नई दिल्ली, एजेंसियां। भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से जारी तनावपूर्ण संबंधों के बीच दोनों देशों की 117 प्रमुख हस्तियों ने शांति और संवाद की नई पहल की है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif को लिखे संयुक्त पत्र में दोनों देशों से टकराव की बजाय बातचीत का रास्ता अपनाने और द्विपक्षीय रिश्तों को सामान्य बनाने की अपील की गई है। पत्र पर भारत की 61 और पाकिस्तान की 56 हस्तियों के हस्ताक्षर हैं।
पत्र पर भारत की ओर से जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah, Mehbooba Mufti, राज्यसभा सांसद Manoj Jha सहित कई पूर्व अधिकारी, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हस्ताक्षर किए हैं। पाकिस्तान की ओर से पूर्व विदेश मंत्री Khurshid Mahmud Kasuri समेत कई प्रमुख हस्तियां इस पहल का हिस्सा बनी हैं। उनका कहना है कि लगातार बढ़ती शत्रुता से दोनों देशों के विकास, क्षेत्रीय स्थिरता और आम नागरिकों के हित प्रभावित हो रहे हैं।
संयुक्त पत्र में दोनों सरकारों के सामने 11 प्रमुख सुझाव रखे गए हैं। इनमें द्विपक्षीय वार्ता दोबारा शुरू करना, जम्मू-कश्मीर सहित सभी विवादित मुद्दों पर बातचीत, सीमा पर सैन्य तनाव कम करना, लोगों के बीच संपर्क बढ़ाना, सांस्कृतिक और शैक्षणिक आदान-प्रदान बहाल करना, क्रिकेट और अन्य खेलों की द्विपक्षीय श्रृंखला शुरू करना, सीधी हवाई सेवाएं बहाल करना, वीजा प्रक्रिया सरल बनाना, दोनों देशों में हाई कमिश्नर की नियुक्ति, बस सेवाओं और सीमा पार आवाजाही को फिर से शुरू करना तथा व्यापारिक संबंधों को बहाल करने जैसी मांगें शामिल हैं।
यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब हाल के वर्षों में आतंकवादी घटनाओं, सीमावर्ती तनाव और कूटनीतिक मतभेदों के कारण दोनों देशों के संबंध लगातार प्रभावित रहे हैं। पत्र में कहा गया है कि संवाद ही सभी समस्याओं का स्थायी समाधान है और दोनों देशों को शांति, सहयोग तथा विकास के साझा लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। हालांकि, इस पहल पर दोनों सरकारों की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। हाल के दिनों में महिलाओं से जुड़े कुछ हाई-प्रोफाइल आपराधिक मामलों ने समाज में नई बहस छेड़ दी है। सोनम रघुवंशी, रिया रस्तोगी और सिया गोयल जैसे मामलों के सामने आने के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या महिलाओं में आपराधिक प्रवृत्ति बढ़ रही है। हालांकि मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ चर्चित मामलों के आधार पर सभी महिलाओं के व्यवहार को नहीं आंका जा सकता। विशेषज्ञ के अनुसार, अपराध का किसी व्यक्ति के जेंडर से सीधा संबंध नहीं होता। जिस तरह पुरुषों द्वारा किए गए अपराधों के लिए पूरी पुरुष आबादी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, उसी तरह कुछ महिलाओं के अपराधों के आधार पर सभी महिलाओं को कटघरे में खड़ा करना भी उचित नहीं है। उनके अनुसार यह मुद्दा नैतिक मूल्यों, व्यक्तिगत परिस्थितियों और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा है। तनाव, मानसिक आघात और सामाजिक दबाव बन सकते हैं कारण विशेषज्ञों का कहना है कि महिलाओं में हिंसक या आपराधिक व्यवहार अचानक विकसित नहीं होता। इसके पीछे लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव, बचपन या जीवन में मिले मानसिक आघात (ट्रॉमा), भावनात्मक असंतुलन, नशे की लत, कुछ मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, व्यक्तित्व संबंधी विकार और सामाजिक परिस्थितियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसके अलावा घरेलू हिंसा का अनुभव, आर्थिक दबाव, रिश्तों में लगातार तनाव, अन्याय की भावना और समाज में हिंसा को सामान्य मानने की प्रवृत्ति भी किसी व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बढ़ती आक्रामकता भी लोगों की सोच और प्रतिक्रिया को प्रभावित कर रही है। टॉक्सिक रिश्ते और नकारात्मक संगत का भी असर साइकोलॉजिस्ट के मुताबिक कई मामलों में महिलाएं अपने जीवनसाथी या प्रेमी के प्रभाव में आकर अपराध का हिस्सा बन जाती हैं। ऐसे मामलों में 'टॉक्सिक रिलेशनशिप' और गलत संगत बड़ी भूमिका निभाते हैं। आधुनिक जीवनशैली, तकनीक तक आसान पहुंच और सामाजिक बदलावों ने महिलाओं की भागीदारी कई क्षेत्रों में बढ़ाई है, जिसका प्रभाव अपराध के पैटर्न में भी दिखाई देता है। हिंसा को जेंडर नहीं, व्यवहार के रूप में समझने की जरूरत विशेषज्ञों का कहना है कि गुस्सा और आक्रामकता किसी एक जेंडर की विशेषता नहीं, बल्कि मानवीय व्यवहार है। इसे जैविक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और पारिवारिक कारक मिलकर प्रभावित करते हैं। इसलिए हिंसा की घटनाओं को केवल महिला या पुरुष होने के नजरिए से देखने के बजाय उनके वास्तविक कारणों को समझना अधिक जरूरी है। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक आसान पहुंच, भावनात्मक समस्याओं की समय रहते पहचान, परिवार और समाज का सहयोग, तनाव प्रबंधन और स्वस्थ संवाद जैसी पहलें हिंसक व्यवहार को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। जागरूकता और रिपोर्टिंग भी बढ़ी है विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि महिलाओं की शिक्षा, जागरूकता और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी बढ़ने से अपराधों की रिपोर्टिंग पहले की तुलना में अधिक हो रही है। वहीं सोशल मीडिया के कारण हर घटना तेजी से लोगों तक पहुंचती है, जिससे कई बार यह धारणा बन जाती है कि अपराध अचानक बहुत बढ़ गए हैं। इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले लंबे समय के आंकड़ों और सामाजिक परिस्थितियों का संतुलित विश्लेषण करना आवश्यक है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से जारी तनावपूर्ण संबंधों के बीच दोनों देशों की 117 प्रमुख हस्तियों ने शांति और संवाद की नई पहल की है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif को लिखे संयुक्त पत्र में दोनों देशों से टकराव की बजाय बातचीत का रास्ता अपनाने और द्विपक्षीय रिश्तों को सामान्य बनाने की अपील की गई है। पत्र पर भारत की 61 और पाकिस्तान की 56 हस्तियों के हस्ताक्षर हैं। पूर्व नेताओं और सामाजिक हस्तियों ने की पहल पत्र पर भारत की ओर से जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah, Mehbooba Mufti, राज्यसभा सांसद Manoj Jha सहित कई पूर्व अधिकारी, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हस्ताक्षर किए हैं। पाकिस्तान की ओर से पूर्व विदेश मंत्री Khurshid Mahmud Kasuri समेत कई प्रमुख हस्तियां इस पहल का हिस्सा बनी हैं। उनका कहना है कि लगातार बढ़ती शत्रुता से दोनों देशों के विकास, क्षेत्रीय स्थिरता और आम नागरिकों के हित प्रभावित हो रहे हैं। 11 प्रमुख मांगें रखीं संयुक्त पत्र में दोनों सरकारों के सामने 11 प्रमुख सुझाव रखे गए हैं। इनमें द्विपक्षीय वार्ता दोबारा शुरू करना, जम्मू-कश्मीर सहित सभी विवादित मुद्दों पर बातचीत, सीमा पर सैन्य तनाव कम करना, लोगों के बीच संपर्क बढ़ाना, सांस्कृतिक और शैक्षणिक आदान-प्रदान बहाल करना, क्रिकेट और अन्य खेलों की द्विपक्षीय श्रृंखला शुरू करना, सीधी हवाई सेवाएं बहाल करना, वीजा प्रक्रिया सरल बनाना, दोनों देशों में हाई कमिश्नर की नियुक्ति, बस सेवाओं और सीमा पार आवाजाही को फिर से शुरू करना तथा व्यापारिक संबंधों को बहाल करने जैसी मांगें शामिल हैं। तनाव के बीच शांति की अपील यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब हाल के वर्षों में आतंकवादी घटनाओं, सीमावर्ती तनाव और कूटनीतिक मतभेदों के कारण दोनों देशों के संबंध लगातार प्रभावित रहे हैं। पत्र में कहा गया है कि संवाद ही सभी समस्याओं का स्थायी समाधान है और दोनों देशों को शांति, सहयोग तथा विकास के साझा लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। हालांकि, इस पहल पर दोनों सरकारों की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
दौसा: राजस्थान के दौसा जिले में दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर बुधवार तड़के एक भीषण सड़क हादसा हो गया। उत्तराखंड के ऋषिकेश से मध्य प्रदेश के इंदौर जा रही एक निजी बस आगे चल रहे ट्रक से टकरा गई। टक्कर इतनी जोरदार थी कि दोनों वाहनों में आग लग गई। हादसे में सात लोगों की मौत हो गई, जबकि कई यात्री घायल हो गए। धनावड़ा के पास हुआ हादसा पुलिस के अनुसार, दुर्घटना कोलवा थाना क्षेत्र के धनावड़ा के पास हुई। दौसा के पुलिस अधीक्षक पीयूष दीक्षित ने बताया कि हादसे में पांच लोगों की जलकर मौत हो गई, जबकि दो अन्य की सिर में गंभीर चोट लगने से जान चली गई। उन्होंने बताया कि हंस ट्रेवल्स की बस ऋषिकेश से इंदौर जा रही थी। इसी दौरान दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर बस आगे चल रहे ट्रक से टकरा गई। टक्कर के तुरंत बाद दोनों वाहनों में आग लग गई, जिससे मौके पर अफरा-तफरी मच गई। घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया हादसे के बाद स्थानीय लोगों और बचाव दल की मदद से यात्रियों को बस से बाहर निकाला गया। घायलों को तत्काल दौसा जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनका इलाज जारी है। दमकल और पुलिस ने संभाला मोर्चा घटना की सूचना मिलते ही पुलिस, दमकल विभाग और प्रशासन की टीमें मौके पर पहुंच गईं। काफी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया गया और राहत एवं बचाव अभियान चलाया गया। हादसे का वीडियो आया सामने इस भीषण दुर्घटना का वीडियो भी सामने आया है, जिसमें बस और ट्रक आग की लपटों में घिरे दिखाई दे रहे हैं। पुलिस ने हादसे के कारणों की जांच शुरू कर दी है। शुरुआती जांच में तेज रफ्तार या चालक की लापरवाही की संभावना से भी इनकार नहीं किया गया है, वास्तविक कारण जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।