैं। पुलिस ने नाबालिग की मां की शिकायत पर दोनों के खिलाफ दुष्कर्म और पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है।
पुलिस को दिए आवेदन के मुताबिक, नाबालिग जंगल से लकड़ी लेकर घर लौट रही थी। इसी दौरान रास्ते में दो युवकों ने उसे रोक लिया और कथित तौर पर जबरन जंगल के अंदर करीब आधा किलोमीटर दूर ले गए। वहां दोनों ने उसके साथ दुष्कर्म किया।
आरोपियों ने नाबालिग को घटना के बारे में किसी को बताने पर परिवार को जान से मारने की धमकी भी दी। घटना के बाद डरी-सहमी नाबालिग किसी तरह अपने घर पहुंची और परिजनों को पूरी जानकारी दी।
घटना की जानकारी मिलने के बाद नाबालिग अपनी मां के साथ कुड़ू थाना पहुंची और पुलिस को लिखित शिकायत दी। शिकायत के आधार पर पुलिस ने दोनों आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। पुलिस ने नाबालिग का मेडिकल परीक्षण भी कराया है।
घटना के बाद पीड़िता और उसका परिवार भय के माहौल में है। परिजनों ने पुलिस पर भरोसा जताते हुए दोनों आरोपियों की जल्द गिरफ्तारी की मांग की है।
कुड़ू थाना प्रभारी अजीत कुमार ने बताया कि मामले की जांच शुरू कर दी गई है। आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए उनके संभावित ठिकानों पर छापेमारी की जा रही है। पुलिस का कहना है कि दोनों आरोपियों को जल्द गिरफ्तार कर लिया जाएगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
रांची: जेपीएससी-जेएसएससी परीक्षाओं में सुधार, कथित अनियमितताओं की जांच और लंबित मांगों को लेकर छात्रों का आंदोलन 23वें दिन भी जारी है. रांची के जयपाल सिंह स्टेडियम में जुटे अभ्यर्थियों के बीच मुख्यमंत्री आवास के प्रस्तावित घेराव और मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर चर्चा तेज है. हालांकि, आंदोलन से जुड़े कई छात्रों ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य सरकार गिराना या टकराव पैदा करना नहीं, बल्कि भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और अपने भविष्य को लेकर ठोस समाधान हासिल करना है. छात्रों का कहना है कि सरकार यदि उनकी प्रमुख मांगों पर सकारात्मक फैसला लेती है, तो वे आंदोलन खत्म कर दोबारा अपनी पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लौटना चाहते हैं. सीएम पर भरोसा, बातचीत से समाधान की उम्मीद जेपीएससी-जेएसएससी रिफॉर्म मंच से जुड़े अभ्यर्थी राजेश ने कहा कि छात्रों को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर भरोसा है. उन्होंने मुख्यमंत्री से अपील की कि सरकार आंदोलनरत छात्रों के साथ दोबारा संवाद करे और उनकी मांगों पर ठोस निर्णय ले. राजेश के मुताबिक, पिछले 23 दिनों से छात्र आंदोलन कर रहे हैं और लगातार समय बीतने के कारण अभ्यर्थियों में निराशा बढ़ रही है. उन्होंने कहा कि छात्र टकराव नहीं चाहते, बल्कि बातचीत के माध्यम से समाधान चाहते हैं. तिरंगा यात्रा से दिया एकजुटता का संदेश राजेश ने बताया कि स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर छात्रों ने तिरंगा यात्रा निकालकर अपनी