धनबाद: धनबाद में वायु प्रदूषण कम करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के तहत करोड़ों रुपये की राशि उपलब्ध करायी गयी, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा अब तक खर्च नहीं हो सका है। वित्तीय वर्ष 2023-24 से 2025-26 के बीच धनबाद को 147.06 करोड़ रुपये मिले, जिसमें से केवल 19.94 करोड़ रुपये ही खर्च किये गये। यानी करीब 127.12 करोड़ रुपये की राशि खर्च होने से बच गयी। उपलब्ध राशि का महज करीब 13.6 प्रतिशत ही इस्तेमाल किया जा सका।
केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 10 अगस्त को लोकसभा में यह जानकारी दी। खास बात यह है कि जहां प्रदूषण नियंत्रण के लिए बड़ी राशि उपलब्ध है, वहीं धनबाद की हवा अब भी राष्ट्रीय मानक से काफी खराब बनी हुई है। शहर में पीएम10 का स्तर लगातार निर्धारित सीमा से ऊपर दर्ज किया जा रहा है।
धनबाद में वायु गुणवत्ता में पिछले कुछ वर्षों के दौरान सुधार जरूर हुआ है, लेकिन प्रदूषण अभी भी गंभीर स्तर पर है। वर्ष 2017-18 में धनबाद में पीएम10 की वार्षिक औसत सांद्रता 315 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर थी। यह वर्ष 2024-25 में घटकर 138 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर हो गयी।
इस तरह करीब सात वर्षों में पीएम10 के स्तर में लगभग 56 प्रतिशत की कमी आयी है। इसके बावजूद यह आंकड़ा राष्ट्रीय वार्षिक मानक 60 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से करीब 78 माइक्रोग्राम अधिक है। यानी सुधार के बावजूद धनबाद अभी भी स्वच्छ हवा के तय मानक से काफी दूर है।
एनसीएपी के तहत मिलने वाली राशि का इस्तेमाल वायु प्रदूषण कम करने के लिए कई योजनाओं में किया जाता है। इसमें सड़कों की धूल कम करना, सड़कों का पक्कीकरण, हरित क्षेत्र विकसित करना, यातायात व्यवस्था में सुधार, माइक्रो फॉरेस्ट तैयार करना और अन्य प्रदूषण नियंत्रण उपाय शामिल हैं।
धनबाद में कोयला खनन, कोयले का परिवहन, औद्योगिक गतिविधियां और सड़क की धूल प्रदूषण के प्रमुख कारण माने जाते हैं। ऐसे में उपलब्ध राशि का समय पर और प्रभावी इस्तेमाल प्रदूषण नियंत्रण के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन करोड़ों रुपये खर्च नहीं होने से योजनाओं की गति पर सवाल उठ रहे हैं।
झारखंड के दूसरे बड़े शहरों में भी वायु प्रदूषण की स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है। रांची के लिए 2023-24 से 2025-26 के दौरान 68.62 करोड़ रुपये जारी किये गये, जिसमें से 39.95 करोड़ रुपये खर्च हुए।
वहीं, जमशेदपुर अर्बन एरिया के लिए इस अवधि में नयी राशि जारी नहीं की गयी, लेकिन 23.03 करोड़ रुपये खर्च किये गये। इसमें पिछले वर्षों में जारी राशि का उपयोग भी शामिल है। धनबाद, रांची और जमशेदपुर तीनों ही क्षेत्रों में इस अवधि के दौरान पीएम10 का स्तर राष्ट्रीय मानक से अधिक रहा।
एनसीएपी के तहत देश के 130 शहरों में वायु प्रदूषण कम करने के लिए योजनाएं चलायी जा रही हैं। वर्ष 2025-26 में इनमें से 108 शहरों में पीएम10 की सांद्रता में वर्ष 2017-18 की तुलना में कमी दर्ज की गयी।
इनमें 72 शहरों में 20 प्रतिशत से अधिक और 26 शहरों में 40 प्रतिशत से अधिक कमी आयी। हालांकि राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक हासिल करने वाले शहरों की संख्या अभी भी कम है। वर्ष 2025-26 में केवल 14 शहर ही इस मानक को पूरा कर सके।
एनसीएपी के तहत देश के 119 शहरों में प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों का अध्ययन कराया गया है। इसमें वाहनों, उद्योगों, सड़क की धूल, निर्माण कार्य और घरेलू ईंधन से होने वाले प्रदूषण का आकलन किया जा रहा है।
धनबाद जैसे कोयला आधारित शहर में इस तरह के अध्ययन की खास अहमियत है। प्रदूषण के स्रोतों की स्पष्ट पहचान होने के बाद संबंधित क्षेत्रों में प्रभावी कदम उठाये जा सकते हैं। अब सबसे बड़ी चुनौती उपलब्ध 127 करोड़ रुपये से अधिक की राशि का समय पर और सही तरीके से इस्तेमाल कर धनबाद की हवा को राष्ट्रीय मानक के करीब लाना है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
