PoK Protest News: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में महंगाई, बिजली संकट, आटे की कमी और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर जारी विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई हिंसक झड़पों में 100 से अधिक लोगों की मौत होने का दावा किया जा रहा है। हालांकि, इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। महंगाई और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर प्रदर्शन मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में लोग महंगाई, बिजली संकट, आटे की कमी और शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि शांतिपूर्ण आंदोलन पर सुरक्षा बलों ने बल प्रयोग किया और गोलियां चलाईं। दूसरी ओर, स्थानीय प्रशासन का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई की गई और कुछ प्रदर्शनकारी हिंसक गतिविधियों में शामिल थे। मस्जिदों से विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की अपील मुजफ्फराबाद समेत कई इलाकों में मस्जिदों के लाउडस्पीकरों के जरिए लोगों से प्रदर्शन में शामिल होने और एकजुट रहने की अपील की जा रही है। इस बीच, जम्मू-कश्मीर के पूर्व डीजीपी एस.पी. वैद ने कहा कि अतीत में जिस तरीके का इस्तेमाल पाकिस्तान भारत के खिलाफ करता था, अब उसी तरह के तरीकों का उपयोग पाकिस्तान के खिलाफ होता दिखाई दे रहा है। युवाओं पर सबसे ज्यादा असर रावलाकोट में राहत कार्य से जुड़े एक डॉक्टर के अनुसार, गोली लगने वाले अधिकांश लोग 15 से 35 वर्ष आयु वर्ग के हैं। उन्होंने बताया कि प्राथमिक उपचार की व्यवस्था मौजूद है, लेकिन सिर, सीने और पेट में गंभीर गोली लगने वाले घायलों को बड़े अस्पतालों में भेजना पड़ रहा है। बड़ी संख्या में घायल आने से स्वास्थ्य सेवाओं पर भी दबाव बढ़ गया है। परिजनों का आरोप- अधिकार मांगने पर मिली गोलियां मृतकों और घायलों के परिजनों का कहना है कि वे केवल सस्ती बिजली, आटा, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे थे। कई परिवारों ने आरोप लगाया कि उनके परिजन किसी हिंसक गतिविधि में शामिल नहीं थे, बल्कि अपने अधिकारों के लिए प्रदर्शन कर रहे थे। सरकार और JAAC के दावे आमने-सामने JAAC का आरोप है कि पाकिस्तान और PoK प्रशासन ने अक्टूबर 2025 में हुए समझौते को लागू नहीं किया, जिससे लोगों का आक्रोश बढ़ा। वहीं, स्थानीय प्रशासन का कहना है कि संगठन पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है और उसके कुछ सदस्यों के हथियारबंद होने की जानकारी मिली है। पाकिस्तानी प्रशासन का आरोप है कि आंदोलन का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करना है, जबकि प्रदर्शनकारी इसे अपने अधिकारों की लोकतांत्रिक लड़ाई बता रहे हैं। पाकिस्तान के लिए बढ़ी चुनौती लगातार जारी विरोध प्रदर्शन और बढ़ता जनाक्रोश पाकिस्तान के लिए बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौती बनता जा रहा है। मौजूदा हालात ने क्षेत्र में सुरक्षा और शासन व्यवस्था को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं।
PoK Violence: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में तथाकथित विधानसभा चुनाव के पहले चरण से पहले हिंसा भड़क गई है। रावलाकोट से मुजफ्फराबाद तक निकाले गए विरोध मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई झड़पों के बाद हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने दावा किया है कि सुरक्षा बलों की कार्रवाई में उसके 14 प्रदर्शनकारियों की मौत हुई है, जबकि दो दर्जन से अधिक लोग घायल हुए हैं। हालांकि, इन दावों की अब तक स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। मौतों के दावों पर पुलिस ने उठाए सवाल पीटीआई के मुताबिक, PoK के पुलिस प्रमुख लियाकत अली मलिक ने 14 लोगों की मौत के दावे पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब तक शव बरामद नहीं होते और पोस्टमार्टम