एकजुटता का संदेश दिया. उनका कहना है कि छात्र किसी तरह की हिंसा या गलत कदम उठाने के पक्ष में नहीं हैं. उन्होंने कहा कि यदि मुख्यमंत्री खुद छात्रों से बातचीत कर उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय लेते हैं, तो यही छात्र उनके सम्मान में विशाल आभार मार्च निकाल सकते हैं. यहां तक कि आने वाले चुनाव में भी मुख्यमंत्री के समर्थन की बात छात्र कर सकते हैं. सीजीएल परीक्षा रद्द करने की मांग क्यों? जेएसएससी सीजीएल परीक्षा को रद्द करने की मांग पर राजेश ने कहा कि छात्रों का आंदोलन केवल आरोपों पर आधारित नहीं है. उनका दावा है कि परीक्षा से जुड़े कुछ तथ्य जांच एजेंसियों की कार्रवाई के दौरान सामने आये हैं. उन्होंने नेपाल एंगल, अभय तिवारी प्रकरण समेत अन्य मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि जब जांच के दौरान कुछ तथ्य सामने आये हैं, तो छात्रों की ओर से परीक्षा रद्द करने की मांग को पूरी तरह गलत नहीं कहा जा सकता. 'मुख्यमंत्री का इस्तीफा समाधान नहीं' 11वीं से 13वीं जेपीएससी परीक्षा से जुड़े याचिकाकर्ता और जेपीएससी-जेएसएससी न्याय मंच के सदस्य प्रेम कुमार ने कहा कि छात्र मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का इस्तीफा नहीं चाहते. उन्होंने मुख्यमंत्री के स्वतंत्रता दिवस संबोधन का जिक्र करते हुए कहा कि छात्रों और परीक्षा सुधार के मुद्दे पर मुख्यमंत्री ने संवेदनशीलता दिखाई है. प्रेम कुमार के अनुसार, यदि व्यवस्था में अधिकारियों के स्तर पर गड़बड़ी है, तो केवल सरकार बदलने से समस्या खत्म नहीं होगी. इसलिए छात्रों की मांग किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि व्यवस्था में सुधार के लिए है. CBI जांच या परीक्षा रद्द करने पर ठोस फैसला मांगा प्रेम कुमार ने सरकार से जेएसएससी सीजीएल समेत विवादित परीक्षाओं के मामले में सीबीआई जांच या परीक्षा रद्द करने को लेकर स्पष्ट फैसला लेने की मांग की. उन्होंने कहा कि यदि सरकार इन मुद्दों पर ठोस पहल करती है, तो मुख्यमंत्री आवास के घेराव जैसे कार्यक्रमों को भी टाला जा सकता है. छात्रों ने कुछ तत्काल मांगों को पूरा करने की भी अपील की है. इनमें— जेपीएससी की कॉपियां दिखाना जेएसएससी का स्कोरकार्ड उपलब्ध कराना कटऑफ जारी करना छात्रों की मांगों पर सरकार की स्थिति स्पष्ट करना श्वेत पत्र जारी करना शामिल हैं. 2000 पदों पर नई CGL भर्ती की मांग प्रेम कुमार ने कहा कि कथित पेपर लीक के कारण कई छात्रों का एक अवसर प्रभावित हुआ है. ऐसे में सरकार को कम से कम 2000 पदों पर जेएसएससी सीजीएल की नई भर्ती शुरू करनी चाहिए. इसके साथ ही उन्होंने जेपीएससी में कम से कम 300 पदों पर अधियाचना निकालने और प्रभावित अभ्यर्थियों को उम्र सीमा में राहत देने की मांग की. उनका कहना है कि सरकार इन मांगों पर पहल करती है, तो छात्र आंदोलन खत्म कर अपनी पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी पर लौट सकते हैं. 