रांची। असम में बाढ़ से प्रभावित लोगों की मदद के लिए झारखंड सरकार ने ₹3 करोड़ की आर्थिक सहायता देने का ऐलान किया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने असम के बाढ़ प्रभावित परिवारों के प्रति एकजुटता जताते हुए राहत कार्यों में सहयोग देने की घोषणा की है।
असम में लगातार बारिश और बाढ़ के कारण कई इलाकों में जनजीवन प्रभावित हुआ है। बड़ी संख्या में लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है और प्रभावित क्षेत्रों में राहत एवं बचाव अभियान चलाया जा रहा है। ऐसे मुश्किल समय में झारखंड सरकार की ओर से घोषित आर्थिक सहायता का इस्तेमाल बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए राहत सामग्री और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने में किया जा सकता है।
झारखंड सरकार ने असम के लोगों के साथ एकजुटता जताते हुए संकट की इस घड़ी में सहयोग का भरोसा दिया है। सरकार का कहना है कि प्राकृतिक आपदा से प्रभावित लोगों तक मदद पहुंचाना प्राथमिकता है। ₹3 करोड़ की सहायता राशि राज्य की ओर से मानवीय सहयोग के रूप में दी जाएगी, जिससे असम में चल रहे राहत कार्यों को मजबूती मिल सके।
असम में मानसून के दौरान भारी बारिश के कारण कई नदियों का जलस्तर बढ़ा है। बाढ़ की वजह से सड़क संपर्क, आवागमन और सामान्य जनजीवन पर असर पड़ा है। प्रशासन की ओर से प्रभावित इलाकों में राहत शिविर चलाए जा रहे हैं। बाढ़ में फंसे लोगों को निकालने और उन्हें सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने के लिए बचाव दलों को भी तैनात किया गया है।
झारखंड सरकार की ओर से असम को आर्थिक सहायता दिए जाने को प्राकृतिक आपदा के समय राज्यों के बीच सहयोग की मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है। राहत राशि से प्रभावित लोगों के लिए जरूरी सहायता उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी। असम में बाढ़ की स्थिति और राहत-बचाव अभियान पर लगातार नजर रखी जा रही है। आने वाले दिनों में मौसम की स्थिति के आधार पर राहत कार्यों को और तेज किया जा सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। ऑनलाइन खरीदारी और टिकट बुकिंग के दौरान ग्राहकों को प्रभावित करने वाली भ्रामक डिजिटल प्रक्रियाओं के खिलाफ केंद्र सरकार ने बड़ी कार्रवाई की है। केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) ने Zepto, BookMyShow समेत नौ डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कुल करीब 20 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। कार्रवाई में कंपनियों द्वारा इस्तेमाल किए गए कथित ‘डार्क पैटर्न’ को लेकर उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन का मामला सामने आया है। Zepto पर ₹7 लाख की पेनल्टी त्वरित डिलीवरी प्लेटफॉर्म Zepto पर CCPA ने ₹7 लाख का जुर्माना लगाया है। प्राधिकरण की कार्रवाई में ड्रिप प्राइसिंग और यूजर्स को उनकी स्पष्ट सहमति के बिना सदस्यता से जोड़ने जैसे मामलों को लेकर आपत्ति जताई गई। ड्रिप प्राइसिंग में ग्राहक को शुरुआत में एक कीमत दिखाई जाती है, लेकिन खरीदारी की प्रक्रिया आगे बढ़ने पर अतिरिक्त शुल्क जुड़ते जाते हैं। इससे ग्राहक को शुरुआत में दिखाई गई कीमत और अंतिम भुगतान राशि के बीच अंतर का सामना करना पड़ सकता है। BookMyShow पर ₹2 लाख का जुर्माना ऑनलाइन टिकट बुकिंग प्लेटफॉर्म BookMyShow पर CCPA ने ₹2 लाख की पेनल्टी लगाई है। कंपनी के मामले में प्राधिकरण ने ‘बास्केट स्नीकिंग’ (Basket Sneaking) से जुड़े व्यवहार को लेकर कार्रवाई की। इस तरह के डार्क पैटर्न में ग्राहक की खरीदारी के दौरान कोई अतिरिक्त उत्पाद, सेवा या योगदान विकल्प पहले से चयनित स्थिति में दिख सकता है। ग्राहक यदि ध्यान नहीं देता है तो वह अनजाने में उस अतिरिक्त विकल्प के लिए भुगतान कर सकता है। कुल नौ डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कार्रवाई CCPA की कार्रवाई केवल Zepto और BookMyShow तक सीमित नहीं है। IndiGo, FirstCry, Physics Wallah समेत कुल नौ डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कार्रवाई की गई है। इन मामलों में अलग-अलग प्रकार के डार्क पैटर्न और भ्रामक ऑनलाइन प्रक्रियाओं को लेकर उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण ने कदम उठाया है। सरकार की यह कार्रवाई डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपभोक्ताओं को ऐसी डिजाइन या प्रक्रियाओं से बचाने की कोशिश का हिस्सा है, जिनके जरिए उन्हें किसी सेवा, शुल्क या खरीदारी के लिए अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया जा सकता है। क्या होते हैं डार्क पैटर्न? डार्क पैटर्न ऐसे डिजाइन या डिजिटल तरीके हैं जिनका इस्तेमाल वेबसाइट या ऐप पर ग्राहक के निर्णय को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है। इनमें अतिरिक्त शुल्क को देर से दिखाना, अनचाही सेवा को पहले से चुन देना या ग्राहक को किसी विकल्प की ओर धकेलना जैसी प्रक्रियाएं शामिल हो सकती हैं। भारत में Prevention and Regulation of Dark Patterns Guidelines, 2023 के तहत ऐसे कई भ्रामक डिजिटल व्यवहारों की पहचान की गई है। CCPA की ताजा कार्रवाई से साफ है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपभोक्ता अधिकारों और पारदर्शी कीमतों को लेकर निगरानी बढ़ रही है।
