स्वास्थ्य

आंत के स्वास्थ्य पर भारत की नई वैज्ञानिक खोज

भारत के आदिवासी समुदायों में आंत के माइक्रोबायोम पर बड़ी खोज, 14 नई बैक्टीरिया प्रजातियां मिलीं

ranjan kumar tiwari अगस्त 5, 2026 0
आंत के माइक्रोबायोम पर भारतीय वैज्ञानिकों का शोध
भारतीय माइक्रोबायोम शोध में नई बैक्टीरिया प्रजातियां

भारत में आंत के स्वास्थ्य पर नई खोज, आदिवासी समुदायों में मिलीं 14 नई बैक्टीरिया प्रजातियां

पुणे, एजेंसियां। भारत में आंत के स्वास्थ्य और माइक्रोबायोम को लेकर वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता मिली है। पुणे स्थित BRIC-नेशनल सेंटर फॉर सेल साइंस (NCCS) के शोधकर्ताओं ने भारत के अलग-अलग आदिवासी समुदायों के आंत माइक्रोबायोम का अध्ययन किया। शोध में करीब 200 ऐसे माइक्रोबियल स्ट्रेन सामने आए, जिनका पहले दस्तावेजीकरण नहीं हुआ था। इनमें 14 नई बैक्टीरियल प्रजातियां भी शामिल हैं।

 

आठ आदिवासी समुदायों पर किया गया अध्ययन

 

 

शोधकर्ताओं ने भारत के चार अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में रहने वाले आठ आदिवासी समुदायों के 76 स्वस्थ वयस्कों के आहार और मल के नमूनों का अध्ययन किया। शोध का उद्देश्य यह समझना था कि पारंपरिक खान-पान और जीवनशैली आंत में मौजूद सूक्ष्मजीवों की संरचना को किस तरह प्रभावित करते हैं। अध्ययन से पता चला कि अलग-अलग समुदायों के पारंपरिक आहार के अनुसार उनके आंत माइक्रोबायोम में भी उल्लेखनीय अंतर पाया जाता है।

 

 

पारंपरिक आहार का आंत के बैक्टीरिया पर असर

 

 

वैज्ञानिकों के अनुसार लंबे समय से चले आ रहे पारंपरिक आहार का आंत के माइक्रोबायोम पर महत्वपूर्ण प्रभाव दिखाई देता है। अलग-अलग क्षेत्रों में दूध, अनाज, जड़ वाली सब्जियों, कंद और अन्य स्थानीय खाद्य पदार्थों की खपत के साथ आंत में मौजूद बैक्टीरिया की संरचना भी अलग पाई गई।

 

शोध इस बात की ओर भी संकेत करता है कि आधुनिक और अत्यधिक प्रसंस्कृत भोजन से अलग पारंपरिक आहार मानव माइक्रोबायोम की विविधता को समझने के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

 

भविष्य में स्वास्थ्य अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण

 

 

वैज्ञानिकों का मानना है कि भारत के विभिन्न समुदायों के माइक्रोबायोम को समझना भविष्य में पोषण, प्रोबायोटिक्स और व्यक्तिगत स्वास्थ्य देखभाल से जुड़े शोध के लिए उपयोगी हो सकता है।

 

हालांकि, नई बैक्टीरिया प्रजातियों की खोज का मतलब यह नहीं है कि वे सभी सीधे तौर पर स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हैं। उनके स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों को समझने के लिए आगे विस्तृत प्रयोगशाला और चिकित्सकीय शोध की जरूरत होगी।

भारत सरकार की Indian Human Microbiome Initiative भी विभिन्न भारतीय समुदायों के माइक्रोबायोम का डेटाबेस तैयार करने की दिशा में काम कर रही है।

Popular post
शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Ranjan Kumar Tiwari Ranjan123

स्वास्थ्य

View more
Viagra Benefit
क्या कैंसर के फैलाव को रोक सकती है वियाग्रा? नई स्टडी में सामने आए उम्मीद जगाने वाले संकेत

