झारखंड

श्रावणी मेला के 21वें दिन 2.39 लाख कांवरियों ने किया जलाभिषेक

श्रावणी मेला के 21वें दिन 2.39 लाख कांवरियों ने किया बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक

ranjan kumar tiwari अगस्त 20, 2026 0
देवघर में श्रावणी मेला के 21वें दिन बाबा बैद्यनाथ मंदिर में कांवरियों की भीड़
बाबा बैद्यनाथ मंदिर में 2.39 लाख कांवरियों ने किया जलाभिषेक

देवघर। श्रावणी मेला के 21वें दिन बुधवार को बाबा बैद्यनाथ मंदिर में कांवरियों की भारी भीड़ उमड़ी। मंदिर में सुबह से देर रात तक श्रद्धालुओं की कतार लगी रही। कुल 2,38,963 कांवरियों ने बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक किया।

मंदिर का पट खुलने से पहले ही कांवरियों की सामान्य कतार बरमसिया तक पहुंच गई थी। वहीं, बाह्य अरघा से जलार्पण करने वाले श्रद्धालुओं की भी बड़ी संख्या रही। भीड़ के कारण मंदिर के आसपास की गलियों में कई घंटे तक जाम की स्थिति बनी रही।

 

सुबह 4:14 बजे शुरू हुआ जलार्पण

 

 

बुधवार को बाबा मंदिर का पट निर्धारित समय पर खोला गया। इसके बाद दैनिक कांचा पूजा और जल पूजा संपन्न हुई। करीब 40 मिनट तक चली सरदारी पूजा के बाद सुबह 4:14 बजे मंझला खंड में अरघा के माध्यम से जलार्पण शुरू हुआ।

 

जलार्पण शुरू होते ही मुख्य अरघा के साथ बाह्य अरघा पर भी कांवरियों की भीड़ बढ़ गई। मंदिर परिसर में व्यवस्था बनाए रखने के लिए बाबा मंदिर से पार्वती मंदिर तक क्यूआरटी की टीम रस्सी लेकर तैनात रही।

 

मुख्य अरघा से 1.15 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने चढ़ाया जल

 

 

मंदिर का पट बंद होने तक कुल 2,38,963 कांवरियों ने बाबा पर जल चढ़ाया। इनमें मुख्य अरघा से 1,15,857, बाह्य अरघा से 1,08,965 और कूपन व्यवस्था के तहत 14,416 कांवरियों ने जलार्पण किया। श्रावणी मेले के 21वें दिन भी बाबा मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी आस्था और उत्साह देखने को मिला।

 

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Ranjan Kumar Tiwari Ranjan123

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Ranchi University PhD Regulation: पीएचडी के लिए नया रेगुलेशन लागू, 2026-27 से बदले नियम

