बिहार

पटना हाईकोर्ट ने सरप्लस शिक्षकों की ट्रांसफर प्रक्रिया पर लगाई रोक, 4 हफ्तों में सरकार से मांगा जवाब

anjali kumari अगस्त 18, 2026 0
Bihar Teacher Transfer
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पटना, एजेंसियां। पटना हाईकोर्ट ने बिहार में सरप्लस शिक्षकों के स्थानांतरण और पदस्थापन की प्रक्रिया पर फिलहाल रोक लगा दी है। अदालत ने यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश देते हुए कहा है कि जो शिक्षक अभी जिस विद्यालय में तैनात हैं, वे अगले आदेश तक वहीं कार्यरत रहेंगे। साथ ही राज्य सरकार से मामले में चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा गया है।

 

सरप्लस शिक्षकों के तबादले पर रोक

 

यह आदेश न्यायमूर्ति अजीत कुमार की एकलपीठ ने शिक्षकों की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि सरप्लस शिक्षकों की पहचान और उनके स्थानांतरण की प्रक्रिया में कई विसंगतियां हैं।

 

अदालत के आदेश के बाद फिलहाल उन शिक्षकों का स्थानांतरण नहीं किया जा सकेगा, जिन्हें स्कूलों में सरप्लस शिक्षक के तौर पर चिह्नित किया गया है। पहले से जारी स्थानांतरण आदेशों पर भी यथास्थिति लागू रहेगी।

 

शिक्षकों ने प्रक्रिया में गड़बड़ी का उठाया मुद्दा

 

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में दलील दी गई कि सरप्लस शिक्षकों के निर्धारण और नए विद्यालयों में पदस्थापन के लिए अपनाई गई प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी नहीं है। कई शिक्षकों को दूर-दराज के विद्यालयों में भेजे जाने की आशंका के कारण मानसिक और व्यावहारिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

शिक्षकों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ललित किशोर और अधिवक्ता मृत्युंजय कुमार सिंह ने पक्ष रखा। अदालत ने दलीलें सुनने के बाद फिलहाल वर्तमान स्थिति बनाए रखने का आदेश दिया।

 

73 हजार से अधिक शिक्षकों ने किया था आवेदन

 

बिहार शिक्षा विभाग ने 29 जुलाई 2026 से शिक्षकों के स्थानांतरण की प्रक्रिया शुरू की थी। पहले चरण में सरप्लस शिक्षकों से स्थानांतरण के लिए आवेदन मांगे गए थे। विभाग के अनुसार करीब 73,151 शिक्षकों ने स्थानांतरण के लिए आवेदन किया था, जबकि राज्य के सरकारी स्कूलों में सरप्लस शिक्षकों की संख्या एक लाख से अधिक बताई गई है।

विभाग की योजना के अनुसार सरप्लस और पारस्परिक स्थानांतरण के बाद सामान्य तबादले की प्रक्रिया भी शुरू होनी थी। हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब इस पूरी प्रक्रिया के अगले चरण को लेकर भी स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार है।

 

21 सितंबर को होगी अगली सुनवाई

 

पटना हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को मामले में अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई 21 सितंबर 2026 को निर्धारित की गई है। तब तक संबंधित शिक्षकों की वर्तमान पदस्थापना में बदलाव नहीं किया जाएगा।

 

हाईकोर्ट के इस आदेश से सरप्लस सूची में शामिल हजारों शिक्षकों को फिलहाल राहत मिली है। अब उनकी नजरें अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां सरकार के जवाब के बाद स्थानांतरण नीति और प्रक्रिया को लेकर आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

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हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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पूर्णिया के युवक की जैश-ए-मोहम्मद से कथित कनेक्शन के आरोप में गिरफ्तारी, ATS की कार्रवाई से हड़कंप