नई दिल्ली, एजेंसियां। इरेक्टाइल डिस्फंक्शन (Erectile Dysfunction) के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा वियाग्रा (Viagra) अब कैंसर रिसर्च में भी चर्चा का विषय बन गई है। हाल ही में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन में दावा किया गया है कि वियाग्रा का सक्रिय तत्व सिल्डेनाफिल (Sildenafil) कैंसर कोशिकाओं के शरीर के अन्य हिस्सों में फैलने यानी मेटास्टेसिस (Metastasis) की प्रक्रिया को धीमा करने में मदद कर सकता है। यह अध्ययन इजराइल के वाइजमैन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस और क्लैलिट हेल्थ सर्विसेज के वैज्ञानिकों ने किया है। हालांकि शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह शुरुआती शोध है और इसे कैंसर का नया इलाज नहीं माना जाना चाहिए।   कैसे काम कर सकता है सिल्डेनाफिल?   शोध के अनुसार, कैंसर कोशिकाएं शरीर में फैलने के लिए काफी हद तक कोलेस्ट्रॉल पर निर्भर रहती हैं। सिल्डेनाफिल कोशिकाओं के भीतर कोलेस्ट्रॉल पहुंचाने वाले प्रोटीन की गतिविधि को बाधित करता है। इससे कैंसर कोशिकाओं को अपनी बाहरी झिल्ली (मेम्ब्रेन) बनाए रखने के लिए पर्याप्त कोलेस्ट्रॉल नहीं मिल पाता और उनका दूसरे अंगों तक फैलना कठिन हो सकता है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि यदि सिल्डेनाफिल को स्टैटिन (कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवा) के साथ दिया जाए तो इसका प्रभाव और बेहतर हो सकता है, क्योंकि यह संयोजन कैंसर कोशिकाओं को नया कोलेस्ट्रॉल बनाने और उपलब्ध कोलेस्ट्रॉल का उपयोग करने से भी रोक सकता है।   50 लाख लोगों के डेटा का विश्लेषण, लेकिन निष्कर्ष अभी अंतिम नहीं   शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में कैंसर कोशिकाओं और चूहों पर अध्ययन करने के अलावा करीब 50 लाख लोगों के मेडिकल रिकॉर्ड का विश्लेषण किया, जिसमें 40 हजार से अधिक कैंसर मरीज भी शामिल थे। अध्ययन में पाया गया कि जिन पुरुषों ने कैंसर का पता चलने से पहले सिल्डेनाफिल का इस्तेमाल किया था, उनमें जीवित रहने की दर अपेक्षाकृत बेहतर थी। जिन मरीजों ने सिल्डेनाफिल के साथ स्टैटिन भी ली थी, उनमें परिणाम और अधिक सकारात्मक दिखाई दिए। हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि इस अध्ययन से यह साबित नहीं होता कि बेहतर परिणाम केवल वियाग्रा की वजह से ही मिले।   विशेषज्ञों की सलाह- डॉक्टर की सलाह के बिना न लें वियाग्रा   स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस शोध के नतीजे उत्साहजनक जरूर हैं, लेकिन इन्हें अभी कैंसर के उपचार के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। सिल्डेनाफिल को कैंसर के मानक इलाज का हिस्सा बनने से पहले बड़े स्तर पर क्लिनिकल ट्रायल और अतिरिक्त वैज्ञानिक प्रमाणों की आवश्यकता होगी। विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि कैंसर की रोकथाम या इलाज के लिए डॉक्टर की सलाह के बिना वियाग्रा का सेवन बिल्कुल न करें। फिलहाल कैंसर के इलाज के लिए डॉक्टर द्वारा सुझाई गई मानक चिकित्सा ही सबसे सुरक्षित और प्रभावी विकल्प है।

abhishek singh अगस्त 5, 2026 0
आंत के माइक्रोबायोम पर भारतीय वैज्ञानिकों का शोध

भारत के आदिवासी समुदायों में आंत के माइक्रोबायोम पर बड़ी खोज, 14 नई बैक्टीरिया प्रजातियां मिलीं

Persistent lumps may have various causes, but growing or hard lumps should be evaluated by a doctor

शरीर में हर गांठ कैंसर नहीं, लेकिन इन बदलावों को बिल्कुल न करें नजरअंदाज; कब डॉक्टर को दिखाना जरूरी?

