चंडीगढ़, एजेंसियां। हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के लाडवा उपमंडल से एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है, जहां एक कैंसर पीड़ित युवक ने पुलिसकर्मियों पर थाने के अंदर मारपीट और सामूहिक दुष्कर्म का आरोप लगाया है। इस घटना के बाद पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया है और मामले की जांच शुरू कर दी गई है।
पीड़ित युवक, जो निजी बैंक में कार्यरत है और वर्तमान में एलएनजेपी अस्पताल में इलाजरत है, ने अपने बयान में आरोप लगाया कि 17 जून की रात वह ड्यूटी से घर लौट रहा था। इसी दौरान इंद्री नाके पर तैनात एक होमगार्ड ने उसे रोककर जांच की। विरोध करने पर डायल-112 पर मौजूद दो पुलिसकर्मी मौके पर पहुंचे और उसे पुलिस वाहन में बैठाकर लाडवा थाने ले जाया गया।
युवक का आरोप है कि थाने में उसे कुछ समय तक एक कमरे में बंद रखा गया और बाद में दो सहायक उप निरीक्षक (ASI) तथा एक होमगार्ड ने उसके साथ मारपीट की तथा शारीरिक उत्पीड़न किया। पीड़ित ने यह भी दावा किया कि वह गंभीर रूप से बीमार है और कैंसर का मरीज होने के कारण कीमोथेरेपी ले रहा है। घटना के बाद उसकी तबीयत बिगड़ने पर उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने पुलिस को सूचना दी। अस्पताल प्रशासन ने पीड़ित का बयान दर्ज कर लिया है।
मामले के सामने आने के बाद पुलिस विभाग में भारी हलचल है। संबंधित पुलिसकर्मियों और होमगार्ड के खिलाफ गंभीर आरोपों को देखते हुए जांच प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। अधिकारियों का कहना है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की जाएगी और तथ्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
फिलहाल, आरोपों की गंभीरता को देखते हुए मामला चर्चा में है और प्रशासन पर पारदर्शी जांच का दबाव बढ़ गया है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से मुलाकात की तस्वीर साझा किए जाने के बाद यह मुलाकात चर्चा में है। हालांकि, बैठक में किन मुद्दों पर विस्तार से बातचीत हुई, इसकी आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। पीएम मोदी से राज्यपाल की मुलाकात राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच हुई इस बैठक को झारखंड से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों के लिहाज से अहम माना जा रहा है। राज्यपाल समय-समय पर राज्य से जुड़े मुद्दों और संवैधानिक दायित्वों के तहत केंद्र के साथ समन्वय करते रहे हैं। झारखंड से जुड़े मुद्दों पर हो सकती है चर्चा मुलाकात के दौरान झारखंड के विकास, प्रशासनिक स्थिति और राज्य से जुड़े विभिन्न विषयों पर चर्चा होने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, बैठक के एजेंडे को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय या राजभवन की ओर से विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है। ऐसे में बैठक में किन-किन मुद्दों पर विशेष चर्चा हुई, इसे लेकर फिलहाल आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है। राज्य की राजनीति के बीच मुलाकात अहम झारखंड में राजनीतिक गतिविधियों के बीच राज्यपाल और प्रधानमंत्री की मुलाकात को राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राज्यपाल का पद संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण है और केंद्र तथा राज्य के बीच समन्वय में इसकी अहम भूमिका रहती है। हालांकि, केवल मुलाकात के आधार पर किसी राजनीतिक निर्णय या आगामी कदम को लेकर अनुमान लगाना उचित नहीं होगा। पीएम मोदी से मुलाकात की तस्वीर साझा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार की मुलाकात की तस्वीर सामने आने के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में इसकी चर्चा शुरू हो गई है। बैठक से जुड़ी विस्तृत जानकारी सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि दोनों के बीच किन विषयों पर विशेष रूप से बातचीत हुई।