रांची। झारखंड विधानसभा में पेश नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टों ने ग्रामीण विकास से जुड़ी तीन बड़ी केंद्रीय योजनाओं—प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (PMAY-G), जल जीवन मिशन (JJM) और मनरेगा—के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल उठाए हैं। ऑडिट में योजना बनाने से लेकर धन के इस्तेमाल, कार्यों की प्रगति और निगरानी तक कई स्तरों पर कमियां और अनियमितताएं सामने आई हैं। पीएम आवास योजना में 6.32 लाख पात्र परिवार छूटे CAG की PMAY-G ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर 2022 तक झारखंड में 22.34 लाख पात्र परिवारों की पहचान की गई थी। लेकिन प्राथमिकता सूची में खामियों, लक्ष्यों का सही इस्तेमाल नहीं होने और लाभार्थियों की सूची को अंतिम रूप देने में करीब दो साल की देरी के कारण केंद्र ने केवल 16.02 लाख घरों का लक्ष्य आवंटित किया। इसका परिणाम यह हुआ कि करीब 6.32 लाख पात्र परिवार योजना के दायरे से बाहर रह गए। रिपोर्ट के अनुसार, 2016 से 2024 के बीच राज्य में 15,92,124 घर स्वीकृत किए गए थे, जबकि जनवरी 2025 तक 15,62,249 घरों का निर्माण पूरा हुआ था। रिपोर्ट ने योजना के वित्तीय प्रबंधन को भी अपर्याप्त बताया। उपलब्ध ₹20,199.98 करोड़ में से करीब ₹14,113 करोड़ ही खर्च किए गए और 2019 से 2024 के बीच धन के उपयोग का स्तर 55 से 83 प्रतिशत के बीच रहा। जल जीवन मिशन में हजारों योजनाएं अधूरी जल जीवन मिशन को लेकर भी CAG ने योजनाओं की धीमी प्रगति और वित्तीय एवं ठेका प्रबंधन में कमियां दर्ज की हैं। राज्य सरकार ने करीब ₹24,360 करोड़ की अनुमानित लागत से 98,067 योजनाओं को मंजूरी दी थी। इनमें से 97,535 योजनाएं करीब ₹24,665.29 करोड़ की सहमत लागत पर क्रियान्वयन के लिए ली गईं, लेकिन दिसंबर 2024 तक केवल 27,249 योजनाएं पूरी हो सकीं। CAG की आधिकारिक रिपोर्ट में ठेका प्रबंधन, खरीद प्रक्रिया, पानी की गुणवत्ता, स्रोत की उपलब्धता और योजनाओं की निगरानी से जुड़ी कमियों का भी उल्लेख है। कुछ मामलों में कम प्रतिस्पर्धा वाली निविदाओं और ठेकेदारों की पात्रता को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। मार्च 2025 तक झारखंड के 62,53,471 ग्रामीण परिवारों में से 34,31,115 परिवारों, यानी करीब 55 प्रतिशत को कार्यशील घरेलू नल कनेक्शन मिला था। यह उस समय के राष्ट्रीय स्तर के लगभग 80 प्रतिशत कवरेज से कम था। मनरेगा में मजदूरी बकाया और काम अधूरे मनरेगा की ऑडिट में विभाग के प्रमाणित वित्तीय खातों और NREGASoft पोर्टल के आंकड़ों में अंतर पाया गया। रिपोर्ट के मुताबिक 2019-20 से 2023-24 के बीच अकुशल श्रमिकों की करीब ₹321.84 करोड़ की मजदूरी बकाया थी। ऑडिट में यह भी सामने आया कि 2019 से मार्च 2024 के बीच काम के लिए प्रस्तावित 1,02,68,484 कार्यों में से केवल 27,96,044 यानी करीब 27 प्रतिशत ही पूरे हुए। वहीं 50,21,492 कार्य यानी करीब 49 प्रतिशत अधूरे थे। इन कार्यों पर करीब ₹2,633 करोड़ खर्च किए गए थे। CAG ने मनरेगा में सर्वेक्षण, जॉब कार्ड के रखरखाव, मस्टर रोल और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं में भी कमियां दर्ज की हैं। रिपोर्ट के बाद सरकार पर उठे सवाल CAG रिपोर्ट सामने आने के बाद झारखंड में राजनीतिक विवाद भी तेज हो गया है। विधानसभा में विपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी ने रिपोर्ट का हवाला देते हुए राज्य सरकार पर योजनाओं के क्रियान्वयन में प्रशासनिक लापरवाही और वित्तीय अनियमितताओं का आरोप लगाया है। उन्होंने सरकार से CAG की टिप्पणियों पर जवाब देने और जिम्मेदारी तय करने की मांग की है। हालांकि, CAG की रिपोर्ट में दर्ज अनियमितता का अर्थ अपने आप में भ्रष्टाचार साबित होना नहीं है। यह ऑडिट के दौरान सामने आई प्रक्रियागत, वित्तीय और क्रियान्वयन संबंधी कमियों को दर्शाती है। आगे सरकार की कार्रवाई और संबंधित विभागों के जवाब से यह स्पष्ट होगा कि किन मामलों में जिम्मेदारी तय की जाती है।