भारत में अंग प्रत्यारोपण का नया रिकॉर्ड

भारत में पहली बार सालाना 20 हजार से ज्यादा अंग प्रत्यारोपण, 2025 में बने 20,138 ट्रांसप्लांट

वर्ल्ड ब्रेस्टफीडिंग वीक 2026 में स्तनपान से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी
World Breastfeeding Week 2026: स्तनपान कराने वाली हर मां को पता होनी चाहिए ये जरूरी बातें

नई दिल्ली, एजेंसियां। हर साल 1 से 7 अगस्त तक मनाए जाने वाले वर्ल्ड ब्रेस्टफीडिंग वीक का उद्देश्य माताओं को स्तनपान के महत्व के प्रति जागरूक करना और नवजात शिशुओं के बेहतर स्वास्थ्य को बढ़ावा देना है। विशेषज्ञों के अनुसार, मां का दूध शिशु के लिए सबसे संपूर्ण आहार है, जो पोषण के साथ-साथ उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी मजबूत करता है।   संतुलित आहार और पर्याप्त पानी है जरूरी     डॉक्टरों का कहना है कि स्तनपान कराने वाली महिलाओं को प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम और विटामिन से भरपूर भोजन करना चाहिए। दूध, दही, दाल, हरी सब्जियां, अंडे, मेवे और मौसमी फलों के साथ रोजाना 2.5 से 3 लीटर पानी पीना भी जरूरी है, ताकि शरीर में पानी की कमी न हो।     आराम, तनाव से दूरी और दवाओं में बरतें सावधानी     विशेषज्ञों के मुताबिक पर्याप्त नींद और तनावमुक्त रहना स्तनपान की प्रक्रिया को बेहतर बनाता है। किसी भी दवा का सेवन डॉक्टर की सलाह के बिना नहीं करना चाहिए। साथ ही धूम्रपान और शराब से पूरी तरह दूरी बनाए रखने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इसका असर शिशु के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।     स्वच्छता और परिवार का सहयोग निभाता है अहम भूमिका     बच्चे को दूध पिलाने से पहले हाथ धोना और स्तनों की सामान्य साफ-सफाई बनाए रखना जरूरी है। विशेषज्ञों का कहना है कि परिवार को भी मां को पौष्टिक भोजन, पर्याप्त आराम और भावनात्मक सहयोग देना चाहिए, ताकि वह बिना तनाव के शिशु की देखभाल कर सके।     मां और शिशु दोनों के लिए फायदेमंद है स्तनपान     डॉक्टरों के अनुसार, स्तनपान से शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, संक्रमण का खतरा कम होता है और उसका मानसिक व शारीरिक विकास बेहतर होता है। वहीं मां के लिए यह प्रसव के बाद रिकवरी में मददगार साबित होता है और स्तन व अंडाशय के कुछ प्रकार के कैंसर का जोखिम भी कम कर सकता है।  

ranjan kumar tiwari अगस्त 4, 2026 0
Slim person with hidden visceral fat around internal organs facing increased diabetes and blood pressure risks

बाहर से पतले, लेकिन अंदर से मोटे? शरीर में छिपा विसरल फैट बढ़ा सकता है BP और डायबिटीज का खतरा

Glaucoma patient following eye care, diabetes and blood pressure management to protect vision

डायबिटीज से लेकर हाई BP तक, ग्लूकोमा के मरीज इन 5 बातों को न करें नजरअंदाज, वरना बढ़ सकता है आंखों को नुकसान

40 वर्ष के बाद महिलाओं में ओवेरियन कैंसर के लक्षण

ओवेरियन कैंसर के संकेत समझें: 40 की उम्र के बाद इन लक्षणों को भूलकर भी न करें नजरअंदाज

Woman drinking aloe vera juice daily while learning about potential health benefits and safety precautions
30 दिन रोज एलोवेरा जूस पीने से क्या होगा? फायदे से ज्यादा जरूरी है ये सावधानी