पूर्णिया, एजेंसियां। बिहार के पूर्णिया निवासी 24 वर्षीय मोहम्मद जफर को उत्तर प्रदेश एटीएस ने जैश-ए-मोहम्मद से कथित संबंध और पाकिस्तान स्थित नेटवर्क को फंड भेजने के आरोप में गिरफ्तार किया है। जफर को मेरठ से 16 अगस्त को पकड़ा गया था। एटीएस के मुताबिक, वह मदरसे के नाम पर चंदा जुटाकर कथित तौर पर पाकिस्तान स्थित हैंडलर्स तक रकम पहुंचाने की कोशिश कर रहा था।   सोशल मीडिया गतिविधियों की जांच में सामने आए कनेक्शन   एटीएस के अनुसार, जफर के मोबाइल और सोशल मीडिया गतिविधियों की जांच के दौरान पाकिस्तान से जुड़े कई व्हाट्सऐप समूहों और जैश-ए-मोहम्मद से संबंधित सामग्री का पता चला। एजेंसी का दावा है कि वह मसूद अजहर के भाषण और कथित जिहादी सामग्री सोशल मीडिया पर साझा करता था। जांच एजेंसी अब उसके संपर्कों और नेटवर्क की विस्तृत पड़ताल कर रही है।   पाकिस्तान भेजने की कोशिश का आरोप   जांच में सामने आया है कि जफर पर मदरसे के नाम पर जुटाई गई रकम को पाकिस्तान स्थित हैंडलर्स तक पहुंचाने का आरोप है। एटीएस के मुताबिक, उसने क्रिप्टोकरेंसी के जरिए भी रकम ट्रांसफर करने की कोशिश की थी। एक रिपोर्ट के अनुसार, यह रकम 5,000 अमेरिकी डॉलर से अधिक थी।   मेरठ में पढ़ाई के दौरान संपर्क में आने का दावा   एटीएस के अनुसार, जफर मूल रूप से पूर्णिया जिले के मीरगंज गांव का रहने वाला है और पहले मेरठ के एक मदरसे में पढ़ाई कर चुका है। जांच एजेंसी का दावा है कि इसी दौरान वह जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ी विचारधारा और ऑनलाइन समूहों के संपर्क में आया। गिरफ्तारी के बाद उसे लखनऊ की विशेष अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेजे जाने की जानकारी सामने आई है।   जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि जफर के पाकिस्तान स्थित संपर्कों के अलावा भारत में और कौन-कौन लोग उसके नेटवर्क से जुड़े थे। मामले में आगे और गिरफ्तारियां या खुलासे होने की संभावना से इनकार नहीं किया गया है।

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बिहार में IAS अधिकारियों के बड़े प्रशासनिक फेरबदल की खबर
Bihar IAS Transfer: बिहार में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल, कई IAS अधिकारियों का तबादला

पटना। बिहार सरकार ने सोमवार देर रात प्रशासनिक स्तर पर बड़ा फेरबदल करते हुए कई भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारियों का तबादला और नई पदस्थापना की है। सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से इसका आदेश जारी किया गया। इस फेरबदल में अपर मुख्य सचिव, प्रधान सचिव, सचिव समेत कई जिलों के जिलाधिकारियों की जिम्मेदारियां बदली गई हैं। कुछ अधिकारियों को अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया है।   एच. आर. श्रीनिवास बने ग्रामीण विकास विभाग के अपर मुख्य सचिव     1996 बैच के IAS अधिकारी एच. आर. श्रीनिवास को समाज कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव पद से स्थानांतरित कर ग्रामीण विकास विभाग का अपर मुख्य सचिव बनाया गया है। वह जांच आयुक्त, सामान्य प्रशासन विभाग के अतिरिक्त प्रभार में पूर्ववत बने रहेंगे।   1997 बैच के IAS अधिकारी पंकज कुमार को ग्रामीण विकास विभाग के प्रधान सचिव पद से हटाकर गृह विभाग का प्रधान सचिव बनाया गया है। उन्हें जांच आयुक्त, सामान्य प्रशासन विभाग का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया है।   विनय कुमार को वित्त विभाग की जिम्मेदारी     1999 बैच के IAS अधिकारी विनय कुमार को नगर विकास एवं आवास विभाग के प्रधान सचिव पद से स्थानांतरित कर वित्त विभाग का प्रधान सचिव बनाया गया है। उन्हें नगर विकास एवं आवास विभाग का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया है।   वहीं राजेश कुमार को लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग के प्रधान सचिव पद से हटाकर पटना प्रमंडल का आयुक्त बनाया गया है। पटना के वर्तमान आयुक्त मयंक वरवड़े को निगरानी विभाग का प्रधान सचिव नियुक्त किया गया है।   संजय कुमार सिंह को मद्य निषेध विभाग की जिम्मेदारी     2007 बैच के IAS अधिकारी संजय कुमार सिंह को वित्त विभाग के सचिव पद से स्थानांतरित कर मद्य निषेध, उत्पाद एवं निबंधन विभाग का सचिव बनाया गया है। वह वाणिज्य कर विभाग, GST और मुख्यमंत्री सचिवालय के अतिरिक्त प्रभार में बने रहेंगे।   वहीं विनोद सिंह गुंजियाल को शिक्षा विभाग के सचिव के अतिरिक्त प्रभार से मुक्त कर समाज कल्याण विभाग का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है।   शिक्षा विभाग में भी बदलाव     2010 बैच के IAS अधिकारी राजीव रौशन को उच्च शिक्षा विभाग के सचिव पद से स्थानांतरित कर शिक्षा विभाग का सचिव बनाया गया है। वह उच्च शिक्षा विभाग के सचिव और वित्त विभाग में सचिव (संसाधन) का अतिरिक्त प्रभार भी संभालेंगे।   बी. कार्तिकेय धनजी को लघु जल संसाधन विभाग से स्थानांतरित कर लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग का सचिव बनाया गया है। वह जांच आयुक्त, सामान्य प्रशासन विभाग के अतिरिक्त प्रभार में बने रहेंगे।   कई जिलों के जिलाधिकारी भी बदले     सरकार ने जिला स्तर पर भी बड़ा बदलाव किया है। प्रमुख नियुक्तियां इस प्रकार हैं:   मनेश कुमार मीणा को निदेशक, खान पद से स्थानांतरित कर भोजपुर का जिलाधिकारी बनाया गया है। रिची पाण्डेय को सीतामढ़ी के जिलाधिकारी पद से स्थानांतरित कर बेगूसराय का डीएम बनाया गया है। विजय प्रकाश मीणा को सीवान का जिलाधिकारी नियुक्त किया गया है। तनय सुल्तानिया को भोजपुर के डीएम पद से हटाकर सीतामढ़ी का जिलाधिकारी बनाया गया है। सभी संबंधित अधिकारियों को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा-14 के तहत संबंधित जिले का जिला दंडाधिकारी भी नियुक्त किया गया है।   इन अधिकारियों को मिला अतिरिक्त प्रभार     सरकार ने कुछ वरिष्ठ अधिकारियों को अतिरिक्त जिम्मेदारियां भी सौंपी हैं। 1995 बैच के IAS अधिकारी अरविंद कुमार चौधरी, जो मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग के अपर मुख्य सचिव हैं, अगले आदेश तक बिपार्ड के महानिदेशक का अतिरिक्त प्रभार संभालेंगे।   वहीं जल संसाधन विभाग के सचिव चंद्रशेखर सिंह को लघु जल संसाधन विभाग का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। नवदीप शुक्ला को बिहार शिक्षा परियोजना परिषद के परियोजना निदेशक का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। सरकार के इस बड़े प्रशासनिक फेरबदल के बाद राज्य के कई महत्वपूर्ण विभागों और जिलों की प्रशासनिक कमान में बदलाव हुआ है।

