दुनिया

लेबनान-इज़राइल समझौते पर अमल शुरू, दक्षिणी इलाकों में लेबनानी सेना की तैनाती तेज

ranjan kumar tiwari जुलाई 23, 2026 0
लेबनान-इज़राइल समझौते के तहत दक्षिणी लेबनान में लेबनानी सेना की तैनाती
Lebanon Israel Ceasefire Agreement Lebanese Army Deployment

बेरूत, एजेंसियां। अमेरिका की मध्यस्थता में हुए लेबनान-इज़राइल समझौते को लागू करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। समझौते के तहत दक्षिणी लेबनान के चुनिंदा क्षेत्रों में लेबनानी सेना (LAF) की तैनाती तेज कर दी गई है, जबकि इज़राइली सेना चरणबद्ध तरीके से कुछ इलाकों से पीछे हट रही है। इस पहल का उद्देश्य सीमा क्षेत्र में तनाव कम करना और लंबे समय से संघर्ष प्रभावित इलाकों में लेबनान सरकार का नियंत्रण बहाल करना है।

 

'पायलट ज़ोन' से शुरू हुआ समझौते का क्रियान्वयन

 

समझौते के पहले चरण में दक्षिणी लेबनान के ज़ौतर अल-घरबियेह सहित कुछ क्षेत्रों को 'पायलट ज़ोन' के रूप में चुना गया है। इन इलाकों से इज़राइली सैनिकों की वापसी के बाद लेबनानी सेना ने सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालनी शुरू कर दी है। सेना इलाके में विस्फोटक सामग्री की तलाश, सुरक्षा व्यवस्था और सरकारी नियंत्रण स्थापित करने का काम कर रही है।

 

प्रधानमंत्री नवाफ सलाम ने किया दौरा

 

लेबनान के प्रधानमंत्री नवाफ सलाम ने दक्षिणी सीमा के प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर कहा कि सरकार पूरे दक्षिणी लेबनान में राज्य का अधिकार स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने स्थानीय लोगों से धैर्य बनाए रखने की अपील करते हुए भरोसा दिलाया कि पुनर्निर्माण और पुनर्वास का काम तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा।

 

हिज़्बुल्लाह के हथियारों का मुद्दा बना चुनौती

 

समझौते का एक अहम हिस्सा दक्षिणी लेबनान में केवल सरकारी सुरक्षा बलों की मौजूदगी सुनिश्चित करना है। इसके तहत हिज़्बुल्लाह के हथियारों और सैन्य ढांचे को हटाने की योजना भी शामिल है। हालांकि हिज़्बुल्लाह ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई है और अपने हथियार छोड़ने से इनकार किया है, जिससे समझौते के पूर्ण क्रियान्वयन को लेकर चुनौतियां बनी हुई हैं।

 

विस्थापित नागरिकों की वापसी अभी सीमित

 

हालांकि कुछ क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की तैनाती शुरू हो चुकी है, लेकिन बड़े पैमाने पर विस्थापित लोगों की घर वापसी अभी संभव नहीं हो सकी है। कई गांवों में भारी तबाही, क्षतिग्रस्त मकान और बिना फटे गोला-बारूद की मौजूदगी के कारण सेना ने लोगों से फिलहाल लौटने से बचने की अपील की है।

 

4 अगस्त की वार्ता पर टिकी निगाहें

 

समझौते के अगले चरण को आगे बढ़ाने के लिए 4 अगस्त को इटली में लेबनान, इज़राइल और अमेरिकी प्रतिनिधियों के बीच नई वार्ता प्रस्तावित है। इस बैठक में इज़राइली सैनिकों की आगे की वापसी, लेबनानी सेना की अतिरिक्त तैनाती और सीमा क्षेत्र में स्थायी शांति बहाल करने की दिशा में आगे की रणनीति पर चर्चा होने की उम्मीद है।

 

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Ranjan Kumar Tiwari Ranjan123

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International media highlights the CJP student protest at Jantar Mantar in New Delhi
World Media on CJP Protest: विदेशी मीडिया में गूंजा CJP आंदोलन, The Guardian बोला- लाठीचार्ज के बाद भी नहीं रुके छात्र

दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP (कॉकरोच जनता पार्टी) के आंदोलन और पुलिस कार्रवाई के बाद यह मामला अब अंतरराष्ट्रीय मीडिया की भी सुर्खियों में है। 20 जुलाई को हुए लाठीचार्ज, आंसू गैस और इंटरनेट प्रतिबंध के बाद भी आंदोलन जारी रहने पर दुनिया के कई प्रमुख मीडिया संस्थानों ने इसे अलग-अलग नजरिए से कवर किया है। किसी ने इसे युवाओं के बढ़ते असंतोष की आवाज बताया, तो किसी ने इसे सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती के रूप में देखा। मुख्य बातें (Key Points) 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई के बाद भी जंतर-मंतर पर आंदोलन जारी। BBC ने इसे Gen Z के विरोध के नए तरीके के रूप में बताया। The New York Times ने बेरोजगारी और पेपर लीक को आंदोलन की बड़ी वजह माना। The Guardian ने पुलिस कार्रवाई के बावजूद छात्रों के पीछे न हटने पर जोर दिया। Financial Times ने इसे मोदी सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती बताया। Al Jazeera ने इसे 2014 के बाद सरकार के सामने सबसे बड़ी युवा चुनौती करार दिया। पाकिस्तान के Dawn ने इसे विपक्ष के लिए राजनीतिक अवसर बताया। BBC: Gen Z के विरोध का नया तरीका BBC की रिपोर्ट के अनुसार यह सिर्फ एक छात्र आंदोलन नहीं है, बल्कि नई पीढ़ी के विरोध दर्ज कराने का बदला हुआ तरीका है। रिपोर्ट में कहा गया कि आज के युवा केवल सड़कों पर उतरकर ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया, मीम्स और इंस्टाग्राम रील्स के जरिए भी अपनी बात रख रहे हैं। BBC ने पुलिस कार्रवाई, इंटरनेट बंद होने और सरकार का पक्ष भी रिपोर्ट में शामिल किया है। The New York Times: बेरोजगारी और पेपर लीक से उपजा गुस्सा The New York Times ने CJP आंदोलन को नौकरी, प्रतियोगी परीक्षाओं और शिक्षा व्यवस्था को लेकर युवाओं की नाराजगी से जोड़कर देखा है। रिपोर्ट के मुताबिक, एक व्यंग्यात्मक अभियान के रूप में शुरू हुआ "Cockroach" आंदोलन धीरे-धीरे लाखों युवाओं की आवाज बन गया। अखबार ने कहा कि आर्थिक विकास के दावों के बावजूद युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी और असंतोष ने आंदोलन को गति दी। The Guardian: पुलिस कार्रवाई के बाद भी नहीं रुके प्रदर्शनकारी ब्रिटेन के अखबार The Guardian ने अपनी रिपोर्ट में दिल्ली पुलिस की कार्रवाई को प्रमुखता से जगह दी। रिपोर्ट के अनुसार, लाठीचार्ज, आंसू गैस और इंटरनेट सेवाएं बंद किए जाने के बावजूद प्रदर्शनकारी पीछे नहीं हटे। अखबार ने इसे अब केवल शिक्षा सुधार का मुद्दा नहीं, बल्कि युवाओं की व्यापक राजनीतिक भागीदारी का संकेत बताया। Financial Times: सरकार के लिए बढ़ती राजनीतिक चुनौती Financial Times ने लिखा कि NEET पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा मुद्दा अब केंद्र सरकार के लिए एक गंभीर राजनीतिक चुनौती बन गया है। रिपोर्ट में पुलिस कार्रवाई, सुरक्षा व्यवस्था और सरकार की प्रतिक्रिया का जिक्र करते हुए कहा गया कि अब बहस केवल परीक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि जवाबदेही और लोकतांत्रिक अधिकारों तक पहुंच चुकी है। Al Jazeera: 2014 के बाद सबसे बड़ी युवा चुनौती Al Jazeera ने इस आंदोलन को 2014 के बाद मोदी सरकार के सामने उभरी सबसे बड़ी युवा चुनौती बताया। रिपोर्ट में संसद के भीतर विपक्ष के विरोध, देशभर में फैलते प्रदर्शनों, पुलिस कार्रवाई और मानवाधिकार संगठनों की प्रतिक्रियाओं का उल्लेख किया गया। चैनल के अनुसार, शिक्षा सुधार से शुरू हुआ आंदोलन अब सरकार की जवाबदेही से जुड़ा बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। Dawn: विपक्ष के लिए राजनीतिक अवसर पाकिस्तान के अखबार Dawn ने इस आंदोलन को विपक्ष के लिए युवाओं तक पहुंच बनाने का अवसर बताया। रिपोर्ट में कहा गया कि पुलिस कार्रवाई के बाद विपक्ष खुलकर प्रदर्शनकारियों के समर्थन में आया है, जिससे उसे राजनीतिक लाभ मिल सकता है। हालांकि अखबार ने यह भी कहा कि यदि आंदोलन पर राजनीति हावी हुई, तो शिक्षा सुधार, पेपर लीक और रोजगार जैसे मूल मुद्दे पीछे छूट सकते हैं। भारत में भी जारी है आंदोलन दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP का प्रदर्शन लगातार जारी है। प्रदर्शनकारी NEET पेपर लीक मामले में जवाबदेही तय करने, शिक्षा व्यवस्था में सुधार और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। वहीं सरकार ने पेपर लीक मामलों में दोषियों को जल्द सजा दिलाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाने की घोषणा की है, लेकिन आंदोलनकारी अपनी प्रमुख मांगों पर अब भी कायम हैं।  

