अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump के एक दूत ने आगामी FIFA World Cup 2026 को लेकर बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप के विशेष दूत पाओलो ज़ाम्पोली ने सुझाव दिया है कि क्वालिफाई कर चुकी Iran की जगह Italy को टूर्नामेंट में शामिल किया जाए।
ज़ाम्पोली ने कहा कि इटली जैसी चार बार की चैंपियन टीम का वर्ल्ड कप में होना खेल के लिए बेहतर होगा और यह उनके लिए “सपने जैसा” होगा।
Italy इस बार भी वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफाई नहीं कर सका। प्लेऑफ फाइनल में उसे Bosnia and Herzegovina के खिलाफ पेनल्टी शूटआउट में हार का सामना करना पड़ा।
अगर यह बदलाव होता है, तो इटली को टूर्नामेंट में एंट्री मिल सकती है, हालांकि यह पूरी तरह FIFA के नियमों और निर्णय पर निर्भर करेगा।
FIFA के नियमों के अनुसार, यदि कोई टीम टूर्नामेंट से हटती है तो उसकी जगह आमतौर पर उसी कॉन्फेडरेशन की रनर-अप या अगली योग्य टीम को मौका दिया जाता है।
इस आधार पर United Arab Emirates को प्राथमिकता मिल सकती है, जिसने एशियाई प्लेऑफ तक पहुंच बनाई थी। हालांकि, अंतिम फैसला FIFA अपने विवेक से भी ले सकता है।
Iran ने साफ कर दिया है कि वह वर्ल्ड कप में खेलने के लिए पूरी तरह तैयार है। पहले ईरान ने मैचों को अमेरिका से हटाकर मेक्सिको में कराने की मांग की थी, लेकिन अब टीम टूर्नामेंट में भाग लेने की योजना बना रही है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब Donald Trump और इटली की प्रधानमंत्री Giorgia Meloni के बीच रिश्तों में खटास की खबरें आई हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ऐसा फैसला लिया जाता है, तो इससे खेल और राजनीति के बीच की रेखा और धुंधली हो सकती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
ब्रातिस्लावा: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्लोवाकिया पहुंचने पर उनका पारंपरिक 'ब्रेड और नमक' (नून-रोटी) से स्वागत किया गया। किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली आधिकारिक स्लोवाकिया यात्रा है, जिसे दोनों देशों के संबंधों में एक ऐतिहासिक क्षण माना जा रहा है। ब्रातिस्लावा में प्रधानमंत्री मोदी के स्वागत के दौरान भारतीय संस्कृति और स्लोवाक परंपराओं का अनूठा संगम देखने को मिला। 'नून-रोटी' से हुआ पारंपरिक स्वागत स्लोवाकिया में मेहमानों के स्वागत के लिए 'ब्रेड एंड सॉल्ट' (चलिएब आ सोल) की सदियों पुरानी परंपरा है। इसे सम्मान, मित्रता और स्थायी संबंधों का प्रतीक माना जाता है। इस परंपरा के तहत मेहमान को ताजी ब्रेड और नमक परोसा जाता है, जिसे स्वीकार करना आपसी विश्वास और सम्मान का संकेत माना जाता है। भारत में भी 'नून-रोटी' का गहरा सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्व है। नमक को आजादी के आंदोलन और आत्मसम्मान से जोड़ा जाता है, जबकि रोटी जीवन, श्रम और आजीविका का प्रतीक मानी जाती है। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी का इस पारंपरिक रस्म के साथ स्वागत दोनों देशों के सांस्कृतिक जुड़ाव की एक खास तस्वीर पेश करता है। ब्रातिस्लावा में गूंजा 'वंदे मातरम्' प्रधानमंत्री मोदी के सम्मान में आयोजित कार्यक्रम का सबसे बड़ा आकर्षण स्लोवाकिया के प्रसिद्ध सांस्कृतिक समूह 'लुस्निका एंसेम्बल' की प्रस्तुति रही। कलाकारों ने भारतीय राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' की सामूहिक प्रस्तुति देकर उपस्थित लोगों का दिल जीत लिया। समूह के कलाकारों ने प्रधानमंत्री मोदी को विनम्र और आत्मीय बताते हुए कहा कि उनके सामने प्रस्तुति देना जीवन का यादगार अनुभव रहा। एक कलाकार ने कहा, "मैंने पहली बार किसी प्रधानमंत्री के सामने प्रस्तुति दी। यह पल हमेशा मेरे लिए खास रहेगा।" 