नहीं कराया जाता, तब तक किसी भी मौत की आधिकारिक पुष्टि नहीं की जा सकती। उन्होंने बताया कि झड़प के दौरान एक रेंजर्स जवान की मौत हुई है, जबकि दो रेंजर्स और दो पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। JAAC और पुलिस के दावे आमने-सामने JAAC का आरोप है कि उसका 'लॉन्ग मार्च' पूरी तरह शांतिपूर्ण था और प्रदर्शनकारी निहत्थे थे। संगठन का कहना है कि सुरक्षा बलों ने बिना किसी उकसावे के गोलीबारी की। वहीं, पुलिस का दावा है कि प्रदर्शनकारियों के पास आधुनिक हथियार थे और उन्होंने पहले सुरक्षाबलों पर फायरिंग की, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई की गई। 12 आरक्षित सीटों को लेकर कई हफ्तों से विरोध JAAC पिछले कई सप्ताह से विधानसभा की 12 शरणार्थी आरक्षित सीटों को समाप्त करने की मांग कर रहा है। संगठन का आरोप है कि पाकिस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान इन सीटों के जरिए अपनी पसंद की सरकार बनवाने की कोशिश करता है। इसी मांग को लेकर रावलाकोट से मुजफ्फराबाद तक 'लॉन्ग मार्च' निकाला गया था, जो अब हिंसक झड़प में बदल गया। इंटरनेट बंद, मीडिया पर भी पाबंदियां हिंसा के बाद PoK के कई इलाकों में इंटरनेट सेवाएं निलंबित कर दी गई हैं और मीडिया कवरेज पर भी प्रतिबंध लगाए जाने की खबर है। पाक प्रशासन और JAAC के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं निकल सका है। भारत पहले भी उठा चुका है मुद्दा भारत पहले भी PoK में जारी विरोध प्रदर्शनों को वहां के लोगों के कथित शोषण और प्रशासनिक दमन का परिणाम बता चुका है। चुनावी प्रक्रिया के बीच बढ़ते तनाव और हिंसा ने पूरे क्षेत्र की स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है। फिलहाल, मौतों और घायल होने के दावों की स्वतंत्र पुष्टि का इंतजार है, जबकि इलाके में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है।
PoK Elections 2026: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में सोमवार (27 जुलाई) को विधानसभा चुनाव के पहले चरण के तहत 13 सीटों पर मतदान हो रहा है। सुरक्षा हालात और लंबे समय से जारी विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए पाकिस्तान चुनाव आयोग ने चुनाव तीन चरणों में कराने का फैसला लिया है। चुनाव के नतीजों के साथ-साथ क्षेत्र में राजनीतिक असंतोष और सुरक्षा स्थिति पर भी नजर बनी हुई है। तीन चरणों में होगा चुनाव पाकिस्तानी चुनाव आयोग के अनुसार, 45 सदस्यीय विधानसभा के लिए मतदान इस तरह होगा: 27 जुलाई: मीरपुर डिवीजन की 13 सीटें 2 अगस्त: मुजफ्फराबाद डिवीजन की 9 सीटें और पाकिस्तान में रहने वाले शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटें 10 अगस्त: पूंछ डिवीजन की 11 सीटें मतदान के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सेना और सुरक्षा बलों की अतिरिक्त तैनाती की गई है। विरोध प्रदर्शनों के बीच चुनाव PoK में पिछले कई महीनों से महंगाई, बढ़े हुए बिजली बिल, सरकारी नीतियों और राजनीतिक हस्तक्षेप के खिलाफ व्यापक प्रदर्शन हो रहे हैं। इन आंदोलनों की अगुआई जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JKJAAC) कर रही है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सुरक्षा बलों ने कई जगह बल प्रयोग किया, संचार सेवाएं बाधित कीं और रास्ते बंद कर दिए, जिससे आम लोगों को खाद्य सामग्री और दवाइयों की कमी का सामना करना पड़ा। कई जगह प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पों में लोगों की मौत और घायल होने की घटनाएं भी सामने आई हैं। 12 शरणार्थी सीटों पर विवाद इस चुनाव का सबसे बड़ा विवाद पाकिस्तान में रहने वाले कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों को लेकर है। स्थानीय संगठनों और JKJAAC का आरोप है कि इन सीटों के जरिए इस्लामाबाद की सरकार चुनावी नतीजों को प्रभावित करती है, जिससे स्थानीय मतदाताओं की राजनीतिक आवाज कमजोर पड़ जाती है और केंद्र समर्थित दलों को फायदा मिलता है। क्या चुनाव से बदलेगी स्थिति? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव कराने से संवैधानिक प्रक्रिया पूरी हो जाएगी, लेकिन महंगाई, बिजली संकट, राजनीतिक अधिकारों और सुरक्षा बलों की कार्रवाई जैसे मूल मुद्दों का समाधान फिलहाल होता नहीं दिख रहा। ऐसे में चुनाव के बाद भी क्षेत्र में राजनीतिक तनाव जारी रहने की आशंका जताई जा रही है। भारत ने फिर जताया विरोध भारत लगातार स्पष्ट करता रहा है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का पूरा केंद्र शासित प्रदेश, जिसमें PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान शामिल हैं, भारत का अभिन्न हिस्सा हैं। भारत ने इन क्षेत्रों में पाकिस्तान द्वारा कराए जाने वाले चुनावों पर पहले भी कड़ा विरोध दर्ज कराया है और ऐसी चुनावी प्रक्रिया या तथाकथित विधानसभा को मान्यता नहीं दी है। वहीं, मानवाधिकार संगठनों ने PoK में हालात को लेकर चिंता जताई है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने भी हिंसा की घटनाओं की निष्पक्ष जांच की मांग की है। नवाज शरीफ का बड़ा बयान चुनाव प्रचार के दौरान पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) प्रमुख नवाज शरीफ ने कहा कि यदि उनकी पार्टी चुनाव जीतती है तो वह प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से उन्हें PoK का प्रधानमंत्री बनाने का आग्रह करेंगे ताकि वे स्वयं क्षेत्र के विकास की निगरानी कर सकें। उन्होंने कहा कि "PoK मेरे लिए पंजाब जितना ही प्रिय है। मेरे पूर्वज कश्मीर से आए थे, इसलिए यह मेरा दूसरा घर है।" 2021 के चुनाव में क्या हुआ था? 2021 के विधानसभा चुनाव में इमरान खान की PTI ने 45 में से 25 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। सरदार अब्दुल कय्यूम नियाजी प्रधानमंत्री बने, लेकिन 2022 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद सरदार तनवीर इलियास प्रधानमंत्री बने, जिन्हें 2023 में अदालत ने अयोग्य घोषित कर दिया। बाद में चौधरी अनवरुल हक प्रधानमंत्री बने, लेकिन नवंबर 2025 में अविश्वास प्रस्ताव के जरिए उन्हें भी हटा दिया गया। वर्तमान में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के फैसल मुमताज राठौर PoK के प्रधानमंत्री हैं।
PoK Protests: पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoK) में सरकार विरोधी आंदोलन लगातार तेज होता जा रहा है। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने बुधवार को मुजफ्फराबाद तक 'लॉन्ग मार्च' का आह्वान किया है। संभावित प्रदर्शन को देखते हुए पूरे क्षेत्र में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है और बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती की गई है। सरकार के खिलाफ जारी है आंदोलन JAAC लंबे समय से अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं की रिहाई, सुरक्षा बलों की कार्रवाई रोकने, इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं बहाल करने तथा बिजली और आवश्यक वस्तुओं की बेहतर उपलब्धता जैसी मांगों को लेकर आंदोलन चला रही है। संगठन का कहना है कि सरकार को पहले ही अल्टीमेटम दिया गया था, लेकिन मांगों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। कई जिलों से मुजफ्फराबाद पहुंचेंगे प्रदर्शनकारी सूत्रों के मुताबिक रावलकोट, मीरपुर, कोटली, बाग समेत कई जिलों से बड़ी संख्या में लोग मुजफ्फराबाद पहुंच सकते हैं। प्रदर्शन के दौरान बाजार बंद रहने और कई प्रमुख सड़कों पर यातायात प्रभावित होने की भी संभावना जताई गई है। सुरक्षा व्यवस्था कड़ी संभावित विरोध प्रदर्शन को देखते हुए प्रशासन ने संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा बलों की अतिरिक्त तैनाती की है। प्रमुख मार्गों और सरकारी प्रतिष्ठानों की निगरानी बढ़ा दी गई है। स्थानीय प्रशासन किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए अलर्ट पर है। JAAC की प्रमुख मांगें गिरफ्तार नेताओं और कार्यकर्ताओं की रिहाई सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर रोक इंटरनेट और मोबाइल सेवाओं की बहाली बिजली और आवश्यक वस्तुओं की बेहतर उपलब्धता शासन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में सुधार आंदोलन और तेज होने की चेतावनी JAAC ने कहा है कि यदि सरकार ने उनकी मांगों पर सकारात्मक कदम नहीं उठाए, तो आंदोलन को और व्यापक बनाया जाएगा। संगठन का दावा है कि मौजूदा आंदोलन केवल बुनियादी सुविधाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राजनीतिक सुधारों की मांग भी प्रमुख मुद्दा बनेगी। राजनीतिक असर पर नजर विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बड़े पैमाने पर प्रदर्शन होता है, तो इससे पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक स्थिति और तनावपूर्ण हो सकती है। वहीं, प्रदर्शन के दौरान किसी भी प्रकार की सख्ती या बल प्रयोग की स्थिति पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नजर रहेगी.
नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद के आगामी मॉनसून सत्र से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। कांग्रेस ने 16 जुलाई को अपने शीर्ष नेताओं और सांसदों की अहम रणनीतिक बैठक बुलाई है, जिसमें सत्र के दौरान सरकार को किन मुद्दों पर घेरा जाएगा, इस पर चर्चा होगी। दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने 19 जुलाई को सभी राजनीतिक दलों की सर्वदलीय बैठक बुलाने का फैसला किया है। सरकार और विपक्ष दोनों कर रहे तैयारी कांग्रेस महंगाई, बेरोजगारी, कृषि, राष्ट्रीय सुरक्षा और अन्य प्रमुख मुद्दों को संसद में उठाने की तैयारी कर रही है। वहीं सरकार भी मॉनसून सत्र में कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पेश करने की रणनीति बना रही है। संविधान संशोधन विधेयक पर हो सकता है हंगामा सूत्रों के अनुसार, इस सत्र में प्रस्तावित 130वें संविधान संशोधन विधेयक को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस होने की संभावना है। विपक्ष पहले से ही इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की तैयारी में जुटा है। 20 जुलाई से शुरू होगा मॉनसून सत्र संसद का मॉनसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होने वाला है। इससे पहले होने वाली कांग्रेस की रणनीति बैठक और सर्वदलीय बैठक को सत्र की दिशा तय करने के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। राजनीतिक दल अपने-अपने एजेंडे को अंतिम रूप देने में जुट गए हैं।
मुजफ्फराबाद: पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoJK) में 27 जुलाई को होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल लगातार तनावपूर्ण होता जा रहा है। संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने आर्थिक मुद्दों से शुरू हुए आंदोलन को अब राजनीतिक अधिकारों, स्वशासन और संस्थागत सुधारों की मांग से जोड़ दिया है। संगठन ने चुनावों के बहिष्कार का भी ऐलान किया है, जिससे पाकिस्तान सरकार के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है। महंगाई के विरोध से राजनीतिक आंदोलन तक पहुंचा मामला रिपोर्ट के मुताबिक, JAAC की शुरुआत वर्ष 2023 में बढ़े बिजली बिल, गेहूं की कीमतों और महंगाई के खिलाफ हुई थी। बाद में आंदोलन का दायरा बढ़ा और संगठन ने 38 सूत्रीय मांगपत्र सरकार के सामने रखा। इनमें विधानसभा की आरक्षित 12 शरणार्थी सीटों को समाप्त करने की मांग भी शामिल है। प्रशासन की सख्ती, अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात पाकिस्तान प्रशासन ने जून 2026 में प्रस्तावित 'लॉन्ग मार्च' से पहले 5 जून को JAAC को आतंकवाद-रोधी कानून (Anti-Terrorism Act) के तहत प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया। इसके बाद कई इलाकों में धारा 144 लागू की