रांची: दिव्यांगजनों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए सहायक उपकरणों की सुविधा अब पहले के मुकाबले और आसान होने जा रही है. भारतीय कृत्रिम अंग निर्माण निगम (एलिम्को) ने रांची के हिनू में अपना नया पूर्वी क्षेत्रीय कार्यालय शुरू किया है. सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अधीन संचालित यह कार्यालय पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के 13 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के दिव्यांगजनों और वरिष्ठ नागरिकों को सहायक उपकरण और पुनर्वास सेवाएं उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा.
एलिम्को के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक प्रवीण कुमार ने बताया कि रांची में क्षेत्रीय कार्यालय शुरू होने से जरूरतमंद लोगों को सहायक उपकरण प्राप्त करने के लिए दूर-दराज की यात्रा नहीं करनी पड़ेगी. पहले कई मामलों में लोगों को अपनी जरूरतों और सेवाओं के लिए कानपुर स्थित एलिम्को मुख्यालय तक जाना पड़ता था. अब रांची से ही अधिकांश सेवाओं को उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जायेगी.
नये क्षेत्रीय कार्यालय के माध्यम से दिव्यांगजनों और वरिष्ठ नागरिकों तक कृत्रिम अंग, व्हीलचेयर और अन्य सहायक उपकरणों की पहुंच आसान बनाने पर जोर दिया जायेगा. यूडीआइडी (यूनिक डिसएबिलिटी आइडी) कार्डधारकों को प्राथमिकता के आधार पर लाभ देने की योजना है.
एलिम्को का उद्देश्य सिर्फ उपकरण उपलब्ध कराना ही नहीं, बल्कि लाभार्थियों को उपकरण के इस्तेमाल, रखरखाव और जरूरत पड़ने पर आफ्टर-सेल्स सपोर्ट उपलब्ध कराना भी है. इससे ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले दिव्यांगजनों को विशेष फायदा मिलने की उम्मीद है.
एलिम्को के पूर्वी क्षेत्रीय प्रमुख अनुपम प्रकाश ने कहा कि रांची की भौगोलिक स्थिति पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण है. यहां से कई राज्यों तक सेवाओं का संचालन और समन्वय अपेक्षाकृत आसान होगा.
क्षेत्रीय कार्यालय के माध्यम से सहायक उपकरणों की आपूर्ति, पुनर्वास सेवाएं, आफ्टर-सेल्स सपोर्ट और राज्य सरकारों के साथ समन्वय को मजबूत किया जायेगा. इससे दिव्यांगजनों को अपनी जरूरत के अनुसार सेवाएं प्राप्त करने में कम समय लगेगा.
एलिम्को के अनुसार, नये कार्यालय का सेवा दायरा करीब 277 करोड़ रुपये का होगा. इसके तहत लगभग 2.50 लाख दिव्यांगजनों और वरिष्ठ नागरिकों तक उच्च गुणवत्ता वाले सहायक उपकरण पहुंचाने में मदद मिलेगी.
झारखंड की बात करें तो अब तक राज्य में करीब 46.79 करोड़ रुपये की लागत से 1.29 लाख से अधिक सहायक उपकरण वितरित किये जा चुके हैं. इनमें व्हीलचेयर समेत दिव्यांगजनों और बुजुर्गों के दैनिक जीवन को आसान बनाने वाले कई तरह के उपकरण शामिल हैं.
कार्यक्रम के दौरान एलिम्को से उपकरण प्राप्त करने वाले लाभार्थियों ने अपने अनुभव भी साझा किये. पलामू के विनय प्रसाद को व्हीलचेयर मिलने के बाद उनके लिए आने-जाने में काफी सुविधा हुई. वहीं रामगढ़ की 70 वर्षीय जेठनी देवी को व्हीलचेयर के साथ घुटने और कमर के बेल्ट उपलब्ध कराये गये, जिससे उन्हें रोजमर्रा के काम करने में राहत मिली.
लाभार्थियों के अनुभवों से यह भी सामने आया कि सही सहायक उपकरण मिलने से दिव्यांगजनों और बुजुर्गों की न केवल शारीरिक गतिविधियां आसान होती हैं, बल्कि उनकी आत्मनिर्भरता और जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार होता है.
एलिम्को का पूर्वी क्षेत्रीय कार्यालय शुरू होने से झारखंड समेत आसपास के राज्यों में दिव्यांगजनों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए सरकारी सहायता और पुनर्वास सेवाओं की पहुंच बेहतर होने की उम्मीद है. स्थानीय स्तर पर कार्यालय उपलब्ध होने से लाभार्थियों को जानकारी, उपकरण और बाद की सेवाओं के लिए लंबी दूरी तय करने की जरूरत कम होगी.