रांची: जेपीएससी-जेएसएससी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी और अनियमितताओं को लेकर चल रहे छात्र आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई का मामला अब राजनीतिक मुद्दा बन गया है. छात्रों पर हुए लाठीचार्ज को लेकर कांग्रेस के चार मंत्रियों ने प्रेस वार्ता कर भाजपा पर आंदोलन को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाया. वहीं, ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने लाठीचार्ज की घटना पर छात्रों से माफी भी मांगी. प्रेस वार्ता में वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर, ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय सिंह, कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की और स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी शामिल हुए. चारों मंत्रियों ने भाजपा पर छात्रों के मुद्दे को लेकर सरकार को घेरने और आंदोलन को राजनीतिक रूप देने का आरोप लगाया. वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने भाजपा पर साधा निशाना वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि विधानसभा के मानसून सत्र में सरकार छात्रों के मुद्दे पर चर्चा के लिए गंभीर थी. लेकिन भाजपा विधायकों ने सुबह मुख्यमंत्री आवास के बाहर धरना शुरू कर दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा की मंशा छात्रों की समस्याओं पर चर्चा कराने की बजाय आंदोलन को राजनीतिक मुद्दा बनाने की थी. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार आंदोलनकारियों पर बल प्रयोग के पक्ष में नहीं थी और प्रशासन ने संयम बरतने की कोशिश की. हालांकि, उन्होंने आरोप लगाया कि आंदोलन के दौरान कुछ बाहरी उपद्रवी तत्व शामिल हो गये, जिनकी वजह से स्थिति बिगड़ी. लाठीचार्ज पर दीपिका पांडेय सिंह ने मांगी माफी ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने कहा कि सरकार कभी भी छात्रों पर लाठीचार्ज के पक्ष में नहीं है. उन्होंने पुलिस कार्रवाई में घायल हुए छात्रों से माफी मांगते हुए कहा कि यदि किसी छात्र के साथ गलत हुआ है, तो सरकार इसे गंभीरता से देख रही है. मंत्री ने भाजपा पर परीक्षा गड़बड़ी के मामले में सीबीआई जांच की मांग के जरिए राजनीतिक लाभ लेने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि राज्य में परीक्षा में अनियमितताओं के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गयी है और अब तक कई गिरफ्तारियां भी हुई हैं. इरफान अंसारी बोले- भाजपा ने छात्र आंदोलन को हाईजैक किया स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने आरोप लगाया कि भाजपा ने छात्रों के आंदोलन को हाईजैक करने की कोशिश की है. उन्होंने कहा कि सरकार छात्रों की समस्याओं का समाधान बातचीत के माध्यम से करना चाहती है. उन्होंने बताया कि आंदोलन के दौरान अस्वस्थ हुए छात्रों के इलाज की व्यवस्था की जा रही है. स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि आंदोलन में घायल या बीमार छात्रों को इलाज में किसी तरह की परेशानी नहीं होने दी जायेगी. शिल्पी नेहा तिर्की ने भी भाजपा पर लगाया आरोप कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि भाजपा छात्र आंदोलन को हिंसक बनाने की कोशिश कर रही है. उन्होंने दावा किया कि सरकार संवाद के माध्यम से छात्रों की मांगों का समाधान निकालने की दिशा में आगे बढ़ रही है. उन्होंने कहा कि सरकार छात्रों के हित में है और किसी भी राजनीतिक दल को युवाओं के भविष्य से जुड़े आंदोलन का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए नहीं करने दिया जायेगा. छात्रों की मांगों पर सरकार और विपक्ष आमने-सामने जेपीएससी-जेएसएससी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी को लेकर छात्रों का आंदोलन लगातार राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ है. छात्र परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता, कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं. वहीं, सरकार का कहना है कि मामले में जांच और कार्रवाई जारी है. पुलिस कार्रवाई के बाद अब सरकार के मंत्रियों के बयान से यह मुद्दा और गरमा गया है. जहां कांग्रेस नेता भाजपा पर आंदोलन को राजनीतिक रूप देने का आरोप लगा रहे हैं, वहीं विपक्ष सरकार पर छात्रों की आवाज दबाने का आरोप लगा रहा है.