'महादेव कीर्तन प्रोजेक्ट' ने बिखेरा आध्यात्मिक रंग स्वागत समारोह में स्लोवाक संगीत समूह 'महादेव कीर्तन प्रोजेक्ट' की प्रस्तुति ने भी विशेष आकर्षण पैदा किया। समूह के संस्थापक और प्रसिद्ध ड्रमर मारेक जिलिनेच ने कहा कि भारत की यात्रा के दौरान मंत्र संगीत और आध्यात्मिक धुनों ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया था। उन्होंने कहा, "भारत में मंत्रों और आध्यात्मिक संगीत को सुनने के बाद मुझे उसकी अद्भुत शक्ति का अनुभव हुआ। इसी प्रेरणा से मैंने 'महादेव कीर्तन प्रोजेक्ट' की शुरुआत की, ताकि इस अनुभव को दुनिया तक पहुंचा सकूं।" स्लोवाक लोक नृत्य ने भी जीता दिल प्रधानमंत्री मोदी ने मायावा क्षेत्र के प्रसिद्ध बाल लोक कला समूह 'कोपानिचियारिक' की प्रस्तुति भी देखी। रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में कलाकारों ने स्लोवाक लोक संस्कृति की झलक पेश की। प्रधानमंत्री ने इस प्रस्तुति की सराहना करते हुए कहा कि लोक परंपराएं किसी भी देश की सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक विरासत को जीवित रखने का महत्वपूर्ण माध्यम होती हैं। प्रवासी भारतीयों में दिखा उत्साह ब्रातिस्लावा में बड़ी संख्या में भारतीय समुदाय के लोग प्रधानमंत्री मोदी के स्वागत के लिए पहुंचे। होटल के बाहर 'भारत माता की जय' और 'वंदे मातरम्' के नारों के बीच प्रधानमंत्री ने लोगों का अभिवादन किया और उनसे बातचीत भी की। एक प्रवासी भारतीय ने कहा, "हमारे लिए यह गर्व और सौभाग्य की बात है कि हमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने का अवसर मिला। उन्होंने हम सभी का उत्साह बढ़ाया।" राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से करेंगे मुलाकात स्लोवाकिया पहुंचने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "ब्रातिस्लावा पहुंच गया हूं। यह यात्रा भारत और स्लोवाकिया के संबंधों को और गहरा करने तथा सहयोग के नए क्षेत्रों की तलाश का अवसर प्रदान करेगी।" अपने दौरे के दौरान प्रधानमंत्री मोदी स्लोवाकिया के राष्ट्रपति पीटर पेलेग्रिनी और प्रधानमंत्री रॉबर्ट फिको के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। बातचीत में व्यापार, निवेश, नवाचार, ऑटोमोबाइल निर्माण, रेलवे विकास और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर विशेष जोर रहेगा। संबंधों को मिलेगी नई गति विदेश मंत्रालय के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी की यह ऐतिहासिक यात्रा भारत और स्लोवाकिया के बीच राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक साझेदारी को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच बढ़ता सहयोग केवल व्यापार और निवेश तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि शिक्षा, संस्कृति और लोगों के बीच आपसी संबंधों को भी नई मजबूती देगा। ब्रातिस्लावा में प्रधानमंत्री मोदी का गर्मजोशी से हुआ स्वागत इसी मजबूत होते रिश्ते का प्रतीक माना जा रहा है।
तेहरान/वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते पर हस्ताक्षर से पहले ईरानी मीडिया ने 14 सूत्रीय समझौता ज्ञापन (MoU) का कथित मसौदा सार्वजनिक करने का दावा किया है। ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी मेहर न्यूज के मुताबिक, प्रस्तावित समझौते में अमेरिका की ओर से ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों को जारी करने, होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने, प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्र से अमेरिकी सैन्य मौजूदगी कम करने जैसे कई बड़े प्रावधान शामिल हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने इन दावों के कुछ हिस्सों पर अलग रुख अपनाते हुए कहा है कि ईरान की अवरुद्ध संपत्तियां तभी जारी की जाएंगी, जब तेहरान समझौते के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करेगा। 24 अरब डॉलर जारी करने का दावा, 12 अरब डॉलर पहले देने की शर्त मेहर न्यूज एजेंसी के अनुसार, 60 दिन की प्रस्तावित वार्ता अवधि के दौरान ईरान की कुल 24 अरब डॉलर की अवरुद्ध संपत्तियां जारी की जाएंगी। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इसमें से आधी राशि यानी 12 अरब डॉलर बातचीत शुरू होने से पहले ही ईरान को उपलब्ध कराई जाएगी। अमेरिकी अधिकारियों ने इस दावे का खंडन करते हुए कहा है कि यह "प्रदर्शन के बदले भुगतान" (Payment for Performance) का मॉडल होगा और ईरान के दायित्वों के पालन के बाद ही वित्तीय रियायतें दी जाएंगी। प्रस्तावित 14 बिंदुओं में क्या-क्या शामिल? ईरानी मीडिया के मुताबिक, प्रस्तावित समझौते के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं: लेबनान सहित सभी मोर्चों पर सैन्य अभियान तत्काल और स्थायी रूप से समाप्त होंगे। अमेरिका ईरान की संप्रभुता और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की प्रतिबद्धता