रांची। रांची विश्वविद्यालय ने पीएचडी को लेकर नया रेगुलेशन जारी कर दिया है। शैक्षणिक सत्र 2026-27 से लागू होने वाले इन नियमों को यूजीसी रेगुलेशन 2022 के तहत तैयार किया गया है। नए प्रावधानों में पीएचडी प्रवेश परीक्षा, अभ्यर्थियों की योग्यता, गाइड की अधिकतम सीमा और शोध पूरा करने की समय-सीमा समेत कई महत्वपूर्ण बदलाव शामिल हैं।   पीएचडी प्रवेश परीक्षा लेने के लिए विश्वविद्यालय स्वतंत्र   नए रेगुलेशन के तहत रांची विश्वविद्यालय अब पीएचडी में रजिस्ट्रेशन के लिए प्रवेश परीक्षा आयोजित कर सकेगा। नियमों को नई शिक्षा नीति और चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।   कौन कितने शोधार्थियों का कर सकेंगे मार्गदर्शन?   नए नियम के अनुसार एक समय में एक प्रोफेसर अधिकतम 8 शोधार्थियों, एसोसिएट प्रोफेसर 6 शोधार्थियों और असिस्टेंट प्रोफेसर 4 शोधार्थियों को पीएचडी करा सकेंगे।   अगर पीएचडी गाइड के रूप में कार्यरत शिक्षक सेवानिवृत्त हो जाते हैं, तो वे आगे को-गाइड की भूमिका में रह सकेंगे। वहीं, नियमानुसार शोधार्थी को गाइड बदलने की सुविधा भी दी गयी है।   पीजी में 55 फीसदी अंक जरूरी   पीएचडी में प्रवेश के लिए अभ्यर्थी का संबंधित विषय में स्नातकोत्तर में कम से कम 55 प्रतिशत अंक होना जरूरी होगा। एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के अभ्यर्थियों को 5 प्रतिशत की छूट दी जायेगी।   3 से 6 साल में पूरी करनी होगी पीएचडी   नये रेगुलेशन में पीएचडी पूरी करने के लिए न्यूनतम अवधि 3 वर्ष और अधिकतम 6 वर्ष निर्धारित की गयी है। निर्धारित अवधि में शोध प्रबंध जमा नहीं करने पर नियमानुसार 2 वर्ष का अतिरिक्त विस्तार दिया जा सकता है। इस तरह अधिकतम अवधि 8 वर्ष तक हो सकती है। महिला शोधार्थियों के लिए भी नियमों में विशेष प्रावधान और छूट का उल्लेख किया गया है।   13 सदस्यीय कमेटी ने तैयार किया रेगुलेशन   रांची विश्वविद्यालय में पीएचडी रेगुलेशन तैयार करने के लिए कुलपति प्रो. सरोज शर्मा के निर्देशन में 13 सदस्यीय उच्चस्तरीय कमेटी गठित की गयी थी। कमेटी ने यूजीसी रेगुलेशन 2022 के अनुरूप नियमों का प्रारूप तैयार किया।   इससे पहले रेगुलेशन स्वीकृत नहीं होने के कारण पीएचडी प्रवेश परीक्षा पर राज्यपाल ने रोक लगा दी थी। विश्वविद्यालय को यूजीसी के 2022 के नियमों के तहत नया रेगुलेशन तैयार करने का निर्देश दिया गया था। इसके बाद पिछली प्रवेश परीक्षा के आवेदन के साथ लिये गये प्रति अभ्यर्थी 2,000 रुपये शुल्क वापस करने पड़े थे।   नये रेगुलेशन के लागू होने के बाद रांची विश्वविद्यालय में पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया को निर्धारित नियमों के तहत आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है।

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बाबा बैद्यनाथ के दरबार में आस्था का सैलाब, 22वें दिन B.Ed कॉलेज तक पहुंची कांवरियों की कतार

