मुकाबले के 101वें मिनट में इंटर मियामी के डिफेंडर ने फिलाडेल्फिया यूनियन के 16 वर्षीय खिलाड़ी कैवन सुलिवन को बॉक्स के अंदर टैकल किया। टैकल के बाद सुलिवन जमीन पर गिर गए। इसके बाद इंटर मियामी के इयान फ्रे ने कथित तौर पर सुलिवन के सिर की ओर धक्का देने की कोशिश की।
इसके जवाब में सुलिवन ने फ्रे को उनके पैर की मदद से उठाकर जमीन पर पटक दिया। इसके बाद दोनों खिलाड़ियों के बीच हाथापाई और धक्का-मुक्की शुरू हो गई। कुछ ही देर में दोनों टीमों के खिलाड़ी मौके पर पहुंच गए और विवाद को रोकने की कोशिश करने लगे।
विवाद थमने के बजाय तब और बढ़ गया, जब कैवन सुलिवन की इयान फ्रे से झड़प के बाद इंटर मियामी के यानिक ब्राइट भी उनसे भिड़ गए। दोनों के बीच भी धक्का-मुक्की हुई।
स्थिति बिगड़ती देख दोनों टीमों के खिलाड़ियों ने बीच-बचाव किया। मामला शांत होने के बाद रेफरी ने कैवन सुलिवन और यानिक ब्राइट को रेड कार्ड दिखा दिया।
अपने साथी खिलाड़ी के समर्थन में लियोनेल मेसी रेफरी के पास पहुंचे और उनसे बातचीत करने की कोशिश की। हालांकि रेफरी ने अपना फैसला नहीं बदला। इस पूरे घटनाक्रम ने मैच के रोमांच को अचानक विवाद में बदल दिया।
मैच में इंटर मियामी ने शुरुआत में पिछड़ने के बाद वापसी की थी। 11वें मिनट में फिलाडेल्फिया के इंडियाना वैसिलेव ने गोल कर टीम को बढ़त दिलाई। इसके बाद 21वें मिनट में डैनियल पिंटर ने इंटर मियामी के लिए बराबरी का गोल किया।
26वें मिनट में मेसी ने गोल कर इंटर मियामी को 2-1 की बढ़त दिला दी। हालांकि दूसरे हाफ के 58वें मिनट में नील पीयरे ने फिलाडेल्फिया के लिए बराबरी का गोल कर दिया।
आखिरकार मुकाबला 2-2 से ड्रॉ रहा। इंटर मियामी को लगातार चार मैचों से जीत का इंतजार है। 20 मैचों में 39 अंक के साथ टीम ईस्टर्न कॉन्फ्रेंस में दूसरे स्थान पर है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
गॉल, एजेंसियां। भारत के खिलाफ पहले टेस्ट में 165 रन से हार के बाद श्रीलंका को दूसरा बड़ा झटका लगा है। टीम के प्रमुख बल्लेबाज कुसल मेंडिस और दिनेश चांदीमल दूसरे टेस्ट में नहीं खेल पाएंगे। श्रीलंका के कोच गैरी कर्स्टन ने दोनों खिलाड़ियों के बाहर होने की पुष्टि की है। कुसल मेंडिस हैमस्ट्रिंग चोट से परेशान कुसल मेंडिस को हैमस्ट्रिंग चोट लगी है, जो उन्हें पिछले महीने लंका प्रीमियर लीग के दौरान हुई थी। चोट से पूरी तरह नहीं उबर पाने के कारण वह भारत के खिलाफ अगले टेस्ट में टीम का हिस्सा नहीं होंगे। मेंडिस की गैरमौजूदगी श्रीलंका के लिए बड़ा नुकसान है, क्योंकि टीम के बल्लेबाजी क्रम में उनका अनुभव और आक्रामक बल्लेबाजी महत्वपूर्ण मानी जाती है। चांदीमल को कन्कशन के कारण आराम दूसरी ओर, दिनेश चांदीमल गॉल टेस्ट में फील्डिंग के दौरान चोटिल हो गए थे। उन्हें कन्कशन हुआ और ICC के नियमों के तहत कन्कशन रिप्लेसमेंट के बाद खिलाड़ी के लिए अनिवार्य आराम की अवधि होती है। इसी वजह से वह दूसरे टेस्ट से बाहर रहेंगे। पहले से ही कमजोर है श्रीलंका का बल्लेबाजी क्रम श्रीलंका को एक और चिंता पथुम निसांका की गैरमौजूदगी को लेकर है। वह जून में हुई कलाई की सर्जरी से उबर रहे हैं। ऐसे में मेंडिस और चांदीमल के बाहर होने से टीम के अनुभवी बल्लेबाजों की कमी और बढ़ गई है। भारत 1-0 से आगे, श्रीलंका पर वापसी का दबाव गॉल टेस्ट में भारत ने श्रीलंका को 165 रन से हराया। मानव सुथार ने 10 विकेट लेकर भारत की जीत में अहम भूमिका निभाई। अब श्रीलंका के सामने दूसरे टेस्ट में युवा खिलाड़ियों के साथ मजबूत वापसी करने की चुनौती होगी। कोच कर्स्टन ने इन परिस्थितियों को नए खिलाड़ियों के लिए खुद को साबित करने का मौका बताया है।
