चतरा: JSSC CGL परीक्षा में कथित गड़बड़ी के मामले में पत्थलगड्डा के प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी (BSO) तेजनारायण पंडित को स्थानीय पुलिस ने हिरासत में लिया है. बताया जा रहा है कि CID के निर्देश पर पुलिस ने यह कार्रवाई की है. हिरासत में लेने के बाद उनसे परीक्षा में कथित अनियमितता से जुड़े विभिन्न बिंदुओं पर पूछताछ की जा रही है.
जानकारी के अनुसार, कुछ दिन पहले JSSC CGL परीक्षा में कथित गड़बड़ी की जांच के दौरान तेजनारायण पंडित का नाम सामने आया था. इसके बाद मामले को गंभीरता से लेते हुए CID के निर्देश पर स्थानीय पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया.
पुलिस उनसे परीक्षा से जुड़े घटनाक्रम, संभावित संपर्क और अन्य महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जानकारी जुटा रही है. हालांकि, अभी तक पुलिस या संबंधित अधिकारियों की ओर से तेजनारायण पंडित की भूमिका को लेकर कोई विस्तृत आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है.
हिरासत में लिए गए BSO से लगातार पूछताछ की जा रही है. जांच एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कथित परीक्षा गड़बड़ी में उनकी कोई भूमिका थी या नहीं और यदि थी तो उसका स्वरूप क्या था.
फिलहाल सिर्फ हिरासत और पूछताछ की कार्रवाई हुई है. तेजनारायण पंडित की भूमिका को लेकर अंतिम स्थिति जांच पूरी होने और आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगी.
गौरतलब है कि JPSC और JSSC की परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी को लेकर रांची में अभ्यर्थियों का आंदोलन लंबे समय से चल रहा था. इसी बीच 17 अगस्त को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने JSSC CGL परीक्षा रद्द करने का ऐलान किया था.
सरकार ने इसके साथ ही TDPL एजेंसी द्वारा आयोजित अन्य परीक्षाओं को भी रद्द करने की घोषणा की है. वहीं CGL परीक्षा में हुई कथित गड़बड़ी की जांच की बात भी कही गई है.
अब पत्थलगड्डा के BSO को हिरासत में लेकर पूछताछ किए जाने के बाद JSSC CGL मामले की जांच को लेकर चर्चाएं और तेज हो गई हैं. जांच में आगे और क्या तथ्य सामने आते हैं, इस पर सभी की नजर बनी हुई है.
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
रांची। झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ 16 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो ने मंगलवार को अपना अनशन खत्म कर दिया। राज्य सरकार द्वारा JSSC-CGL परीक्षा और TDPL से जुड़ी परीक्षाओं, परिणामों व चयन प्रक्रिया को रद्द करने के फैसले के बाद उन्होंने यह कदम उठाया। रांची सदर अस्पताल में जूस पीकर उन्होंने अनशन तोड़ा। सरकार के फैसले को बताया बड़ी जीत देवेंद्र नाथ महतो ने सरकार के फैसले का स्वागत करते हुए इसे छात्रों के संघर्ष की बड़ी उपलब्धि बताया। उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सहित आंदोलन के दौरान साथ देने वाले छात्रों, समर्थकों और मीडिया का आभार जताया। महतो ने कहा कि सरकार ने परीक्षा रद्द करने का फैसला लेकर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। हालांकि, उनका जोर भर्ती प्रक्रिया में आगे पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने पर भी रहा है। सदर अस्पताल में तोड़ा अनशन लंबी भूख हड़ताल के बाद देवेंद्र नाथ महतो की तबीयत को लेकर लगातार चिंता बनी हुई थी। मंगलवार को रांची के सदर अस्पताल में उनका अनशन समाप्त कराया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान जयराम महतो ने उन्हें जूस पिलाया। अस्पताल में डॉक्टरों ने देवेंद्र महतो समेत अन्य प्रदर्शनकारियों की स्वास्थ्य जांच भी की। CBI जांच की मांग अभी भी मुद्दा JSSC-CGL और TDPL से जुड़ी परीक्षाओं को रद्द करने के फैसले के बावजूद छात्र आंदोलन की CBI जांच की मांग का मुद्दा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। कुछ प्रदर्शनकारी अभी भी पूरे मामले की स्वतंत्र जांच और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। झारखंड सरकार के फैसले के बाद देवेंद्र नाथ महतो की 16 दिन लंबी भूख हड़ताल समाप्त हो गई है। अब आंदोलन से जुड़े छात्रों की नजर सरकार की ओर से भर्ती परीक्षाओं की नई व्यवस्था और कथित अनियमितताओं की जांच को लेकर उठाए जाने वाले अगले कदमों पर है।