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Bihar government restricts transfers of census officials and trained staff until March 31, 2027
बिहार में जनगणना 2027 को लेकर बड़ा आदेश, 31 मार्च तक BDO-CO समेत इन अधिकारियों के तबादले पर रोक

Bihar Census 2027: बिहार में आगामी जनगणना की तैयारियों को लेकर राज्य सरकार ने महत्वपूर्ण प्रशासनिक फैसला लिया है। जनगणना कार्य से सीधे जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों के तबादले पर 31 मार्च 2027 तक रोक लगा दी गई है। इस आदेश के दायरे में बीडीओ, सीओ, चार्ज अधिकारी, प्रगणक, पर्यवेक्षक और जनगणना से जुड़े अन्य प्रशिक्षित कर्मी शामिल हैं। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि जनगणना 2027 राष्ट्रीय महत्व का महत्वपूर्ण और कानूनी कार्य है। इसे समय पर और निर्धारित मानकों के अनुसार पूरा कराने के लिए जनगणना से जुड़े कर्मचारियों की तैनाती में निरंतरता जरूरी है। BDO और CO की जिम्मेदारी भी तय जनगणना कार्य के लिए जिला से लेकर प्रखंड स्तर तक अधिकारियों की जिम्मेदारियां निर्धारित की गई हैं। जिलाधिकारी को प्रधान जिला जनगणना अधिकारी, जिला सांख्यिकी अधिकारी को अपर जिला जनगणना अधिकारी, जबकि बीडीओ और अंचलाधिकारी यानी सीओ को चार्ज अधिकारी की जिम्मेदारी दी गई है। इसके अलावा विभिन्न विभागों के कर्मचारियों को भी जनगणना कार्य में लगाया गया है। शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों को प्रगणक एवं पर्यवेक्षक के रूप में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। 31 मार्च 2027 तक मौजूदा तैनाती पर रहेंगे कर्मचारी सरकार के आदेश के मुताबिक जनगणना कार्य में लगे अधिकारियों और कर्मचारियों को 31 मार्च 2027 तक उनके वर्तमान पदस्थापन पर बनाए रखने का निर्देश दिया गया है। सक्षम अनुमति के बिना ऐसे किसी अधिकारी या कर्मचारी का तबादला नहीं किया जा सकेगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जनगणना की प्रक्रिया के बीच अधिकारियों के बदलने से काम प्रभावित न हो और प्रशिक्षित कर्मचारियों के अनुभव का इस्तेमाल लगातार किया जा सके। सामान्य तबादलों के बीच क्यों लिया गया फैसला? विभाग के संज्ञान में आया था कि सामान्य प्रशासनिक तबादलों के दौरान जनगणना कार्य से जुड़े चार्ज अधिकारियों, कोषांग के कर्मचारियों, प्रशिक्षित प्रगणकों और पर्यवेक्षकों के भी स्थानांतरण किए जा रहे थे। ऐसे में सरकार ने जनगणना कार्य की निरंतरता बनाए रखने के लिए विशेष निर्देश जारी किया है। अब जनगणना से जुड़े कर्मियों को बीच में हटाने के लिए सक्षम स्तर से अनुमति जरूरी होगी। क्यों महत्वपूर्ण है यह आदेश? जनगणना के दौरान बड़ी संख्या में अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका होती है। एक बार प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके कर्मियों को बदलने से नए कर्मचारियों को दोबारा प्रशिक्षित करने, जिम्मेदारियां समझाने और काम में समन्वय स्थापित करने में समय लग सकता है।  

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