लंदन: क्रिकेट के ऐतिहासिक मैदान लॉर्ड्स पर भारतीय मिक्स्ड डिसएबिलिटी क्रिकेट टीम ने इंग्लैंड के खिलाफ शानदार जीत दर्ज कर यादगार पल बना दिया। सात मैचों की सीरीज भले ही इंग्लैंड ने 4-3 से अपने नाम की, लेकिन आखिरी मुकाबले में भारत की 118 रन की बड़ी जीत ने पूरे दौरे का शानदार अंत किया। जीत के बाद भारतीय खिलाड़ियों ने लॉर्ड्स की बालकनी में जिस अंदाज में जश्न मनाया, उसने क्रिकेट प्रशंसकों को 2002 की ऐतिहासिक यादें ताजा करा दीं। खिलाड़ियों ने अपनी टी-शर्ट उतारकर हवा में लहराई और जमकर जीत का जश्न मनाया। यह नजारा पूर्व भारतीय कप्तान सौरव गांगुली के उस ऐतिहासिक जश्न की याद दिला गया, जब उन्होंने नेटवेस्ट ट्रॉफी के फाइनल में इंग्लैंड को हराने के बाद लॉर्ड्स की बालकनी से अपनी टी-शर्ट लहराई थी। लॉर्ड्स में भारत का दबदबा आखिरी मुकाबले में भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 4 विकेट पर 206 रन का विशाल स्कोर खड़ा किया। यह पूरे दौरे में किसी भी टीम द्वारा बनाया गया सबसे बड़ा स्कोर रहा। 206 रन के लक्ष्य का पीछा करने उतरी इंग्लैंड की टीम भारतीय गेंदबाजों के सामने पूरी तरह दबाव में नजर आई। भारतीय गेंदबाजों ने इंग्लैंड की पूरी टीम को महज 88 रन पर ऑलआउट कर दिया। भारत ने मुकाबला 118 रन के बड़े अंतर से अपने नाम किया। इंग्लैंड के कप्तान कैलम फ्लिन ने भी भारत के प्रदर्शन की सराहना करते हुए माना कि लॉर्ड्स में भारतीय टीम ने शानदार क्रिकेट खेली और जीत की पूरी हकदार थी। 2002 की यादें हुईं ताजा लॉर्ड्स की बालकनी भारतीय क्रिकेट के लिए पहले से ही बेहद खास रही है। 2002 में नेटवेस्ट सीरीज के फाइनल में इंग्लैंड को हराने के बाद तत्कालीन कप्तान सौरव गांगुली ने बालकनी में अपनी टी-शर्ट उतारकर हवा में लहराई थी। उस समय गांगुली का यह जश्न भारतीय क्रिकेट के सबसे चर्चित पलों में शामिल हो गया था। अब मिक्स्ड डिसएबिलिटी टीम के खिलाड़ियों ने उसी अंदाज में जश्न मनाकर उस ऐतिहासिक तस्वीर को फिर जीवंत कर दिया। सात मैचों में भारत ने तीन मुकाबले जीते सीरीज का पहला मुकाबला इंग्लैंड ने 29 रन से जीता था। इसके बाद भारत ने लगातार दो मैचों में 6 और 8 रन से जीत दर्ज की। चौथे और पांचवें मुकाबले में इंग्लैंड ने क्रमश: 2 और 54 रन से जीत हासिल की। छठे मैच में भी इंग्लैंड ने भारत को 18 रन से हराया। इसके बाद लॉर्ड्स में खेले गए निर्णायक मुकाबले में भारत ने 118 रन से शानदार जीत दर्ज की। इस तरह इंग्लैंड ने सीरीज 4-3 से जीत ली, लेकिन लॉर्ड्स की बड़ी जीत और भारतीय खिलाड़ियों का यादगार जश्न इस दौरे की सबसे खास तस्वीरों में शामिल हो गया।
क्रिकेट में इंटरनेशनल डेब्यू किसी भी खिलाड़ी के लिए बेहद खास पल होता है। अगर पहला ही मैच यादगार प्रदर्शन के साथ खत्म हो, तो खिलाड़ी से भविष्य में बड़ी उम्मीदें लगाई जाती हैं। हालांकि क्रिकेट में सिर्फ शानदार शुरुआत काफी नहीं होती। लंबे समय तक टीम में बने रहने के लिए निरंतर प्रदर्शन और बदलती परिस्थितियों के साथ खुद को ढालना भी जरूरी है। क्रिकेट इतिहास में ऐसे कई खिलाड़ी रहे हैं जिन्होंने अपने डेब्यू मैच में ऐसा प्रदर्शन किया कि लगा उनका करियर लंबा और शानदार होगा। लेकिन कुछ ही समय बाद उनका प्रदर्शन गिरा और वे राष्ट्रीय टीम से बाहर हो गए। इनमें भारत के पृथ्वी शॉ और नरेंद्र हिरमानी के अलावा कॉलिन इनग्राम, जेसन क्रेजा और आबिद अली जैसे नाम शामिल हैं। 