नये कार्यालय को पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में दिव्यांगजनों के लिए सहायक उपकरणों की उपलब्धता बढ़ाने और पुनर्वास सेवाओं को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
धनबाद: कतरास के छाताबाद फुटबॉल मैदान के पास शुक्रवार शाम अचानक हुए भीषण भू-धंसान से इलाके में हड़कंप मच गया. तेज आवाज के साथ जमीन धंसने लगी और देखते ही देखते आधा दर्जन से अधिक आवास इसकी चपेट में आ गये. कई घर पूरी तरह जमीन में समा गये, जबकि एक स्थानीय सड़क भी धंस गयी. घटना के बाद इलाके में दहशत का माहौल है. अचानक धंसी जमीन, करीब 150 मीटर का इलाका प्रभावित जानकारी के अनुसार, शुक्रवार शाम करीब चार बजे छाताबाद फुटबॉल मैदान के पास अचानक भू-धंसान शुरू हुई. जमीन धंसने का दायरा करीब 150 मीटर बताया जा रहा है. देखते ही देखते आसपास के कई घर इसकी चपेट में आ गये. स्थानीय सड़क का एक हिस्सा भी धंस गया, जिससे इलाके में आवाजाही प्रभावित हो गयी. जोरदार आवाज के साथ जमीन में समा गया मकान भू-धंसान इतनी तेजी से हुई कि लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिला. एक दोमंजिला मकान जमीन धंसने के कारण एक मंजिल का रह गया. वहीं आसपास के कई मकानों की दीवारों में चौड़ी दरारें पड़ गयी हैं. सामने का मैदान भी करीब 20 फीट नीचे धंस गया है. स्थानीय महिला हुस्ना बानो के अनुसार, परिवार के लोग खाना खाने के बाद घर में आराम कर रहे थे. इसी दौरान अचानक जोरदार आवाज हुई और जमीन धंसने लगी. देखते ही देखते घर का हिस्सा भी इसकी चपेट में आ गया. घर में फंसे आठ लोगों को ग्रामीणों ने निकाला भू-धंसान के दौरान एक घर में करीब आठ लोग फंस गये. दीवार गिरने से कुछ लोगों को चोट भी लगी. घटना के बाद आसपास के लोग तुरंत मौके पर पहुंचे और बचाव कार्य शुरू किया. स्थानीय लोगों ने एक-एक कर सभी आठ लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला. हादसे के बाद प्रभावित परिवारों के सामने रहने की समस्या खड़ी हो गयी है. कई परिवारों को अपना घर छोड़कर खुले आसमान के नीचे रहना पड़ रहा है. पुलिस ने प्रभावित क्षेत्र में लगायी बैरिकेडिंग घटना की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने प्रभावित इलाके की बैरिकेडिंग कर दी है. सुरक्षा के मद्देनजर लोगों की आवाजाही पर रोक लगा दी गयी है. प्रशासन और पुलिस की ओर से लोगों से अपील की गयी है कि वे धंसे हुए क्षेत्र के आसपास न जाएं. कतरास क्षेत्र में लगातार सामने आ रही भू-धंसान की घटनाओं को लेकर स्थानीय लोगों में पहले से ही चिंता और आक्रोश है. इस घटना के बाद लोगों की सुरक्षा को लेकर सवाल और गंभीर हो गये हैं.
धनबाद: कोयला भवन मुख्यालय में शुक्रवार को भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल) की वार्षिक आम बैठक आयोजित की गयी. बैठक में कंपनी के वित्तीय वर्ष 2025-26 के प्रदर्शन की समीक्षा के साथ भविष्य की रणनीति और विकास योजनाओं पर विस्तार से चर्चा हुई. इस दौरान बीसीसीएल के सीएमडी मनोज कुमार अग्रवाल ने कहा कि “बीसीसीएल है तो धनबाद है.” कंपनी मजबूत होगी तो धनबाद भी मजबूत होगा. उन्होंने कंपनी के विकास के लिए जनप्रतिनिधियों, जिला प्रशासन और सभी हितधारकों से सहयोग की अपील की. उत्पादन बढ़ाने और आधुनिक तकनीक पर जोर सीएमडी ने कहा कि आने वाले वर्षों में बीसीसीएल का मुख्य फोकस कोयला उत्पादन बढ़ाने के साथ खनन कार्यों को आधुनिक तकनीक से लैस करने पर रहेगा. कंपनी की कोल वाशरी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने, डिजिटल तकनीक का विस्तार करने और परिचालन क्षमता में सुधार पर भी विशेष ध्यान दिया जायेगा. उन्होंने कहा कि बदलते समय के साथ खनन क्षेत्र में तकनीकी बदलाव जरूरी है. आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से उत्पादन बढ़ाने के साथ सुरक्षा मानकों को भी बेहतर किया जा सकता है. सुरक्षा और पर्यावरण पर भी रहेगा फोकस बैठक में खनन क्षेत्रों में सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात कही गयी. इसके साथ ही पर्यावरणीय स्थिरता और सतत विकास को लेकर भी कंपनी की योजनाओं पर चर्चा हुई. सीएमडी ने कहा कि उत्पादन बढ़ाने के साथ पर्यावरण संरक्षण और सुरक्षित खनन व्यवस्था सुनिश्चित करना कंपनी की प्राथमिकताओं में शामिल है. शेयरधारकों के सवालों का दिया जवाब वार्षिक आम बैठक के दौरान शेयरधारकों ने कंपनी के प्रदर्शन, भविष्य की योजनाओं और विकास से जुड़े कई सवाल पूछे. सीएमडी ने उनके सवालों का जवाब देते हुए कंपनी की भावी रणनीति और विभिन्न विकास परियोजनाओं की जानकारी दी. उन्होंने पारदर्शी कॉरपोरेट गवर्नेंस, परिचालन उत्कृष्टता और सतत विकास के प्रति कंपनी की प्रतिबद्धता दोहरायी. उन्होंने कहा कि बीसीसीएल के विकास में सभी हितधारकों की भागीदारी महत्वपूर्ण है. कई वरिष्ठ अधिकारी रहे मौजूद बैठक में कोयला मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव सनोज कुमार झा और कोल इंडिया के निदेशक (मार्केटिंग) मुकेश चौधरी वर्चुअल माध्यम से शामिल हुए. वहीं बीसीसीएल के निदेशक (एचआर) मुरली कृष्ण रमैया, डीटी (ऑपरेशन) संजय कुमार सिंह, डीटी (पीएंडपी) राजीव कुमार सिन्हा, निदेशक (वित्त) राजेश कुमार समेत मुख्यालय और विभिन्न क्षेत्रों के महाप्रबंधक, वरिष्ठ अधिकारी और कंपनी के शेयरधारक मौजूद रहे. बैठक में कंपनी के मौजूदा प्रदर्शन की समीक्षा के साथ आने वाले वर्षों में उत्पादन, तकनीक, सुरक्षा, पर्यावरण और वित्तीय मजबूती को लेकर रोडमैप पर जोर दिया गया.
