पटना, एजेंसियां। बिहार सरकार ने पुलिस प्रशासन में बड़ा फेरबदल करते हुए 18 IPS अधिकारियों का तबादला किया है। इस बदलाव में कई जिलों के पुलिस अधीक्षक (SP) भी बदले गए हैं। खास तौर पर सिवान और भोजपुर के SP को हटाकर नई जिम्मेदारियां दी गई हैं। यह बदलाव ऐसे समय हुआ है जब दोनों जिलों में हाल की घटनाओं को लेकर पुलिस प्रशासन पर सवाल उठे थे।
तबादला सूची में सिवान के SP पूरण झा और भोजपुर के SP को भी बदला गया है। सिवान में छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिस की ओर से AK-47 से फायरिंग की घटना के बाद मामला काफी चर्चा में रहा था। पुलिस मुख्यालय ने बताया था कि भीड़ से घिरे पुलिस बल की सुरक्षा के लिए हवा में चार राउंड फायर किए गए थे। इस घटना के बाद सिवान के पुलिस नेतृत्व में बदलाव हुआ है।
सरकार के आदेश के तहत कुल 18 IPS अधिकारियों का पुनर्गठन किया गया है। इसमें जिलों के पुलिस कप्तानों के अलावा अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को भी नई जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। सरकार के इस फैसले का उद्देश्य पुलिस प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाना और कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में प्रशासनिक जवाबदेही मजबूत करना माना जा रहा है।
बिहार में हाल के दिनों में छात्र आंदोलनों, आपराधिक घटनाओं और पुलिस कार्रवाई को लेकर राजनीतिक बहस तेज रही है। ऐसे समय में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के तबादले को महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम माना जा रहा है। खासकर सिवान और भोजपुर जैसे जिलों में पुलिस नेतृत्व में बदलाव पर राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर नजर बनी हुई है।
यह बिहार पुलिस में हालिया समय का एकमात्र बदलाव नहीं है। इसी अवधि में 11 DSP रैंक के अधिकारियों का भी तबादला किया गया है, जिसमें STF, EOU, CID और मद्यनिषेध जैसी इकाइयों में नई तैनातियां शामिल हैं। इससे संकेत मिलता है कि सरकार पुलिस विभाग के अलग-अलग स्तरों पर व्यापक प्रशासनिक पुनर्गठन कर रही है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
पटना, एजेंसियां। बिहार सरकार ने पुलिस प्रशासन में बड़ा फेरबदल करते हुए 18 IPS अधिकारियों का तबादला किया है। इस बदलाव में कई जिलों के पुलिस अधीक्षक (SP) भी बदले गए हैं। खास तौर पर सिवान और भोजपुर के SP को हटाकर नई जिम्मेदारियां दी गई हैं। यह बदलाव ऐसे समय हुआ है जब दोनों जिलों में हाल की घटनाओं को लेकर पुलिस प्रशासन पर सवाल उठे थे। सिवान और भोजपुर के SP बदले तबादला सूची में सिवान के SP पूरण झा और भोजपुर के SP को भी बदला गया है। सिवान में छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिस की ओर से AK-47 से फायरिंग की घटना के बाद मामला काफी चर्चा में रहा था। पुलिस मुख्यालय ने बताया था कि भीड़ से घिरे पुलिस बल की सुरक्षा के लिए हवा में चार राउंड फायर किए गए थे। इस घटना के बाद सिवान के पुलिस नेतृत्व में बदलाव हुआ है। 18 IPS अधिकारियों को नई जिम्मेदारी सरकार के आदेश के तहत कुल 18 IPS अधिकारियों का पुनर्गठन किया गया है। इसमें जिलों के पुलिस कप्तानों के अलावा अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को भी नई जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। सरकार के इस फैसले का उद्देश्य पुलिस प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाना और कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में प्रशासनिक जवाबदेही मजबूत करना माना जा रहा है। कानून-व्यवस्था