'मुख्यमंत्री बड़े भाई, गलत नहीं होने देंगे' अभ्यर्थी रामवतार ने कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन छात्रों के लिए बड़े भाई की तरह हैं. उन्होंने कहा कि उन्हें भरोसा है कि मुख्यमंत्री छात्रों के साथ गलत नहीं होने देंगे. रामवतार के मुताबिक, सरकार और छात्रों के बीच पहले तीन दौर की बातचीत हो चुकी है और कई मांगों पर सहमति भी बनी थी. कुछ मांगों पर सरकार ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर होने की बात कही थी और विचार-विमर्श के लिए समय मांगा था. हालांकि, उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ कोचिंग माफिया की वजह से बातचीत की प्रक्रिया प्रभावित हुई. आंदोलन में बाहरी लोगों के शामिल होने का आरोप रामवतार ने कहा कि आंदोलन छात्रों का है और इसे छात्रों को ही चलाने देना चाहिए. उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ बाहरी लोग आंदोलन में शामिल होकर छात्रों को भड़काने या आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि आंदोलन समाप्त होने के बाद ऐसे लोगों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए. छात्रों का कहना है कि उनका आंदोलन शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से चल रहा है और उनका उद्देश्य न तो हिंसा करना है और न ही सरकार गिराना. 'छात्र तलवार नहीं, कलम उठाने वाले हैं' अभ्यर्थी रवि ने कहा कि छात्रों को भड़काने की कोशिश की जा रही है, लेकिन आंदोलनकारी छात्र किसी हिंसक गतिविधि का हिस्सा नहीं बनना चाहते. उन्होंने कहा, छात्र पढ़ाई करने वाले हैं और कलम के जरिए अपना भविष्य बनाने में विश्वास रखते हैं. रवि ने मुख्यमंत्री से जेएसएससी सीजीएल और 11वीं से 13वीं जेपीएससी परीक्षा के मामले में परीक्षा रद्द करने या सीबीआई जांच कराने की मांग दोहरायी. उन्होंने सरकार से छात्रों के प्रतिनिधिमंडल को दोबारा बुलाकर बातचीत शुरू करने की अपील की. साथ ही टीजीटी, पीजीटी, आशुलिपिक और एलडीसी समेत अन्य लंबित मांगों पर भी स्पष्ट निर्णय लेने की मांग की. 23 दिन बाद भी आंदोलन जारी, छात्रों को अब समाधान का इंतजार लगातार 23 दिनों से आंदोलन कर रहे छात्रों का कहना है कि बारिश, धूप और गर्मी के बीच धरना जारी रखना मुश्किल होता जा रहा है. आंदोलन स्थल पर भोजन-पानी की समस्या और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां भी सामने आ रही हैं. छात्रों का कहना है कि वे अपना समय आंदोलन में नहीं, बल्कि पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगाना चाहते हैं. इसलिए सरकार को अब बातचीत का रास्ता खोलकर उनकी प्रमुख मांगों पर ठोस निर्णय लेना चाहिए. सरकार फैसला ले तो 'घेराव' की जगह 'आभार यात्रा' छात्रों ने साफ संकेत दिया है कि वे टकराव नहीं चाहते. उनका कहना है कि यदि सरकार उनकी प्रमुख मांगों पर सकारात्मक फैसला लेती है, तो 20 अगस्त के मुख्यमंत्री आवास घेराव जैसे कार्यक्रम को टाला जा सकता है. छात्रों का कहना है कि अगर सरकार उनके भविष्य को लेकर ठोस कदम उठाती है, तो वे आंदोलन समाप्त कर पढ़ाई पर लौटेंगे और मुख्यमंत्री के सम्मान में 'आभार यात्रा' भी निकालेंगे.