जमशेदपुर: पूर्वी सिंहभूम के पटमदा थाना क्षेत्र के बटालुका जंगल में शनिवार सुबह नक्सली अभियान के दौरान उस समय स्थिति तनावपूर्ण हो गयी, जब ग्रामीणों ने पुलिस और कोबरा बटालियन के जवानों को घेर लिया. करीब दो घंटे तक ग्रामीणों ने अभियान दल को घेरे रखा. ग्रामीण पहले पूछताछ के लिए ले जाये गये युधिष्ठिर महतो और अन्य ग्रामीणों को छोड़ने की मांग कर रहे थे. जानकारी के अनुसार, पटमदा थाना की पुलिस और कोबरा बटालियन की टीम शनिवार सुबह करीब सात बजे बटालुका जंगल में नक्सल विरोधी अभियान के लिए निकली थी. इसी दौरान ग्रामीणों को जानकारी मिली कि पुलिस कुछ लोगों को पूछताछ के लिए अपने साथ ले गयी है. इसके बाद बड़ी संख्या में ग्रामीण एकजुट हो गये और अभियान दल को घेर लिया. युधिष्ठिर महतो को घर से ले जाने का आरोप ग्रामीणों का आरोप है कि बुधवार को पुलिस बटालुका गांव निवासी युधिष्ठिर महतो को उसके घर से पूछताछ के लिए थाना ले गयी थी. ग्रामीणों के मुताबिक, कई दिन बीतने के बाद भी उसे वापस नहीं छोड़ा गया था. शनिवार को अभियान के दौरान कुछ अन्य ग्रामीणों को भी पूछताछ के लिए ले जाने की बात सामने आयी, जिसके बाद ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ गयी. ग्रामीणों ने पुलिस के सामने मांग रखी कि जब तक युधिष्ठिर महतो और पूछताछ के लिए ले जाये गये अन्य ग्रामीणों को नहीं छोड़ा जाता, तब तक अभियान दल को गांव से आगे नहीं जाने दिया जायेगा. ग्रामीणों ने पुलिस पर लगाया परेशान करने का आरोप ग्रामीणों का कहना था कि पुलिस लगातार नक्सलियों की तलाश में अभियान चला रही है, लेकिन सफलता नहीं मिलने पर गांव के लोगों को पूछताछ के नाम पर परेशान किया जा रहा है. इसी नाराजगी के कारण ग्रामीणों ने अभियान दल को घेरने का फैसला किया. स्थिति को देखते हुए पुलिस अधिकारियों ने ग्रामीणों से बातचीत कर उन्हें समझाने का प्रयास किया. करीब दो घंटे तक चले गतिरोध के बाद वरीय अधिकारियों के निर्देश पर युधिष्ठिर महतो और अन्य ग्रामीणों को छोड़ दिया गया. इसके बाद ग्रामीणों ने पुलिस और कोबरा जवानों को आगे जाने दिया. इसके बाद भी जारी रहा पुलिस का अभियान ग्रामीणों के साथ गतिरोध खत्म होने के बाद पुलिस और कोबरा बटालियन की टीम फिर से बटालुका गांव की ओर रवाना हुई. इलाके में नक्सल गतिविधियों को देखते हुए पुलिस की ओर से अभियान जारी रखा गया. फिलहाल पूरे मामले में पुलिस की ओर से आधिकारिक तौर पर विस्तृत जानकारी सामने नहीं आयी है. ग्रामीणों द्वारा पूछताछ के लिए लोगों को ले जाने और बाद में छोड़े जाने को लेकर लगाये गये आरोपों की भी पुष्टि आधिकारिक स्तर पर होना बाकी है.