दुमका: जिले के विद्यार्थियों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए अच्छी खबर है. दुमका में जल्द ही आधुनिक सुविधाओं से लैस स्टेट ऑफ द आर्ट जिला पुस्तकालय का निर्माण किया जाएगा. इसके निर्माण पर करीब 7.54 करोड़ रुपये खर्च होंगे. पुस्तकालय के लिए स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग और झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद की ओर से 7 करोड़ 54 लाख 53 हजार 871 रुपये का टेंडर जारी किया गया है. निर्माण एजेंसी को काम पूरा करने के लिए 365 दिनों का समय दिया गया है. प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों को मिलेगा बड़ा फायदा आधुनिक जिला पुस्तकालय बनने के बाद विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए बेहतर और व्यवस्थित माहौल मिलने की उम्मीद है. खासकर JPSC, JSSC, UPSC, SSC, बैंकिंग, रेलवे और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र-छात्राओं के लिए यह सुविधा काफी उपयोगी साबित हो सकती है. पुस्तकालय में विद्यार्थियों को अध्ययन के लिए शांत वातावरण के साथ किताबों और संदर्भ सामग्री जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने की योजना है. इससे उन छात्रों को विशेष लाभ मिल सकता है, जिन्हें घर पर पढ़ाई के लिए पर्याप्त जगह या अनुकूल वातावरण नहीं मिल पाता है. दुमका में पहले से राजकीय पुस्तकालय में पहुंचते हैं सैकड़ों छात्र दुमका संताल परगना का प्रमंडलीय मुख्यालय होने के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक केंद्र भी है. यहां बड़ी संख्या में विद्यार्थी उच्च शिक्षा और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं. दुमका के राजकीय पुस्तकालय में भी पिछले कुछ वर्षों में सुविधाओं का विस्तार किया गया है. वर्तमान में करीब 500 से 600 विद्यार्थी नियमित रूप से वहां पहुंचकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं. ऐसे में नए आधुनिक जिला पुस्तकालय की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी. नया पुस्तकालय बनने के बाद विद्यार्थियों के लिए अध्ययन के अतिरिक्त स्थान और बेहतर संसाधन उपलब्ध हो सकेंगे. श्रीरामकृष्ण आश्रम परिसर में निर्माण की तैयारी प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, आधुनिक जिला पुस्तकालय के निर्माण के लिए श्रीरामकृष्ण आश्रम उच्च विद्यालय परिसर में खाली जमीन का चयन किया गया है. स्कूल का पूरा परिसर करीब 17 बीघा 17 कट्ठा में फैला हुआ है. विद्यालय परिसर में पहले से ही कई विकास कार्य चल रहे हैं. प्लस टू स्तर पर उत्क्रमित होने के बाद अतिरिक्त कक्षाओं के निर्माण का काम चल रहा है. इसके अलावा डायट के लिए मल्टीपर्पज बिल्डिंग, हॉस्टल और क्वार्टर का निर्माण भी कराया जा रहा है. इसी परिसर में आधुनिक जिला पुस्तकालय बनने से विद्यार्थियों को एक ही स्थान पर पढ़ाई के लिए कई बेहतर सुविधाएं मिलने की उम्मीद है. एकलव्य स्कूल में भी बनेगा पुस्तकालय दुमका जिले के काठीकुंड स्थित एकलव्य मॉडल रेसिडेंशियल स्कूल, फिटकोरिया के विद्यार्थियों के लिए भी पुस्तकालय की सुविधा विकसित करने की तैयारी है. इसके लिए 11 लाख 81 हजार 710 रुपये की लागत से टेंडर जारी किया गया है. यहां पुस्तकालय का निर्माण कार्य करीब तीन महीने में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है. स्कूल का संचालन करीब दो साल पहले शुरू हुआ था और अब विद्यार्थियों के लिए पुस्तकालय समेत अन्य जरूरी शैक्षणिक संसाधन विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है. छात्रों के लिए बढ़ेगी पढ़ाई की सुविधा दुमका में जिला पुस्तकालय और एकलव्य स्कूल में पुस्तकालय निर्माण की पहल को जिले की शैक्षणिक व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. आधुनिक पुस्तकालयों के निर्माण से विद्यार्थियों को बेहतर अध्ययन माहौल, किताबों और संदर्भ सामग्री तक आसान पहुंच मिलेगी. खासकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए 7.54 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाला आधुनिक जिला पुस्तकालय आने वाले समय में पढ़ाई और तैयारी का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है.