रांची: सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुख ऊर्जा कंपनी गेल (इंडिया) लिमिटेड ने अपने कर्मचारियों को बड़ी राहत दी है. कंपनी ने वाहन अग्रिम यानी व्हीकल एडवांस की अधिकतम सीमा में बढ़ोतरी की है. अब वरिष्ठ अधिकारियों को पर्यावरण-अनुकूल सीएनजी और पूरी तरह इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने के लिए 30 लाख रुपये तक का वाहन अग्रिम मिल सकेगा. नई व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से लागू किया गया है. कंपनी के कॉर्पोरेट एचआर विभाग की ओर से जारी सर्कुलर में अलग-अलग ग्रेड के कर्मचारियों के लिए पेट्रोल-डीजल, हाइब्रिड तथा सीएनजी-इलेक्ट्रिक वाहनों की पात्रता राशि में संशोधन किया गया है. खास बात यह है कि ग्रीन व्हीकल को बढ़ावा देने के लिए सीएनजी और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए कई ग्रेड में पेट्रोल-डीजल वाहनों की तुलना में अधिक राशि निर्धारित की गयी है. वरिष्ठ अधिकारियों को मिलेगा सबसे ज्यादा वाहन अग्रिम सर्कुलर के अनुसार ई-9 और उससे ऊपर के ग्रेड के अधिकारियों के लिए पेट्रोल, डीजल और हाइब्रिड वाहनों की अधिकतम पात्रता राशि 22 लाख से बढ़ाकर 29 लाख रुपये कर दी गयी है. वहीं सीएनजी और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए यह सीमा बढ़ाकर 30 लाख रुपये कर दी गयी है. ई-8 ग्रेड के अधिकारियों को पेट्रोल-डीजल वाहनों के लिए 26.50 लाख रुपये और सीएनजी-इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए 27.50 लाख रुपये तक का वाहन अग्रिम मिलेगा. ई-5 और ई-6 ग्रेड में भी बढ़ी सीमा मिड-लेवल मैनेजमेंट के कर्मचारियों के लिए भी वाहन अग्रिम की सीमा में बदलाव किया गया है. ई-6 ग्रेड: पेट्रोल-डीजल के लिए 21 लाख, सीएनजी-इलेक्ट्रिक के लिए 22 लाख रुपये ई-5 ग्रेड: पेट्रोल-डीजल के लिए 20 लाख, सीएनजी-इलेक्ट्रिक के लिए 21 लाख रुपये ई-4 ग्रेड: पेट्रोल-डीजल के लिए 18 लाख, सीएनजी-इलेक्ट्रिक के लिए 19 लाख रुपये ई-0/ई-1 ग्रेड: पेट्रोल-डीजल के लिए 12 लाख, सीएनजी-इलेक्ट्रिक के लिए 13 लाख रुपये इस बदलाव से कर्मचारियों को अपनी पसंद के वाहन खरीदने में पहले की तुलना में अधिक वित्तीय सहायता मिल सकेगी. गैर-कार्यकारी कर्मचारियों को भी फायदा गेल ने केवल अधिकारियों तक ही यह सुविधा सीमित नहीं रखी है. गैर-कार्यकारी कर्मचारियों के एस-3 से एस-7 ग्रेड में भी वाहन अग्रिम की सीमा बढ़ायी गयी है. एस-7 ग्रेड के कर्मचारियों को अब अधिकतम 9 लाख रुपये तक वाहन अग्रिम मिल सकेगा. वहीं निचले ग्रेड के कर्मचारियों के लिए भी पात्रता राशि बढ़ाकर 2 लाख से 2.50 लाख रुपये तक की गयी है. ग्रीन व्हीकल को बढ़ावा देने की कोशिश गेल के इस फैसले में पर्यावरण-अनुकूल वाहनों को बढ़ावा देने पर खास जोर दिया गया है. कंपनी ने सीएनजी, हाइब्रिड और पूरी तरह इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए अधिक वित्तीय सहायता का प्रावधान किया है. कंपनी के अनुसार, हाइब्रिड वाहन की श्रेणी में ऐसे पेट्रोल या डीजल वाहन शामिल होंगे, जिनमें इलेक्ट्रिक मोटर और बैटरी पैक भी मौजूद हो. तत्काल प्रभाव से लागू हुआ नया नियम सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के बाद सीजीएम (एचआर-पॉलिसी एंड ईआर) भरत मेहता की ओर से इस संबंध में आदेश जारी किया गया है. नई व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से लागू करने के लिए एसएपी-एचआर मॉड्यूल में भी आवश्यक बदलाव किये जा रहे हैं. हालांकि वाहन अग्रिम से जुड़े कंपनी के अन्य नियम और शर्तें पहले की तरह ही लागू रहेंगी.