देवघर में राजकीय श्रावणी मेले के 22वें दिन गुरुवार को बाबा बैद्यनाथ धाम में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। अहले सुबह से ही कांवरियों का जत्था बाबा मंदिर की ओर बढ़ता रहा और पूरे कांवरिया पथ पर बोल-बम तथा हर-हर महादेव के जयघोष गूंजते रहे। सुबह 4:08 बजे बाबा बैद्यनाथ मंदिर का पट खुलते ही जलार्पण शुरू हो गया। सुल्तानगंज से उत्तरवाहिनी गंगा का पवित्र जल लेकर पहुंचे कांवरिये बाबा पर जल चढ़ाने के लिए कतार में आगे बढ़ते रहे। बीएड कॉलेज तक पहुंची कांवरियों की लाइन श्रद्धालुओं की भारी संख्या का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बाबा मंदिर में जलार्पण के लिए कांवरियों की कतार बीएड कॉलेज तक पहुंच गई। सुबह से ही बड़ी संख्या में शिवभक्त अपनी बारी का इंतजार करते हुए कतार में खड़े रहे। भगवा वस्त्रों में कांवरियों का हुजूम और लगातार हो रहे बोल-बम के जयघोष से पूरा क्षेत्र भक्तिमय नजर आया। लंबी कतार और थकान के बावजूद श्रद्धालुओं में बाबा के दर्शन और जलार्पण को लेकर उत्साह बना रहा। पट खुलते ही शुरू हुआ जलार्पण मंदिर का पट खुलने के बाद श्रद्धालुओं ने बाबा बैद्यनाथ पर जल चढ़ाना शुरू किया। सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर पहुंचे कांवरियों के लिए यह यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है। कांवरिया पथ से लेकर मंदिर की रूट लाइन तक शिवभक्तों की आवाजाही लगातार बनी रही। श्रद्धालु निर्धारित व्यवस्था के तहत कतार में आगे बढ़ते दिखाई दिए। सुरक्षा व्यवस्था पर प्रशासन की नजर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन की ओर से सुरक्षा एवं कतार प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। विभिन्न प्वाइंटों पर अधिकारी निगरानी कर रहे हैं। कांवरियों से निर्धारित रूट लाइन का पालन करने और अनुशासन बनाए रखने की अपील की जा रही है, ताकि सभी श्रद्धालुओं को सुरक्षित और सुगम तरीके से बाबा बैद्यनाथ का दर्शन और जलार्पण कराया जा सके। बोल-बम के जयघोष से गूंजा देवघर श्रावणी मेले के 22वें दिन देवघर पूरी तरह शिवभक्ति में डूबा नजर आया। कांवरिया पथ से लेकर बाबा मंदिर के आसपास तक हर ओर भगवा रंग और बोल-बम का जयघोष दिखाई दिया। देश के अलग-अलग हिस्सों से पहुंचे शिवभक्तों की भारी मौजूदगी ने बाबा नगरी की रौनक और बढ़ा दी। श्रद्धालुओं की लगातार बढ़ती भीड़ को देखते हुए प्रशासन के सामने भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने की बड़ी जिम्मेदारी बनी हुई है।  

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Ranchi University introduces new PhD regulations for admissions, research duration and supervisor limits from 2026-27
रांची यूनिवर्सिटी में PhD के लिए नया रेगुलेशन लागू, 2026-27 से बदले नियम; प्रवेश परीक्षा से लेकर गाइड की सीमा तक जानें पूरी जानकारी