धनबाद: शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (SNMMCH) के सर्जरी विभाग में इन दिनों मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। विभाग में ECG जांच की सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण चिकित्सकों की सलाह के बाद मरीजों को जांच कराने के लिए इमरजेंसी विभाग जाना पड़ रहा है। खासकर गंभीर और ऑपरेशन के बाद बिस्तर पर पड़े मरीजों के लिए यह व्यवस्था परेशानी का कारण बन रही है। जानकारी के अनुसार, सर्जरी विभाग में ECG मशीन में इस्तेमाल होने वाला रोल समाप्त हो गया है, जिसके कारण विभाग में नियमित रूप से ECG जांच नहीं हो पा रही है। चिकित्सकों द्वारा जब किसी मरीज को ECG कराने की सलाह दी जाती है, तो मरीज या उनके परिजनों को उसे लेकर इमरजेंसी विभाग जाना पड़ता है। गंभीर मरीजों को सबसे ज्यादा परेशानी सर्जरी विभाग में भर्ती कई मरीज ऐसे होते हैं, जिन्हें चलने-फिरने में परेशानी होती है। इनमें ऑपरेशन के बाद बिस्तर पर आराम कर रहे मरीज और गंभीर स्थिति वाले मरीज भी शामिल हैं। ऐसे मरीजों को जांच के लिए एक विभाग से दूसरे विभाग तक ले जाना उनके परिजनों के लिए भी चुनौती बन जाता है। मरीजों के परिजनों का कहना है कि सर्जरी विभाग में ही ECG की सुविधा उपलब्ध होने से जांच आसानी से हो सकती थी। लेकिन मौजूदा स्थिति में मरीज को इमरजेंसी तक ले जाना पड़ता है और वहां तकनीशियन उपलब्ध होने का इंतजार करना पड़ता है। इमरजेंसी में भी करना पड़ता है इंतजार सर्जरी विभाग से इमरजेंसी पहुंचने के बाद भी मरीजों को तत्काल ECG जांच की सुविधा मिल जाए, यह जरूरी नहीं है। इमरजेंसी में पहले से गंभीर मरीजों की संख्या रहने के कारण ECG कराने के लिए मरीजों और उनके परिजनों को इंतजार करना पड़ता है। मरीजों के अनुसार, सर्जरी विभाग से इमरजेंसी तक मरीज को ले जाने, फिर तकनीशियन के आने और जांच पूरी होने में काफी समय लग जाता है। इससे चिकित्सकों द्वारा शुरू की गयी इलाज की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है। समय पर रोल की खरीदारी नहीं होने से बनी समस्या बताया जा रहा है कि ECG जांच के लिए जरूरी रोल की समय पर खरीदारी नहीं होने के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है। अस्पताल में रोजाना बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं और सर्जरी विभाग में भर्ती मरीजों को भी जरूरत के अनुसार ECG जांच की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अस्पताल जैसे महत्वपूर्ण संस्थान में ECG जैसी सामान्य और जरूरी जांच के लिए इस्तेमाल होने वाले सामान की उपलब्धता पहले से सुनिश्चित क्यों नहीं की गयी। मरीजों को जल्द राहत मिलने की जरूरत सर्जरी विभाग में भर्ती मरीजों के इलाज को सुचारु रखने के लिए ECG की सुविधा जल्द बहाल करना जरूरी है। खासकर गंभीर मरीजों को जांच के लिए इमरजेंसी ले जाने की परेशानी से बचाने के लिए विभाग में ही ECG की व्यवस्था उपलब्ध कराना जरूरी माना जा रहा है। मरीजों और उनके परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन से ECG रोल की तत्काल व्यवस्था कर सर्जरी विभाग में जांच सुविधा शुरू कराने की मांग की है, ताकि मरीजों को अनावश्यक रूप से इमरजेंसी के चक्कर न लगाने पड़ें और इलाज में भी देरी न हो।