एलोवेरा को आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा में लंबे समय से इस्तेमाल किया जाता रहा है। आजकल इसे लेकर सोशल मीडिया और हेल्थ कंटेंट में कई तरह के दावे किए जाते हैं। वजन घटाने से लेकर पाचन सुधारने, त्वचा में निखार लाने और इम्यूनिटी मजबूत करने तक, एलोवेरा जूस को कई फायदे से जोड़ा जाता है। लेकिन सवाल है कि अगर कोई व्यक्ति लगातार 30 दिनों तक रोज एलोवेरा जूस पीता है, तो वास्तव में शरीर पर क्या असर पड़ सकता है? इसका जवाब इतना सीधा नहीं है। एलोवेरा के कुछ मौखिक उपयोगों पर सीमित वैज्ञानिक शोध उपलब्ध है, लेकिन त्वचा चमकाने, शरीर से 'टॉक्सिन' निकालने या तेजी से फैट कम करने जैसे लोकप्रिय दावों के लिए पर्याप्त मजबूत प्रमाण नहीं हैं। इसलिए एलोवेरा जूस को किसी बीमारी का इलाज या वजन घटाने का शॉर्टकट मानना सही नहीं होगा। एलोवेरा जूस में क्या पाया जाता है? एलोवेरा के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग यौगिक पाए जाते हैं। इसके अंदरूनी जेल और पत्ते की बाहरी परत से मिलने वाला लेटेक्स एक जैसे नहीं होते। यही वजह है कि किसी एलोवेरा ड्रिंक की सुरक्षा इस बात पर भी निर्भर करती है कि उसे किस हिस्से से तैयार किया गया है और उसमें एलोइन जैसे एंथ्राक्विनोन यौगिक कितनी मात्रा में मौजूद हैं। NCCIH के अनुसार बाजार में मिलने वाले एलो उत्पादों में जेल, लेटेक्स या पूरे पत्ते के अर्क का इस्तेमाल हो सकता है। इसलिए सिर्फ 'एलोवेरा जूस' लिखा होना उसकी गुणवत्ता और सुरक्षा की गारंटी नहीं है। 30 दिन पीने पर पाचन में क्या असर हो सकता है? कुछ लोगों को एलोवेरा जूस लेने के बाद पाचन बेहतर महसूस हो सकता है। लेकिन इसे कब्ज, गैस या IBS का पक्का इलाज मानने के लिए पर्याप्त विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसके उलट, अगर किसी उत्पाद में एलो लेटेक्स मौजूद है, तो पेट में दर्द, ऐंठन और दस्त जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए पेट साफ करने के लिए एलोवेरा जूस का ज्यादा सेवन करना उल्टा नुकसान पहुंचा सकता है। क्या एलोवेरा जूस से त्वचा चमक सकती है? एलोवेरा में मौजूद कुछ यौगिकों में एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि देखी गई है। लेकिन रोज एलोवेरा जूस पीने से एक महीने में त्वचा चमकने लगेगी या मुंहासे खत्म हो जाएंगे, ऐसा दावा करने के लिए पर्याप्त मजबूत मानव-आधारित प्रमाण नहीं हैं। एलोवेरा के त्वचा संबंधी संभावित फायदे पर शोध मुख्य रूप से इसके बाहरी इस्तेमाल को लेकर भी हुआ है। इसलिए जूस को 'स्किन ग्लो' का निश्चित उपाय बताना सही नहीं होगा। क्या इम्यूनिटी मजबूत करता है? एलोवेरा में मौजूद कुछ जैव सक्रिय यौगिकों को लेकर रिसर्च जरूर हुई है, लेकिन रोज एलोवेरा जूस पीने से इम्यूनिटी में निश्चित और बड़ा सुधार होगा, यह साबित नहीं हुआ है। इम्यून सिस्टम को मजबूत रखने के लिए पर्याप्त नींद, संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि और आवश्यक टीकाकरण जैसी चीजों की भूमिका कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। क्या