को लेकर अहम बदलाव बिहार में हाल के दिनों में छात्र आंदोलनों, आपराधिक घटनाओं और पुलिस कार्रवाई को लेकर राजनीतिक बहस तेज रही है। ऐसे समय में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के तबादले को महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम माना जा रहा है। खासकर सिवान और भोजपुर जैसे जिलों में पुलिस नेतृत्व में बदलाव पर राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर नजर बनी हुई है। पुलिस महकमे में लगातार फेरबदल यह बिहार पुलिस में हालिया समय का एकमात्र बदलाव नहीं है। इसी अवधि में 11 DSP रैंक के अधिकारियों का भी तबादला किया गया है, जिसमें STF, EOU, CID और मद्यनिषेध जैसी इकाइयों में नई तैनातियां शामिल हैं। इससे संकेत मिलता है कि सरकार पुलिस विभाग के अलग-अलग स्तरों पर व्यापक प्रशासनिक पुनर्गठन कर रही है।
मेरठ में कथित आतंकी नेटवर्क से जुड़े मामले में मोहम्मद जफर की गिरफ्तारी के बाद सुरक्षा एजेंसियों की जांच अब पूर्णिया के मीरगंज गांव तक पहुंच गई है। मंगलवार को रौटा पुलिस और सशस्त्र सीमा बल की टीम जफर के पैतृक घर पहुंची और परिवार के सदस्यों से करीब तीन घंटे तक पूछताछ की। जांच एजेंसियां जफर की पढ़ाई, उसके संपर्कों, हाल की गतिविधियों, यात्रा और कथित वित्तीय लेनदेन से जुड़ी जानकारियां जुटा रही हैं। हालांकि, जफर पर लगाए गए आरोपों और उसकी कथित भूमिका को लेकर अंतिम निष्कर्ष जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा। परिवार से पूछताछ, शिक्षा और संपर्कों पर फोकस सुरक्षा एजेंसियों ने जफर के माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों से उसकी पढ़ाई, मदरसे से जुड़े काम, शादी और घर से बाहर रहने के बारे में जानकारी ली। पूछताछ में यह जानने की कोशिश की गई कि जफर ने किन जगहों पर पढ़ाई की, किन लोगों के संपर्क में रहा और हाल के दिनों में उसकी गतिविधियां क्या थीं। परिवार से उसके घर से निकलने के बाद की पूरी यात्रा की जानकारी भी मांगी गई। पहले मधेपुरा, फिर पहुंचा मेरठ परिजनों के अनुसार जफर करीब 25 दिन पहले घर से निकला था। वह पहले मधेपुरा गया और इसके बाद मेरठ पहुंचा, जहां यूपी एटीएस ने उसे गिरफ्तार किया। अब जांच एजेंसियां मधेपुरा में उसके ठहरने की जगह और वहां बने संभावित संपर्कों की जानकारी जुटा रही हैं। इसके साथ ही मेरठ में उसकी गतिविधियों और संपर्कों की भी पड़ताल की जा रही है। मई में हुई थी शादी परिवार के मुताबिक जफर की शादी इसी साल मई में किशनगंज जिले के बहादुरगंज क्षेत्र में हुई थी। परिजनों का कहना है कि शादी के बाद वह पहली बार घर से बाहर निकला था। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि घर से निकलने के बाद उसकी यात्रा का उद्देश्य क्या था और इस दौरान वह किन लोगों के संपर्क में आया। मदरसे में पढ़ाई और बच्चों को पढ़ाने का काम उपलब्ध जानकारी के अनुसार जफर ने शुरुआती पढ़ाई मीरगंज के एक मदरसे से की थी। इसके बाद उसने बुलंदशहर में रहकर मौलवी की शिक्षा पूरी की। बाद में वह पूर्णिया लौटा और माधोपाड़ा स्थित एक मदरसे में बच्चों को पढ़ाने का काम करने लगा। एजेंसियां उसके शैक्षणिक और सामाजिक संपर्कों से संबंधित जानकारी भी जुटा रही हैं। हालांकि, किसी व्यक्ति की शिक्षा, भाषा या धार्मिक संस्थान से जुड़ाव मात्र से उसकी आपराधिक गतिविधि में भूमिका साबित नहीं होती। इस मामले में निष्कर्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही निकलेगा। पासपोर्ट और यात्रा रिकॉर्ड भी जांच के दायरे में जफर के नाम पर पासपोर्ट होने की जानकारी सामने आने के बाद सुरक्षा एजेंसियां इससे जुड़े