गई, इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं बंद कर दी गईं तथा करीब 14 हजार अतिरिक्त अर्धसैनिक बल तैनात किए गए। JAAC का आरोप है कि उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई की गई। संगठन का दावा है कि उसके नेता उमर नजीर कश्मीरी को निशाना बनाया गया, जबकि इस दौरान उनके सहयोगी शहजैब हबीब की मौत हो गई। प्रतिबंध के बावजूद जारी हैं प्रदर्शन संगठन पर प्रतिबंध के बावजूद भिंबर, मीरपुर, कोटली और रावलाकोट समेत कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन जारी हैं। प्रदर्शनकारी लगातार मुजफ्फराबाद की ओर मार्च कर रहे हैं। कई स्थानों पर महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं की भागीदारी भी देखने को मिल रही है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि उन्हें खाद्य सामग्री, दवाइयों और संचार सुविधाओं तक पहुंच में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। चुनाव बहिष्कार का ऐलान JAAC ने कहा है कि मौजूदा परिस्थितियों में निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं हैं। संगठन का कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर कार्रवाई नहीं होती, तब तक वे चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लेंगे। ऐसे में 27 जुलाई को होने वाले चुनावों की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। विदेशों में भी मिला समर्थन PoJK में चल रहे आंदोलन को विदेशों में रहने वाले कश्मीरी प्रवासियों का भी समर्थन मिल रहा है। ब्रिटेन, कनाडा, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, डेनमार्क और अमेरिका में प्रदर्शन आयोजित किए गए। 5 जुलाई को लंदन में आयोजित "लंदन लॉन्ग मार्च" में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लेकर पाकिस्तान सरकार की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन किया। पाकिस्तान के दावों पर उठ रहे सवाल PoJK में जारी विरोध प्रदर्शन और सुरक्षा बलों की कार्रवाई के बीच आंदोलनकारी आरोप लगा रहे हैं कि उनकी लोकतांत्रिक मांगों को बल प्रयोग के जरिए दबाया जा रहा है। वहीं, पाकिस्तान की ओर से इन आरोपों पर आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। क्षेत्र में जारी घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक तनाव लगातार बना हुआ है।
मुजफ्फराबाद: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में पिछले कई सप्ताह से जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच हालात को लेकर नए दावे सामने आए हैं। आंदोलन से जुड़े जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेता सरदार अमन खान ने कथित तौर पर भारत से मानवीय सहायता की अपील की है। भारत से मानवीय सहायता की मांग सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में सरदार अमन खान कथित रूप से कहते दिखाई दे रहे हैं कि क्षेत्र में राशन और आवश्यक वस्तुओं की कमी हो गई है तथा लोगों को मदद की जरूरत है। उन्होंने भारत से मानवीय सहायता भेजने और नियंत्रण रेखा (LoC) पर राहत के लिए व्यवस्था करने की अपील की। उनका यह भी दावा है कि यदि हालात और बिगड़ते हैं तो लोगों को भारत आने का विकल्प मिलना चाहिए। आर्थिक नाकेबंदी का आरोप अमन खान का आरोप है कि विरोध प्रदर्शनों के बाद पाकिस्तान प्रशासन ने पूरे क्षेत्र की आर्थिक नाकेबंदी कर दी है, जिससे खाद्य सामग्री, दवाइयों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता प्रभावित हुई है। उनका कहना है कि इससे आम नागरिकों को गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। ईदगाह मैदान में हुई सभा रावलाकोट के ईदगाह मैदान में आयोजित एक सभा के दौरान अमन खान ने कथित तौर पर लोगों से पूछा कि क्या उन्हें नियंत्रण रेखा (LoC) की ओर बढ़ना चाहिए। वायरल वीडियो में भीड़ की ओर से समर्थन में नारे सुनाई देने का दावा किया जा रहा है। हालांकि, वीडियो की प्रामाणिकता और उसमें