श्रीनगर, एजेंसियां। जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों ने लश्कर-ए-तैयबा के कथित कमांडर मोहम्मद लतीफ भट की तलाश तेज कर दी है। पुलिस ने उसकी गिरफ्तारी में मदद करने वाली जानकारी देने वाले व्यक्ति के लिए 15 लाख रुपये के इनाम की घोषणा की है। दक्षिण कश्मीर के कई इलाकों और जम्मू के कुछ हिस्सों में भट के पोस्टर भी लगाए गए हैं。 कई इलाकों में लगाए गए वांटेड पोस्टर सुरक्षा एजेंसियों ने लतीफ भट की तस्वीर वाले वांटेड पोस्टर दक्षिण कश्मीर के विभिन्न जिलों में लगाए हैं। इन पोस्टरों के जरिए लोगों से उसकी मौजूदगी या ठिकाने से जुड़ी जानकारी सुरक्षा एजेंसियों तक पहुंचाने की अपील की गई है। पुलिस का कहना है कि सूचना देने वाले की पहचान गोपनीय रखी जाएगी। दक्षिण कश्मीर में हालिया घटनाओं के बाद बढ़ी सक्रियता लतीफ भट को दक्षिण कश्मीर में हाल की लक्षित हत्याओं से जोड़कर सुरक्षा एजेंसियां उसकी तलाश कर रही हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, अनंतनाग और कुलगाम में हाल में हुई घटनाओं के बाद सुरक्षा बलों ने उसके खिलाफ अभियान तेज किया है। गिरफ्तारी के लिए सुरक्षा एजेंसियों का अभियान तेज सुरक्षा बलों और जम्मू-कश्मीर पुलिस ने लतीफ भट को पकड़ने के लिए अभियान तेज कर दिया है। उसके संभावित ठिकानों और आवाजाही से जुड़े इनपुट की जांच की जा रही है। 15 लाख रुपये के इनाम की घोषणा के साथ ही उसके बारे में सूचना जुटाने के लिए आम लोगों से भी सहयोग मांगा गया है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने Gen Z युवाओं के विरोध-प्रदर्शन को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि किसी मुद्दे को लेकर प्रदर्शन करने वाले युवाओं को सिर्फ प्रदर्शन के आधार पर राष्ट्रविरोधी नहीं कहा जा सकता। भागवत ने युवाओं की शिकायतों को वास्तविक बताते हुए उनके साथ संवाद की जरूरत पर जोर दिया। प्रदर्शन करना राष्ट्रविरोधी होने का प्रमाण नहीं मोहन भागवत ने कहा कि युवाओं का किसी मुद्दे पर अपनी आवाज उठाना अपने आप में राष्ट्रविरोधी गतिविधि नहीं है। उन्होंने Gen Z को लेकर लगाए जाने वाले ऐसे आरोपों से बचने की बात कही और कहा कि युवाओं की बात सुनी जानी चाहिए। भागवत की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब देश में छात्रों और युवाओं के विभिन्न मुद्दों को लेकर प्रदर्शन और असंतोष चर्चा में है। उन्होंने युवाओं की भावनाओं और उनकी समस्याओं को समझने पर जोर दिया। युवाओं की शिकायतें वास्तविक, संवाद जरूरी RSS प्रमुख ने कहा कि Gen Z युवाओं की ओर से उठाई जा रही शिकायतों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, युवाओं के सवालों और चिंताओं को समझने के लिए संवाद का रास्ता अपनाना जरूरी है। उन्होंने प्रदर्शन को भी संवाद का एक माध्यम बताया। उनका कहना था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति और अपनी बात रखने की प्रक्रिया को केवल राष्ट्रविरोधी गतिविधि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। Gen Z और Gen Alpha के युवाओं से बातचीत भागवत ने यह टिप्पणी करीब 2,000 Gen Z और Gen Alpha युवाओं की मौजूदगी वाले एक कार्यक्रम में बातचीत के दौरान की। कार्यक्रम में युवाओं के सवालों और मौजूदा सामाजिक मुद्दों पर चर्चा हुई। भागवत के बयान को युवाओं के साथ संवाद बढ़ाने और उनकी चिंताओं को समझने की अपील के तौर पर देखा जा रहा है। उन्होंने संकेत दिया कि युवाओं के विरोध या असहमति को देशविरोधी नजरिए से देखने के बजाय उनके मुद्दों को समझना अधिक जरूरी है। बयान के बाद राजनीतिक चर्चा तेज मोहन भागवत के इस बयान के बाद Gen Z युवाओं के प्रदर्शन, उनकी शिकायतों और सरकार व समाज के साथ उनके संवाद को लेकर चर्चा तेज हो गई है। भागवत का संदेश स्पष्ट है कि युवाओं का विरोध करना या सवाल उठाना उन्हें राष्ट्रविरोधी ठहराने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है। उनकी टिप्पणी ऐसे समय में सामने आई है जब युवा वर्ग शिक्षा, रोजगार और अन्य सार्वजनिक मुद्दों को लेकर अपनी आवाज मुखर कर रहा है।