दस्तावेज और यात्रा रिकॉर्ड की जांच कर रही हैं। जांच में यह देखा जा रहा है कि पासपोर्ट कब बना, किन दस्तावेजों का इस्तेमाल हुआ और क्या इससे जुड़ी कोई विदेश यात्रा दर्ज है। एनआईए इनपुट पर गिरफ्तारी का दावा रिपोर्ट के अनुसार एनआईए के इनपुट के आधार पर यूपी एटीएस ने जफर को मेरठ से गिरफ्तार किया। उस पर कथित तौर पर जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ाव और संदिग्ध वित्तीय गतिविधियों के आरोप लगाए गए हैं। आरोप यह भी है कि वह कथित तौर पर चंदा जुटाने और क्रिप्टोकरेंसी के जरिए पाकिस्तान में मौजूद संदिग्ध आतंकी हैंडलर्स तक धन पहुंचाने की कोशिश से जुड़ा था। इन आरोपों की पुष्टि जांच एजेंसियों की कार्रवाई और आगे की कानूनी प्रक्रिया से ही होगी। फिलहाल पूर्णिया में हुई पूछताछ को इसी जांच की अगली कड़ी माना जा रहा है। एजेंसियां मधेपुरा से मेरठ तक जफर की यात्रा, उसके संपर्कों और कथित वित्तीय गतिविधियों की कड़ियां जोड़ने में जुटी हैं।
बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव जीतकर विधायक बने प्रशांत किशोर ने शपथ लेने के अगले ही दिन क्षेत्र की स्थानीय समस्याओं को लेकर सक्रियता दिखानी शुरू कर दी है। उन्होंने बिहार के डीजीपी विनय कुमार से मुलाकात कर बांकीपुर से जुड़े तीन अहम मुद्दे पुलिस प्रशासन के सामने रखे। प्रशांत किशोर ने ट्रैफिक व्यवस्था, वेंडरों से कथित वसूली और युवाओं में नशीले पदार्थों के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर तत्काल कार्रवाई की जरूरत बताई। उनका कहना है कि इन समस्याओं का समाधान केवल तात्कालिक कार्रवाई से नहीं, बल्कि लंबे समय की ठोस योजना से होना चाहिए। ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने पर जोर डीजीपी के साथ बैठक में बांकीपुर की यातायात व्यवस्था प्रमुख मुद्दों में रही। प्रशांत किशोर ने कहा कि पटना के महत्वपूर्ण विधानसभा क्षेत्रों में शामिल बांकीपुर में लगातार बढ़ते यातायात दबाव को देखते हुए दीर्घकालिक योजना बनाना जरूरी है। उन्होंने ट्रैफिक व्यवस्था को व्यवस्थित करने और आने वाले वर्षों में स्थायी सुधार की दिशा में काम करने पर जोर दिया। वेंडरों से कथित वसूली का मामला उठाया प्रशांत किशोर ने क्षेत्र में अनियमित वेंडिंग व्यवस्था के साथ-साथ पुलिसकर्मियों द्वारा वेंडरों से कथित तौर पर पैसे लिए जाने की शिकायत भी डीजीपी के सामने रखी। उन्होंने इस मामले में उचित कार्रवाई और वेंडिंग व्यवस्था को व्यवस्थित करने की जरूरत बताई। प्रशांत किशोर के अनुसार, इस मुद्दे पर सरकार के साथ भी बातचीत कर समाधान निकालने का प्रयास किया जाएगा। युवाओं में नशे की समस्या पर चिंता बैठक में युवाओं और बच्चों के बीच नशीले पदार्थों के इस्तेमाल की शिकायत भी उठाई गई। प्रशांत किशोर ने पुलिस निगरानी मजबूत करने और ऐसी गतिविधियों पर प्रभावी रोक लगाने की मांग की। उनका कहना है कि युवाओं को नशे से दूर रखना केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि क्षेत्र के भविष्य से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है। विधायक बनने के बाद स्थानीय मुद्दों पर फोकस बांकीपुर उपचुनाव जीतने के बाद प्रशांत किशोर ने क्षेत्र की स्थानीय समस्याओं को अपनी प्राथमिकता में शामिल किया है। रोजगार को लेकर भी वह पहले ही बड़ा दावा कर चुके हैं। उन्होंने बांकीपुर के कम से कम 10 हजार युवाओं को निजी क्षेत्र में रोजगार दिलाने में मदद करने की बात कही है। अब देखना होगा कि डीजीपी के साथ हुई बैठक के बाद इन तीनों मुद्दों पर प्रशासन कितनी तेजी से कार्रवाई करता है और बांकीपुर के लोगों को इसका कितना लाभ मिलता है।