रांची: झारखंड सरकार के JSSC-CGL परीक्षा रद्द करने के फैसले के बाद अब मामला दो अलग-अलग पक्षों में बंटता नजर आ रहा है. एक ओर परीक्षा में कथित गड़बड़ी की शिकायत को लेकर आंदोलन कर रहे छात्रों ने फैसले का स्वागत किया है, वहीं दूसरी ओर इसी परीक्षा के जरिए चयनित होकर सरकारी नौकरी कर रहे अभ्यर्थियों में भारी नाराजगी है. कई चयनित अभ्यर्थी सरकार के फैसले के खिलाफ प्रोजेक्ट भवन के बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं और अब अदालत का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में हैं. चयनित अभ्यर्थियों का छलका दर्द प्रदर्शन कर रहे चयनित अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही नौकरी ज्वाइन की थी. एक अभ्यर्थी ने कहा कि हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले के बाद उनकी नियुक्ति हुई थी और मामले में सुप्रीम कोर्ट का रुख भी सामने आ चुका था. इसके बावजूद सरकार ने अचानक परीक्षा रद्द करने का फैसला ले लिया. अभ्यर्थी ने भावुक होकर कहा कि एक पल में वे बेरोजगार हो गए. उनका कहना है कि कई उम्मीदवारों ने JSSC-CGL में चयन के बाद अपनी पुरानी नौकरियां तक छोड़ दी थीं. अब परीक्षा रद्द होने के बाद उनके सामने दोबारा रोजगार हासिल करने का संकट खड़ा हो गया है. बोले- सरकार फैसले पर दोबारा करे विचार प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की है. उनका कहना है कि यदि परीक्षा में गड़बड़ी हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच कर दोषी अभ्यर्थियों या जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जाए, लेकिन पूरी परीक्षा और सभी चयनित अभ्यर्थियों को एक साथ दोषी मानना उचित नहीं है. एक अभ्यर्थी ने कहा कि अगर जांच में कुछ लोगों की भूमिका सामने आती है तो केवल उन्हीं पर कार्रवाई की जानी चाहिए. चयनित अभ्यर्थियों का दावा है कि उन्होंने निर्धारित प्रक्रिया के तहत परीक्षा पास की और नियुक्ति मिलने के बाद सरकारी विभागों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. कोर्ट जाने की तैयारी में चयनित अभ्यर्थी सरकार के फैसले से नाराज चयनित अभ्यर्थियों ने कानूनी लड़ाई लड़ने का फैसला किया है. उनका कहना है कि वे पहले भी अदालत के माध्यम से अपनी नियुक्ति के चरण तक पहुंचे हैं और अब परीक्षा रद्द किए जाने के फैसले को भी न्यायालय में चुनौती देंगे. अभ्यर्थियों का कहना है कि उनका भविष्य सीधे तौर पर इस फैसले से प्रभावित हुआ है. खासकर उन उम्मीदवारों की परेशानी ज्यादा बढ़ गयी है, जिन्होंने JSSC-CGL में चयन के बाद दूसरी नौकरियां छोड़कर सरकारी सेवा ज्वाइन की थी. जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में आंदोलनकारी छात्रों में खुशी इधर, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा JSSC-CGL और TDPL के जरिए आयोजित परीक्षाओं को रद्द करने की घोषणा के बाद जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में आंदोलन कर रहे छात्रों ने फैसले का स्वागत किया. छात्रों ने इसे अपने आंदोलन की पहली बड़ी जीत बताया. छात्र नेता पीयूष कुमार ने कहा कि परीक्षा रद्द करना उनकी मांगों की दिशा में पहला कदम है. हालांकि, उन्होंने साफ किया कि आंदोलन अभी खत्म नहीं हुआ है. छात्रों की CBI जांच और अन्य मांगें अभी बाकी हैं. उन्होंने कहा कि आगे की रणनीति पर छात्र नेता बैठक कर फैसला लेंगे. CBI जांच और अन्य मांगों पर आंदोलन जारी रखने का ऐलान आंदोलनकारी छात्रों का कहना है कि सिर्फ परीक्षा रद्द होने से उनकी सभी मांगें पूरी नहीं हुई हैं. वे JSSC-CGL मामले की निष्पक्ष CBI जांच समेत अन्य विवादित मुद्दों पर भी सरकार से स्पष्ट कार्रवाई चाहते हैं. इस वजह से एक ही फैसले के बाद JSSC-CGL विवाद में दो अलग तस्वीरें सामने आई हैं. एक तरफ आंदोलनकारी छात्र परीक्षा रद्द होने को जीत मान रहे हैं, तो दूसरी तरफ चयनित अभ्यर्थी इसी फैसले को अपने रोजगार और भविष्य के लिए बड़ा झटका बता रहे हैं. अब इस पूरे मामले में सरकार के अगले कदम और अदालत की संभावित कार्रवाई पर सबकी नजर है.