रांची यूनिवर्सिटी ने पीएचडी को लेकर नया रेगुलेशन जारी कर दिया है। विश्वविद्यालय की ओर से Regulation and Standard Operating Procedure for the Minimum Standard and Procedure for Award of PhD Degree-2026 की अधिसूचना जारी की गई है। नए नियम शैक्षणिक सत्र 2026-27 से लागू होंगे। यह रेगुलेशन यूजीसी के 2022 के नियमों, नई शिक्षा नीति और चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। नए रेगुलेशन के लागू होने के बाद रांची यूनिवर्सिटी पीएचडी में प्रवेश के लिए अपनी प्रवेश परीक्षा आयोजित कर सकेगी। इससे लंबे समय से अटकी पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है। PhD के लिए 55 प्रतिशत अंक जरूरी नए नियमों के अनुसार पीएचडी में प्रवेश लेने वाले सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए संबंधित विषय में पोस्ट ग्रेजुएशन में कम से कम 55 प्रतिशत अंक जरूरी होंगे। वहीं एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के अभ्यर्थियों को नियमानुसार 5 प्रतिशत की छूट मिलेगी। इस प्रावधान का उद्देश्य पीएचडी प्रवेश के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता को स्पष्ट करना है। प्रवेश परीक्षा लेने के लिए विश्वविद्यालय स्वतंत्र नए रेगुलेशन की सबसे अहम बात यह है कि रांची यूनिवर्सिटी अब पीएचडी रजिस्ट्रेशन के लिए प्रवेश परीक्षा आयोजित कर सकेगी। इसके जरिए शोधार्थियों के चयन की प्रक्रिया को निर्धारित नियमों के तहत आगे बढ़ाया जा सकेगा। इससे उन अभ्यर्थियों को राहत मिलने की उम्मीद है, जो लंबे समय से विश्वविद्यालय की पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया शुरू होने का इंतजार कर रहे हैं। एक प्रोफेसर कितने शोधार्थियों को करा सकेंगे PhD? नए नियमों में शोध निर्देशक यानी गाइड के लिए भी सीमा तय की गई है। प्रोफेसर एक समय में अधिकतम 8 शोधार्थियों का मार्गदर्शन कर सकेंगे। एसोसिएट प्रोफेसर अधिकतम 6 शोधार्थियों को गाइड कर सकेंगे। असिस्टेंट प्रोफेसर अधिकतम 4 शोधार्थियों का निर्देशन कर सकेंगे। इस व्यवस्था का उद्देश्य शोधार्थियों को पर्याप्त अकादमिक मार्गदर्शन उपलब्ध कराना और गाइड पर अत्यधिक शोधार्थियों का भार पड़ने से रोकना है। PhD पूरी करने के लिए 3 से 6 साल पीएचडी पूरी करने के लिए न्यूनतम अवधि 3 वर्ष और अधिकतम अवधि 6 वर्ष निर्धारित की गई है। निर्धारित समय में शोध पूरा नहीं होने की स्थिति में नियमों के तहत अधिकतम 2 वर्ष का अतिरिक्त विस्तार दिया जा सकता है। इस तरह विशेष परिस्थितियों में पीएचडी पूरी करने की अधिकतम अवधि 8 वर्ष तक हो सकती है। महिला शोधार्थियों के लिए भी नियमानुसार विशेष प्रावधान और छूट का प्रावधान किया गया है। गाइड के रिटायर होने पर क्या होगा? नए रेगुलेशन में शोधार्थियों के गाइड के सेवानिवृत्त होने की स्थिति को भी स्पष्ट किया गया है। यदि पीएचडी के दौरान शोध निर्देशक सेवानिवृत्त हो जाते हैं, तो वे गाइड के स्थान पर को-गाइड की भूमिका निभा सकेंगे। इसके अलावा शोधार्थी को निर्धारित नियमों के तहत अपना गाइड बदलने की सुविधा भी दी गई है। 13 सदस्यीय कमेटी ने तैयार किया रेगुलेशन रांची यूनिवर्सिटी में पीएचडी रेगुलेशन तैयार करने के लिए कुलपति प्रो. सरोज शर्मा के निर्देशन में 13 सदस्यीय उच्चस्तरीय कमेटी बनाई गई थी। कमेटी ने यूजीसी रेगुलेशन 2022 के आधार पर नए नियमों को तैयार किया। रेगुलेशन को लेकर विश्वविद्यालय में लंबे समय से प्रक्रिया चल रही थी। इससे पहले नियमों के स्वीकृत नहीं होने के कारण पीएचडी प्रवेश परीक्षा पर राज्यपाल की ओर से रोक लगाई गई थी। विश्वविद्यालय को यूजीसी रेगुलेशन 2022 के अनुरूप नियम तैयार करने का निर्देश दिया गया था। इसी वजह से पहले पीएचडी प्रवेश परीक्षा के लिए आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों से लिए गए 2,000 रुपये शुल्क को भी वापस करना पड़ा था। अब आगे क्या? नए रेगुलेशन के लागू होने के बाद रांची यूनिवर्सिटी में पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया शुरू करने का रास्ता साफ हो गया है। अब विश्वविद्यालय को निर्धारित नियमों के अनुसार प्रवेश परीक्षा, रजिस्ट्रेशन और शोध निर्देशन की प्रक्रिया आगे बढ़ानी होगी। 2026-27 से लागू होने वाला यह रेगुलेशन पीएचडी अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें योग्यता, प्रवेश परीक्षा, गाइड की सीमा, शोध की अवधि और गाइड बदलने जैसे महत्वपूर्ण प्रावधान स्पष्ट किए गए हैं।  

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