रांची: JPSC-JSSC परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के विरोध में छात्रों का आंदोलन 22वें दिन भी जारी रहा। आंदोलनकारी छात्रों ने अल्बर्ट एक्का चौक पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, कांग्रेस नेता राहुल गांधी और राजद नेता तेजस्वी यादव का सांकेतिक पुतला दहन कर विरोध जताया। छात्रों ने सरकार को 18 अगस्त तक का अल्टीमेटम दिया है। मांगों पर ठोस समाधान नहीं निकलने पर 20 अगस्त को मुख्यमंत्री आवास के घेराव की चेतावनी दी गयी है। JSSC CGL रद्द करने और CBI जांच की मांग आंदोलन कर रहे छात्रों की प्रमुख मांगों में JSSC CGL परीक्षा रद्द करना और पूरे मामले की CBI जांच कराना शामिल है। छात्रों का कहना है कि भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों को लेकर कई बार सरकार के सामने अपनी मांगें रखी गयी हैं, लेकिन अब तक उन्हें संतोषजनक समाधान नहीं मिला है। वहीं, सरकार की ओर से कई मांगें स्वीकार किये जाने की बात कही गयी है। इसी मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बना हुआ है। 18 अगस्त तक समाधान नहीं तो 20 को घेराव छात्र नेताओं ने कहा कि सरकार के पास अब 18 अगस्त तक का समय है। इस दौरान यदि सरकार बातचीत कर उनकी मांगों पर ठोस निर्णय लेती है, तो आंदोलन को समाप्त करने पर विचार किया जा सकता है। लेकिन अगर कोई समाधान नहीं निकला, तो 20 अगस्त को मुख्यमंत्री आवास का घेराव किया जाएगा। पुतला दहन कर जताया विरोध छात्रों ने पुतला दहन के जरिए सरकार और सत्तारूढ़ गठबंधन के नेताओं के खिलाफ अपना आक्रोश जताया। इससे पहले आंदोलनकारी छात्र मौन मार्च, तिरंगा यात्रा और धरना समेत कई कार्यक्रम आयोजित कर चुके हैं। प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच की मांग दोहरायी। आंदोलन स्थल पर पहुंच रहे प्रशासनिक अधिकारी लगातार जारी प्रदर्शन के बीच प्रशासनिक अधिकारियों की भी आंदोलन स्थल पर आवाजाही हो रही है। एसडीएम, एडीएम और एएसपी स्तर के अधिकारी छात्रों से बातचीत कर स्थिति का जायजा लेते रहे हैं। छात्रों की ओर से भी कहा गया है कि बातचीत के जरिए ही इस विवाद का समाधान संभव है। श्वेत पत्र जारी करने की भी मांग आंदोलनकारियों की ओर से सरकार से श्वेत पत्र जारी करने की मांग भी की गयी है। इसमें छात्रों की ओर से पहले दी गयी मांगों और उन पर सरकार की ओर से की गयी कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक करने की बात कही गयी है। इसके साथ ही JSSC CGL की करीब 2000 सीटों पर नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने और JPSC की कुछ सीटों पर उम्र सीमा में राहत देने का सुझाव भी सामने आया है। अब 18 अगस्त पर टिकी नजर 22 दिनों से जारी आंदोलन के बीच बारिश और धूप के बावजूद छात्र धरना स्थल पर डटे हुए हैं। कुछ छात्रों के स्वास्थ्य प्रभावित होने की बात भी सामने आयी है। ऐसे में अब सभी की नजर 18 अगस्त की समयसीमा और सरकार-छात्रों के बीच संभावित बातचीत पर है। यदि बातचीत से समाधान नहीं निकला, तो 20 अगस्त को प्रस्तावित मुख्यमंत्री आवास घेराव आंदोलन का अगला बड़ा चरण हो सकता है।