kalpana जुलाई 23, 2026 0
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अमेरिकी संसद से 1.15 ट्रिलियन डॉलर का रक्षा विधेयक पास, रक्षा विभाग का नाम बदलने का प्रस्ताव

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रेड सी में हूती का बड़ा हमला, सऊदी के दो ऑयल टैंकर बने निशाना

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ईरान पर लगातार 12वीं रात अमेरिकी एयरस्ट्राइक, ट्रंप बोले- पीछे नहीं हटेंगे

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होर्मुज में जहाज पर हमला हुआ तो ईरान के पावर प्लांट उड़ाएंगे: ट्रंप

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को सख्त चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में किसी भी जहाज पर मिसाइल, ड्रोन या गोलीबारी से हमला किया गया, तो अमेरिका ईरान के भीतर पुलों, पावर प्लांट और अन्य रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाएगा। ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों देशों के बीच सैन्य और कूटनीतिक तनाव चरम पर है। ट्रंप की दो टूक चेतावनी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर लिखा कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले अमेरिकी या अन्य देशों के जहाजों पर ईरान की ओर से मिसाइल, ड्रोन या गोलीबारी की जाती है, तो अमेरिका इसका सीधा जवाब ईरान के महत्वपूर्ण रणनीतिक ठिकानों पर हमला करके देगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय नौवहन की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा। ईरान ने लगाए अंतरराष्ट्रीय कानून उल्लंघन के आरोप ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बगाई ने अमेरिका पर अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करने और ईरान की परमाणु सुविधाओं को निशाना बनाने की धमकी देने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि ईरान के शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी सभी जानकारियां पहले ही अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) को उपलब्ध कराई जा चुकी हैं। बगाई ने अमेरिकी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि कुछ स्थानों को लेकर लगाए जा रहे आरोप केवल सैन्य कार्रवाई का बहाना हैं। ईरान की पलटवार की चेतावनी ईरानी विदेश मंत्रालय ने कहा कि देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा पर किसी भी हमले का पूरी ताकत से जवाब दिया जाएगा। इस्माइल बगाई ने कहा कि ईरानी जनता किसी भी बाहरी आक्रामकता का सामना करने के लिए तैयार है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। लारक द्वीप पर कथित हमले से बढ़ा तनाव तनाव के बीच ईरानी मीडिया ने दावा किया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थित लारक द्वीप पर अमेरिकी मिसाइल हमला हुआ। ईरानी समाचार एजेंसी तसनीम के अनुसार, स्थानीय लोगों ने विस्फोट की आवाजें सुनीं और अधिकारी नुकसान का आकलन कर रहे हैं। हालांकि, अमेरिका ने इस कथित हमले की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, इसलिए इसकी स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हो सकी है।  

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US and Saudi officials sign a civilian nuclear cooperation agreement amid concerns over uranium enrichment and regional security.
US-Saudi Nuclear Deal: अमेरिका-सऊदी न्यूक्लियर डील पर क्यों मचा बवाल? क्या भविष्य में परमाणु बम बना सकेगा सऊदी अरब

अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हुए नए परमाणु सहयोग समझौते ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई बहस छेड़ दी है। इस समझौते के तहत अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब के नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में सहयोग करेंगी। साथ ही, सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन (Enrichment) की दिशा में तकनीकी सहायता मिलने का रास्ता भी खुल सकता है। हालांकि अमेरिका का कहना है कि यह समझौता केवल शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम तक सीमित है, लेकिन विशेषज्ञ इसे भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों से जोड़कर देख रहे हैं। क्या है अमेरिका-सऊदी न्यूक्लियर डील? अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट और सऊदी ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुलअजीज बिन सलमान ने शांतिपूर्ण परमाणु सहयोग से जुड़े समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके अलावा दोनों देशों के बीच परमाणु सुरक्षा मानकों को लेकर भी एक अलग समझौता हुआ है। अमेरिकी ऊर्जा विभाग के मुताबिक, इसका उद्देश्य सऊदी अरब में नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को विकसित करना है। हालांकि, समझौते का पूरा मसौदा अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है। क्यों उठ रहे हैं सवाल? विवाद की सबसे बड़ी वजह यूरेनियम संवर्धन (Enrichment) है। परमाणु बिजलीघरों के लिए कम स्तर का संवर्धित यूरेनियम इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन यही तकनीक अत्यधिक स्तर तक पहुंचने पर परमाणु हथियार बनाने में भी उपयोगी हो सकती है। यही कारण है कि कई विशेषज्ञ इस समझौते को भविष्य के संभावित परमाणु प्रसार के नजरिए से देख रहे हैं। क्या सऊदी अरब परमाणु बम बना सकेगा? फिलहाल ऐसा कोई आधिकारिक संकेत नहीं है कि सऊदी अरब परमाणु हथियार विकसित करेगा। अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि यह समझौता केवल नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए है और इसमें अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों का पालन किया जाएगा। हालांकि, विश्लेषकों का कहना है कि किसी भी देश के पास यदि यूरेनियम संवर्धन की क्षमता होती है तो भविष्य में उसका सैन्य उपयोग पूरी तरह असंभव नहीं माना जा सकता। अभी क्या होगी आगे की प्रक्रिया? समझौते को लागू करने से पहले इसे अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी मिलनी जरूरी है। माना जा रहा है कि रिपब्लिकन बहुमत के कारण इसके पारित होने की संभावना अधिक है, लेकिन कुछ सांसद सुरक्षा और परमाणु प्रसार के मुद्दे पर इसका विरोध कर सकते हैं। ईरान युद्ध के बीच क्यों अहम है यह समझौता? यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम और सैन्य कार्रवाई को लेकर तनाव चरम पर है। अमेरिका लगातार ईरान पर परमाणु हथियार विकसित करने की कोशिश का आरोप लगाता रहा है, जबकि ईरान इन आरोपों से इनकार करता है। ऐसे माहौल में सऊदी अरब के साथ परमाणु सहयोग समझौता पश्चिम एशिया में रणनीतिक संतुलन और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर नई बहस छेड़ सकता है। 5 सवालों में समझें पूरी डील ● अमेरिका और सऊदी के बीच क्या समझौता हुआ? दोनों देशों ने शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा सहयोग और सुरक्षा मानकों से जुड़े समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। ● क्या सऊदी यूरेनियम संवर्धन कर सकेगा? समझौते के तहत नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए तकनीकी सहयोग का रास्ता खुल सकता है। ● क्या इससे परमाणु हथियार बनने का खतरा है? अमेरिका इससे इनकार करता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यही तकनीक भविष्य में हथियार कार्यक्रम का आधार बन सकती है। ● क्या समझौता लागू हो गया है? नहीं। इसे लागू करने से पहले अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी आवश्यक है। ● दुनिया की चिंता क्या है? विशेषज्ञों को आशंका है कि यदि पश्चिम एशिया में अधिक देशों के पास यूरेनियम संवर्धन की क्षमता आती है, तो क्षेत्र में परमाणु हथियारों की नई होड़ शुरू हो सकती है।  

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