किए गए सभी दावों का स्वतंत्र सत्यापन उपलब्ध नहीं है। कई सप्ताह से जारी हैं प्रदर्शन PoK में पिछले महीने से विभिन्न स्थानों पर प्रदर्शन जारी हैं। प्रदर्शनकारी स्थानीय प्रशासन पर नागरिक अधिकारों के हनन, राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और आर्थिक समस्याओं को लेकर आरोप लगा रहे हैं। स्थानीय संगठनों का कहना है कि आंदोलन तब और तेज हुआ जब प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सुरक्षा कार्रवाई की गई। वहीं, पाकिस्तान प्रशासन की ओर से कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बात कही जाती रही है। दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो और भारत से मदद की अपील संबंधी दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इन्हें सत्यापित तथ्य के बजाय संबंधित पक्ष के दावों के रूप में देखा जाना चाहिए।
इस्लामाबाद/मुजफ्फराबाद: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में सरकार विरोधी आंदोलन के बीच हालात लगातार बिगड़ने के दावे सामने आ रहे हैं। स्थानीय लोगों, ट्रक चालकों और प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पाकिस्तान प्रशासन ने खाद्य सामग्री, ईंधन और दवाओं की आपूर्ति सीमित कर आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश की है। पाकिस्तान सरकार ने इन आरोपों से इनकार किया है, लेकिन विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कई इलाकों में आवश्यक वस्तुओं की कमी की शिकायतें बढ़ रही हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में चल रहे विरोध प्रदर्शन और बंद के कारण आम लोगों की परेशानियां बढ़ गई हैं। राजधानी मुजफ्फराबाद सहित कई शहरों में बाजार बंद हैं और इंटरनेट सेवाओं में भी रुकावट की खबरें सामने आई हैं। खाद्य सामग्री और दवाओं की कमी का दावा स्थानीय निवासियों का कहना है कि आटा, चावल, दाल, चीनी, दवाइयों और अन्य जरूरी सामान की उपलब्धता लगातार कम होती जा रही है। दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों का आरोप है कि राशन डिपो पर कई दिनों तक इंतजार करने के बावजूद उन्हें आवश्यक वस्तुएं नहीं मिल रही हैं, जबकि खुले बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ गई हैं। ईंधन संकट से बढ़ी मुश्किलें ईंधन की कमी भी लोगों के लिए बड़ी समस्या बन गई है। कई जिलों में पेट्रोल पंप बंद होने की खबरें हैं। वाहन चालकों का दावा है कि उन्हें ब्लैक मार्केट से ऊंचे दामों पर पेट्रोल खरीदना पड़ रहा है, जिससे आम लोगों और व्यापारियों दोनों की परेशानियां बढ़ गई हैं। जरूरी सामान लाने वालों को रोके जाने के आरोप रिपोर्टों के अनुसार, कई लोग आवश्यक सामान खरीदने के लिए पाकिस्तान के अन्य शहरों जैसे रावलपिंडी और इस्लामाबाद जा रहे हैं। कुछ स्थानीय लोगों का आरोप है कि लौटते समय उन्हें खाद्य सामग्री, दवाइयां और ईंधन लेकर PoK में प्रवेश नहीं करने दिया जा रहा। कुछ लोगों ने यह भी दावा किया कि पुलिस ने चेकपोस्ट पर उनके वाहनों को रोककर सामान वापस ले जाने या फेंकने के लिए दबाव बनाया। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। ट्रकों की आवाजाही प्रभावित होने का दावा स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, आवश्यक वस्तुओं से भरे कई ट्रकों को रास्ते में रोके जाने के कारण सप्लाई प्रभावित हुई है। ट्रक चालकों का कहना है कि कई वाहन घंटों और कुछ मामलों में कई दिनों तक रास्ते में खड़े रहे, जिससे खराब होने वाला सामान भी नुकसान का शिकार हुआ। पाकिस्तान प्रशासन ने आरोपों से किया इनकार पाकिस्तान प्रशासन ने खाद्य सामग्री और ईंधन की आपूर्ति रोकने के आरोपों को खारिज किया है। अधिकारियों का कहना है कि आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई सामान्य रूप से जारी है और किसी भी वाहन को जानबूझकर नहीं रोका गया है। कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह दावा किया