1. कॉलिन इनग्राम: डेब्यू में शतक से शुरुआत दक्षिण अफ्रीका के कॉलिन इनग्राम ने 2010 में वनडे डेब्यू किया था। अपने पहले ही मुकाबले में उन्होंने 124 रन की शानदार पारी खेली। उनका यह प्रदर्शन उस समय वनडे डेब्यू में किसी बल्लेबाज की दूसरी सबसे बड़ी पारी थी। हालांकि इस शानदार शुरुआत को वह लंबे करियर में नहीं बदल सके। इनग्राम ने दक्षिण अफ्रीका के लिए सिर्फ 31 वनडे और 9 टी20 इंटरनेशनल मुकाबले खेले। 2. पृथ्वी शॉ: टेस्ट डेब्यू में 134 रन भारतीय क्रिकेट में पृथ्वी शॉ का नाम इस सूची में सबसे चर्चित है। 18 साल की उम्र में टेस्ट डेब्यू करते हुए उन्होंने वेस्टइंडीज के खिलाफ 134 रन की शानदार पारी खेली। इसके बाद अगले टेस्ट में भी उन्होंने अर्धशतक लगाया। अपनी पहली टेस्ट सीरीज में 237 रन बनाकर शॉ को प्लेयर ऑफ द सीरीज चुना गया। लेकिन इसके बाद उनका टेस्ट करियर उम्मीदों के मुताबिक आगे नहीं बढ़ पाया। उन्हें केवल तीन और टेस्ट मैच खेलने का मौका मिला। रिपोर्ट के मुताबिक वह करीब छह साल से टेस्ट क्रिकेट से दूर हैं। 3. नरेंद्र हिरमानी: डेब्यू टेस्ट में 16 विकेट भारत के नरेंद्र हिरमानी का डेब्यू प्रदर्शन आज भी टेस्ट क्रिकेट के सबसे यादगार प्रदर्शनों में गिना जाता है। 1988 में वेस्टइंडीज के खिलाफ उन्होंने टेस्ट मैच में 136 रन देकर 16 विकेट हासिल किए थे। लेकिन इस शानदार प्रदर्शन के बावजूद हिरमानी भारतीय टीम में अपनी जगह लंबे समय तक कायम नहीं रख सके। उनका टेस्ट करियर सिर्फ 17 मैचों तक चला। बाद में अनिल कुंबले के भारतीय टीम में प्रमुख लेग स्पिनर के रूप में स्थापित होने के साथ हिरमानी की टीम में वापसी मुश्किल होती चली गई। 4. जेसन क्रेजा: डेब्यू टेस्ट में 12 विकेट ऑस्ट्रेलिया के ऑफ स्पिनर जेसन क्रेजा ने 2008 में भारत के खिलाफ नागपुर टेस्ट में डेब्यू किया था। उन्होंने अपने पहले ही टेस्ट में 12 विकेट चटकाकर तहलका मचा दिया। पहली पारी में उन्होंने आठ भारतीय बल्लेबाजों को आउट किया था। इतने प्रभावशाली डेब्यू के बावजूद क्रेजा ऑस्ट्रेलिया की टेस्ट टीम में अपनी जगह नहीं बना सके। उन्हें इसके बाद सिर्फ एक और टेस्ट खेलने का मौका मिला। 5. आबिद अली: टेस्ट और वनडे दोनों में शतक पाकिस्तान के आबिद अली ने अपने इंटरनेशनल करियर की शुरुआत बेहद खास अंदाज में की। वह पुरुष क्रिकेट में वनडे और टेस्ट दोनों के डेब्यू मैच में शतक लगाने वाले पहले और एकमात्र खिलाड़ी हैं। इसके बावजूद उनका अंतरराष्ट्रीय करियर अपेक्षाकृत छोटा रहा। आबिद ने पाकिस्तान के लिए 16 टेस्ट और 6 वनडे खेले। उनका टेस्ट बल्लेबाजी औसत करीब 49 और वनडे औसत करीब 39 रहा। शानदार डेब्यू के बाद निरंतरता क्यों जरूरी? इन पांच खिलाड़ियों की कहानी बताती है कि क्रिकेट में एक शानदार शुरुआत खिलाड़ी को पहचान तो दिला सकती है, लेकिन करियर को लंबा बनाने के लिए लगातार अच्छा प्रदर्शन करना जरूरी है। टीम में जगह बनाने के लिए प्रतिस्पर्धा, फिटनेस, तकनीक, मानसिक मजबूती और परिस्थितियों के अनुसार खुद को बदलने की क्षमता भी अहम भूमिका निभाती है। इन खिलाड़ियों के आंकड़े यह सवाल भी खड़ा करते हैं कि क्या सिर्फ डेब्यू का शानदार प्रदर्शन भविष्य की सफलता की गारंटी हो सकता है? क्रिकेट में शायद इसका जवाब साफ है—शानदार शुरुआत महत्वपूर्ण है, लेकिन निरंतरता उससे भी ज्यादा जरूरी है।