Census Phase 2: केंद्र सरकार ने लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में जनगणना के दूसरे चरण के लिए आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है। इन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 1 सितंबर से 30 सितंबर 2026 तक घर-घर जाकर जनसंख्या की गणना की जाएगी। 1 सितंबर से शुरू होगी जनगणना केंद्र सरकार ने सोमवार (3 अगस्त 2026) को जारी अधिसूचना में बताया कि लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में जनगणना का दूसरा चरण पूरे सितंबर महीने चलेगा। इसके बाद 1 से 5 अक्टूबर 2026 तक पुनरीक्षण (रिवीजन) की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। राजपत्र अधिसूचना में क्या कहा गया? पीटीआई के अनुसार, भारत के रजिस्ट्रार जनरल एवं जनगणना आयुक्त मृत्युंजय कुमार नारायण द्वारा जारी राजपत्र अधिसूचना में कहा गया है कि इन क्षेत्रों में 1 से 30 सितंबर 2026 के बीच जनसंख्या गणना कराई जाएगी। इसके बाद एकत्रित आंकड़ों का सत्यापन और संशोधन 1 से 5 अक्टूबर तक किया जाएगा। 17 अगस्त से मिलेगा सेल्फ-रजिस्ट्रेशन का विकल्प घर-घर जाकर जनगणना शुरू होने से पहले 17 अगस्त से 31 अगस्त 2026 तक लोगों को स्वयं अपना नाम जनगणना में दर्ज कराने का अवसर मिलेगा। इससे ऐसे लोगों को भी शामिल होने में सुविधा होगी, जो किसी कारणवश सर्वे के समय घर पर मौजूद न हों। बर्फीले क्षेत्रों के लिए अलग होगी संदर्भ तिथि अधिसूचना के अनुसार, लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बर्फ से प्रभावित क्षेत्रों के लिए जनगणना की संदर्भ तिथि 1 अक्टूबर 2026 की रात 12 बजे निर्धारित की गई है। वहीं, देश के बाकी हिस्सों में जनसंख्या गणना का दूसरा चरण अगले वर्ष शुरू होने की संभावना है। आजादी के बाद आठवीं जनगणना यह स्वतंत्र भारत की आठवीं जनगणना होगी, जिसे दो चरणों में आयोजित किया जा रहा है। इस बार पहली बार जनगणना के दौरान जाति संबंधी जानकारी भी एकत्र की जाएगी, जिससे सामाजिक और आर्थिक योजनाओं के लिए विस्तृत आंकड़े उपलब्ध हो सकेंगे। 11,718 करोड़ रुपये का बजट मंजूर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस जनगणना प्रक्रिया के लिए 11,718 करोड़ रुपये की मंजूरी दी है। यह अब तक की सबसे बड़ी और व्यापक जनगणना मानी जा रही है, जिसमें डिजिटल तकनीक और सेल्फ-एन्यूमरेशन जैसी नई सुविधाओं का भी उपयोग किया जाएगा।
FSSAI Action on Dabur Products: भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने डाबर के कुछ शहद और घी उत्पादों पर बड़ी कार्रवाई करते हुए उनकी बिक्री पर रोक लगा दी है। यह कार्रवाई उन उत्पादों पर की गई है, जिनके लेबल पर '100% शुद्ध' (100% Pure) होने का दावा किया गया था। प्राधिकरण का कहना है कि ऐसे दावों के समर्थन में पर्याप्त वैज्ञानिक और नियामकीय आधार नहीं मिलने के कारण यह कदम उठाया गया है। '100% शुद्ध' दावे पर उठे सवाल एफएसएसएआई के अनुसार, खाद्य उत्पादों पर किए जाने वाले दावे उपभोक्ताओं को भ्रमित नहीं करने चाहिए। जांच के दौरान पाया गया कि डाबर के कुछ शहद और घी उत्पादों पर किए गए '100% शुद्ध' जैसे दावे निर्धारित मानकों और विज्ञापन नियमों के अनुरूप नहीं पाए गए। इसके बाद संबंधित उत्पादों की बिक्री पर रोक लगाने का निर्देश जारी किया गया। उपभोक्ताओं के हित में कार्रवाई खाद्य सुरक्षा नियामक का कहना है कि बाजार में बिकने वाले खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता और लेबलिंग को लेकर पारदर्शिता बनाए रखना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। यदि कोई कंपनी ऐसा दावा करती है, जिसे प्रमाणित नहीं किया जा सकता, तो वह उपभोक्ता संरक्षण नियमों का उल्लंघन माना जा सकता है। कंपनी को नियमों का पालन करने के निर्देश एफएसएसएआई ने कंपनी को संबंधित उत्पादों की लेबलिंग और दावों को खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुरूप संशोधित करने के निर्देश दिए हैं। जब तक नियामकीय आवश्यकताओं का पालन नहीं किया जाता, तब तक इन उत्पादों की बिक्री पर रोक जारी रहेगी। खाद्य उत्पादों के दावों पर बढ़ी सख्ती हाल के वर्षों में एफएसएसएआई खाद्य उत्पादों पर किए जाने वाले 'नेचुरल', 'ऑर्गेनिक', '100% शुद्ध' और अन्य प्रचारात्मक दावों की सख्ती से जांच कर रहा है। नियामक का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कंपनियां केवल वही दावे करें, जिनका वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हो और जिनसे उपभोक्ता गुमराह न हों।