वजन तेजी से कम होगा? एलोवेरा जूस को वजन घटाने वाले पेय के तौर पर काफी प्रचारित किया जाता है, लेकिन इसे फैट बर्नर या 'डिटॉक्स ड्रिंक' मानना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है। कुछ सीमित शोध में खास एलो उत्पादों के सेवन के बाद वजन या फैट मास में मामूली बदलाव देखे गए हैं, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सामान्य एलोवेरा जूस 30 दिनों में वजन तेजी से कम कर देगा। वजन घटाने के लिए कैलोरी संतुलन, पौष्टिक भोजन और नियमित व्यायाम ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। सबसे जरूरी बात: हर एलोवेरा जूस सुरक्षित नहीं एलोवेरा का सेवन करते समय सबसे महत्वपूर्ण बात उत्पाद की गुणवत्ता और उसकी संरचना है। एलो लेटेक्स मुंह से लेने पर दस्त और पेट में ऐंठन पैदा कर सकता है। इसके अलावा, लंबे समय तक कुछ एलो लीफ एक्सट्रैक्ट के सेवन को लिवर की चोट के मामलों से भी जोड़ा गया है। Mayo Clinic भी एलोवेरा को उन हर्बल सप्लीमेंट्स में शामिल करता है जो कुछ परिस्थितियों में लिवर को नुकसान पहुंचा सकते हैं। गर्भावस्था और दवाइयां लेने वालों को विशेष सावधानी गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान मुंह से एलोवेरा लेना सुरक्षित नहीं माना जाता है और ऐसे समय में डॉक्टर से सलाह जरूरी है। इसी तरह यदि आप नियमित रूप से कोई दवा लेते हैं, तो एलोवेरा जूस या किसी हर्बल सप्लीमेंट को शुरू करने से पहले डॉक्टर या फार्मासिस्ट से सलाह लेना बेहतर है, क्योंकि हर्बल उत्पाद कुछ दवाओं के साथ इंटरैक्ट कर सकते हैं। तो क्या 30 दिन रोज एलोवेरा जूस पीना चाहिए? सिर्फ 30 दिन लगातार पीने से शरीर 'डिटॉक्स' हो जाएगा, खून साफ हो जाएगा या तेजी से वजन कम हो जाएगा, ऐसा मानना सही नहीं है। कुछ लोगों को सीमित लाभ महसूस हो सकते हैं, लेकिन इसके फायदे व्यक्ति, उत्पाद और उसकी मात्रा पर निर्भर करते हैं। अगर आप एलोवेरा जूस लेना चाहते हैं, तो लेबल पर सामग्री और एलोइन की जानकारी जरूर देखें और बिना सलाह के ज्यादा मात्रा में सेवन न करें। किसी बीमारी का इलाज चल रहा है, गर्भावस्था या स्तनपान की स्थिति है, या नियमित दवाएं चल रही हैं तो पहले डॉक्टर से सलाह लें।  

surbhi अगस्त 3, 2026 0
Ebola Virus

दिल्ली में संदिग्ध इबोला केस की जांच तेज, कांगो मिशन से लौटे BSF जवान का सैंपल जांच के लिए भेजा गया

Gallbladder

Gallbladder Health: बार-बार बदहजमी, पेट दर्द और मतली को न करें नजरअंदाज, पित्ताशय की खराबी के हो सकते हैं संकेत

इम्पोस्टर सिंड्रोम

Imposter Syndrome: सफलता के बाद भी खुद को अयोग्य समझते हैं? जानिए क्या है इम्पोस्टर सिंड्रोम

0 Comments

Top week

Smoke rises after reported airstrikes in Iraq as regional tensions escalate in West Asia
दुनिया

US-Saudi Strike: इराक में अमेरिका-सऊदी की संयुक्त कार्रवाई, 4 IRGC जवानों की मौत का दावा; पश्चिम एशिया में बढ़ा तनाव

kalpana जुलाई 30, 2026 0

Voting poll

अगर भविष्य में रश्मिका और विजय जीवनसाथी बनते हैं, तो क्या आपको उनकी जोड़ी पसंद होगी?