गया है कि आंदोलन को कमजोर करने के लिए प्रशासनिक स्तर पर कुछ रणनीतिक कदम उठाए गए हैं। इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। क्या है पूरे विवाद की वजह? PoK में मौजूदा आंदोलन की शुरुआत विधानसभा की उन 12 आरक्षित सीटों को लेकर हुई, जो भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर से आए शरणार्थियों के लिए निर्धारित हैं। आंदोलनकारी संगठनों का आरोप है कि इन सीटों के जरिए इस्लामाबाद क्षेत्र की राजनीति को प्रभावित करता है। इसी मुद्दे को लेकर ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने विरोध प्रदर्शन शुरू किया। बाद में पाकिस्तान सरकार ने JAAC को प्रतिबंधित संगठन घोषित कर उसके समर्थकों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी। आंदोलन के और तेज होने के संकेत रिपोर्टों के अनुसार, PoK के कई शहरों और कस्बों में प्रदर्शन लगातार फैल रहे हैं। आंदोलनकारी संगठन दावा कर रहे हैं कि रावलाकोट में चल रहे धरने में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए हैं। JAAC ने आने वाले दिनों में रावलाकोट से मुजफ्फराबाद तक बड़े मार्च का भी आह्वान किया है। इस बीच क्षेत्र में तनाव बना हुआ है और प्रशासन स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए है।
मुजफ्फराबाद: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में बुधवार को पाकिस्तानी सेना का एक MI-17 हेलिकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार, हादसे में हेलिकॉप्टर में सवार 21 सुरक्षाकर्मियों के मारे जाने की आशंका है। पाकिस्तानी सेना ने अभी तक मृतकों की आधिकारिक संख्या की पुष्टि नहीं की है। उड़ान भरने के कुछ देर बाद हुआ हादसा जानकारी के मुताबिक, हेलिकॉप्टर ने मुजफ्फराबाद से उड़ान भरी थी और वह नीलम घाटी क्षेत्र की ओर जा रहा था। उड़ान के कुछ ही समय बाद हेलिकॉप्टर में तकनीकी खराबी आने की सूचना मिली। पायलट ने आपातकालीन लैंडिंग का प्रयास किया, लेकिन विमान सुरक्षित नहीं उतर सका और दुर्घटनाग्रस्त हो गया। नीलम घाटी में अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती थी प्रस्तावित स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, नीलम घाटी क्षेत्र में विधानसभा की 12 आरक्षित सीटों को लेकर चल रहे विवाद और विरोध प्रदर्शनों के मद्देनजर अतिरिक्त सुरक्षा बल भेजे जा रहे थे। बताया जा रहा है कि हेलिकॉप्टर में सवार सुरक्षाकर्मी इसी मिशन का हिस्सा थे। हादसे की जांच के आदेश पाकिस्तानी सेना ने दुर्घटना की वजहों का पता लगाने के लिए जांच शुरू कर दी है। सेना की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि तकनीकी और परिचालन संबंधी सभी पहलुओं की जांच की जाएगी, ताकि हादसे के वास्तविक कारणों का पता लगाया जा सके। सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने जताया शोक पाकिस्तानी सेना प्रमुख Asim Munir ने हादसे पर गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने मृतक सैनिकों के परिवारों के प्रति संवेदना जताते हुए दुर्घटना की विस्तृत जांच के निर्देश दिए हैं। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने व्यक्त की संवेदना पाकिस्तान के राष्ट्रपति Asif Ali Zardari और प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif ने भी हादसे पर शोक व्यक्त किया है। दोनों नेताओं ने मृतकों के परिवारों के प्रति संवेदना प्रकट करते हुए कहा कि देश सुरक्षा बलों के योगदान और बलिदान को हमेशा याद रखेगा। क्षेत्र में राहत और बचाव अभियान जारी हादसे के बाद सेना और स्थानीय प्रशासन की टीमें मौके पर पहुंच गईं। राहत एवं बचाव अभियान चलाया जा रहा है और दुर्घटनास्थल से मलबा हटाने का काम जारी है। अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद हादसे से जुड़ी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक की जाएगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।