देगा। अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी 30 दिनों के भीतर समाप्त की जाएगी। अमेरिका ईरान के आसपास तैनात सैन्य बलों की वापसी शुरू करेगा। होर्मुज जलडमरूमध्य को 30 दिनों के भीतर फिर से खोला जाएगा। ईरानी तेल और पेट्रोकेमिकल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों को निलंबित किया जाएगा। ईरान को अपने वित्तीय संसाधनों तक पूर्ण पहुंच दी जाएगी। अमेरिका और उसके सहयोगी देश ईरान के पुनर्निर्माण के लिए 300 अरब डॉलर तक की योजनाएं पेश करेंगे। परमाणु मुद्दों और प्रतिबंधों पर अंतिम समाधान के लिए 60 दिनों की वार्ता होगी। ईरान परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के तहत परमाणु हथियार विकसित नहीं करने की प्रतिबद्धता दोहराएगा। वार्ता अवधि में अमेरिका नए प्रतिबंध नहीं लगाएगा और अतिरिक्त सैन्य बल नहीं भेजेगा। 24 अरब डॉलर की अवरुद्ध संपत्तियां चरणबद्ध तरीके से जारी की जाएंगी। समझौते की निगरानी के लिए विशेष मॉनिटरिंग मैकेनिज्म बनाया जाएगा। ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रतिरोधी समूहों को समर्थन जैसे मुद्दों को वार्ता के एजेंडे से बाहर रखा जाएगा। ट्रंप की घोषणा के बाद बढ़ी चर्चा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते पर सहमति बन गई है और होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोले जाने की दिशा में प्रगति हुई है। ट्रंप ने कहा कि यह समझौता पश्चिम एशिया में स्थिरता और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को सामान्य बनाने में मदद करेगा। ईरान ने रखी अपनी शर्तें ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा है कि अंतिम समझौते की प्रक्रिया तभी आगे बढ़ेगी, जब अमेरिका युद्ध समाप्त करने, नाकेबंदी हटाने और फ्रीज की गई ईरानी संपत्तियों को जारी करने जैसे अपने वादों को पूरा करेगा। पाकिस्तान ने भी किया समझौते का दावा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता हो चुका है और उस पर औपचारिक हस्ताक्षर स्विट्जरलैंड में किए जाएंगे। उन्होंने इस प्रक्रिया में कतर, सऊदी अरब और तुर्किये की मध्यस्थता भूमिका की सराहना की। इजरायल की चुप्पी बनी चर्चा का विषय जहां कई देशों ने प्रस्तावित समझौते का स्वागत किया है, वहीं इजरायल की ओर से इस पर तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। इजरायल लंबे समय से ईरान और उसके समर्थित समूहों को लेकर अपनी सुरक्षा चिंताओं को प्रमुख मुद्दा बताता रहा है।
वॉशिंगटन: लेबनान की राजधानी बेरूत पर इजराइली हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ट्रंप ने इजराइल और ईरान दोनों को चेतावनी देते हुए कहा कि पश्चिम एशिया में शांति स्थापित करने के प्रयास निर्णायक चरण में हैं और ऐसे समय में किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई से बचना चाहिए। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट करते हुए कहा, “आज सुबह बेरूत पर हुआ हमला नहीं होना चाहिए था, खासकर ऐसे दिन जब हम ईरान के साथ शांति समझौते के बहुत करीब हैं।” ‘इजराइल को आत्मरक्षा का अधिकार, लेकिन जवाबी हमला बेमतलब था’ ट्रंप ने कहा कि इजराइल को अपनी सुरक्षा और खतरों से बचाव का पूरा अधिकार है, लेकिन जिस घटना के जवाब में यह हमला किया गया, उसमें कोई घायल या हताहत नहीं हुआ था। ऐसे में इस तरह की सैन्य कार्रवाई की आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने कहा, “इजराइल को अपने नागरिकों की रक्षा करने का अधिकार है, लेकिन इस मामले में की गई जवाबी कार्रवाई बेमतलब थी।” ‘अब आगे कोई हमला नहीं होना चाहिए’ अमेरिकी राष्ट्रपति ने सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील करते हुए कहा कि क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिए सभी पक्षों को पीछे हटना होगा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न केवल इजराइल को लेबनान में आगे कोई हमला नहीं करना चाहिए, बल्कि हिज्बुल्ला और अन्य संगठनों को भी इजराइल के खिलाफ किसी प्रकार की सैन्य कार्रवाई से बचना चाहिए। ट्रंप ने लिखा, “हम एक ऐसे समझौते के बेहद करीब हैं, जो लेबनान समेत पूरे क्षेत्र में शांति ला सकता है। सभी पक्षों को पीछे हटना चाहिए। इजराइल को लेबनान में और हमले नहीं करने चाहिए और हिज्बुल्ला समेत किसी भी अन्य पक्ष को भी इजराइल पर हमला नहीं करना चाहिए।”