चेन्नई, एजेंसियां। तमिलनाडु विधानसभा में सोमवार को पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके के वरिष्ठ नेता एम. करुणानिधि का नाम लिए जाने को लेकर हंगामा हो गया। विधानसभा में मंत्री आरवी रंजीत कुमार ने अपने संबोधन के दौरान करुणानिधि का सीधे नाम लिया। इस पर डीएमके विधायकों ने आपत्ति जताते हुए इसे सदन की परंपरा और मर्यादा के खिलाफ बताया।
विवाद बढ़ता देख मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने सदन में हस्तक्षेप किया और मंत्री की ओर से माफी मांगी। मुख्यमंत्री ने माना कि करुणानिधि को जिस तरीके से संबोधित किया गया, वह उचित नहीं था।
यह विवाद स्वास्थ्य और राजस्व विभाग की अनुदान मांगों पर विधानसभा में चल रही चर्चा के दौरान हुआ। वन मंत्री आरवी रंजीत कुमार पुराने चुनावों में कथित तौर पर वोट के बदले पैसे बांटने की प्रथा पर अपनी बात रख रहे थे।
इसी दौरान उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि का जिक्र किया, लेकिन उनके नाम के साथ ‘कलैग्नर’ या ‘पूर्व मुख्यमंत्री’ जैसे सम्मानजनक संबोधन का इस्तेमाल नहीं किया।
इस पर सदन में मौजूद डीएमके विधायकों ने तुरंत विरोध जताया।
मामला बढ़ता देख मुख्यमंत्री विजय ने खुद हस्तक्षेप किया। उन्होंने कहा कि करुणानिधि जैसे पूर्व मुख्यमंत्री को सदन में सम्मानजनक तरीके से संबोधित किया जाना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने मंत्री की ओर से माफी मांगते हुए कहा, “मैं उनकी ओर से माफी मांगता हूं।” इसके बाद सदन में चल रहा विवाद शांत कराने की कोशिश की गई।
दरअसल, मंत्री आरवी रंजीत कुमार विधानसभा में पुराने चुनावों की कथित व्यवस्था का जिक्र कर रहे थे। उन्होंने विवादित ‘तिरुमंगलम फॉर्मूला’ का भी उल्लेख किया।
मंत्री ने दावा किया कि पिछले चुनावों के दौरान कांचीपुरम विधानसभा क्षेत्र में कथित तौर पर एक वोट के बदले 1,500 रुपये तक बांटे गए थे। उन्होंने पुराने चुनावी तौर-तरीकों की तुलना मौजूदा सरकार से करते हुए कहा कि वर्तमान सरकार बिना पैसे बांटे सत्ता में आई है।
मंत्री के बयान में करुणानिधि का केवल नाम लिए जाने पर डीएमके विधायकों ने विरोध किया। पार्टी नेताओं का कहना था कि सदन में पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ नेताओं का उल्लेख परंपरा के अनुरूप सम्मानजनक संबोधन के साथ किया जाना चाहिए।
करुणानिधि तमिलनाडु के प्रमुख राजनीतिक नेताओं में शामिल रहे और लंबे समय तक डीएमके का नेतृत्व किया। विधानसभा में उनके नाम का उल्लेख पहले भी राजनीतिक बहस का हिस्सा रहा है।
मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप और माफी के बाद तत्काल विवाद को शांत करने की कोशिश की गई। हालांकि, इस घटना ने तमिलनाडु विधानसभा में राजनीतिक बयानबाजी और सदन की मर्यादा को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी से जुड़ी कथित आय से अधिक संपत्ति के मामले में CBI और ED को इलाहाबाद हाई कोर्ट में जांच रिपोर्ट दाखिल करने से रोक दिया है। साथ ही शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में चल रही इस मामले की कार्यवाही को अगली सुनवाई तक स्थगित करने का निर्देश दिया है। यह आदेश 17 अगस्त को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने राहुल गांधी की याचिका पर सुनाया। हाई कोर्ट के आदेश को राहुल गांधी ने दी थी चुनौती यह मामला कर्नाटक के भाजपा कार्यकर्ता एस. विग्नेश शिशिर की याचिका से जुड़ा है। याचिका में राहुल गांधी पर ज्ञात आय के स्रोतों से अधिक संपत्ति रखने के आरोप लगाए गए थे और CBI तथा ED से जांच की मांग की गई थी। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पहले केंद्रीय जांच एजेंसियों को इन आरोपों की जांच और प्रगति से संबंधित जानकारी देने के निर्देश दिए थे। राहुल गांधी ने हाई कोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। CBI-ED को रिपोर्ट दाखिल करने से रोका सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान CBI और ED को हाई कोर्ट के निर्देश के तहत कोई रिपोर्ट दाखिल नहीं करने को कहा। अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट को भी मामले में आगे की कार्यवाही फिलहाल टालने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ में CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे। अदालत ने मामले में याचिकाकर्ता, CBI और ED को नोटिस भी जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसियों से पूछा सवाल सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसियों की भूमिका पर भी सवाल उठाया। अदालत ने पूछा कि यदि आरोप इतने गंभीर हैं तो संबंधित एजेंसी ने खुद से कार्रवाई क्यों नहीं शुरू की और क्या उसे जांच के लिए अदालत के निर्देश की जरूरत थी। मामले में अगली सुनवाई तक इलाहाबाद हाई कोर्ट की कार्यवाही स्थगित रहेगी। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से राहुल गांधी को फिलहाल अंतरिम राहत मिली है, हालांकि यह आदेश आरोपों को सही या गलत ठहराने वाला अंतिम फैसला नहीं है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने सोमवार को अपनी नई राष्ट्रीय टीम की घोषणा कर दी। नई टीम में अनुभवी नेताओं के साथ कई प्रमुख चेहरों को अहम जिम्मेदारियां दी गई हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और विनोद तावड़े को राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है, जबकि पीयूष गोयल को राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई है। 13 नेताओं को बनाया गया राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बीजेपी की नई टीम में कुल 13 राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए गए हैं। इनमें वसुंधरा राजे सिंधिया, तीरथ सिंह रावत, राम माधव, बैजयंत जय पांडा, डी. पुरंदेश्वरी, रेखा वर्मा, वर्षाबेन नरेंद्रभाई दोशी, भारती प्रवीण पवार, मनप्रीत सिंह बादल, लाल सिंह आर्य, एम. नागराजा, तारिक मंसूर और मधुचंद्र कर शामिल हैं। स्मृति ईरानी समेत 8 नेता बने महासचिव नई राष्ट्रीय टीम में पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है। उनके अलावा बिप्लब देब, सुनील बंसल, विनोद तावड़े, सतीश पूनिया, गजेंद्र पटेल, हरीश द्विवेदी और संजय भाटिया को राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त किया गया है। वहीं बीएल संतोष राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) के पद पर बने रहेंगे। शिवप्रकाश और सौदान सिंह को भी अहम जिम्मेदारी बीजेपी ने शिवप्रकाश और सौदान सिंह को राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव (संगठन) नियुक्त किया है। पार्टी के नए संगठनात्मक ढांचे में इन नेताओं की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पीयूष गोयल होंगे राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल को पार्टी का नया राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बनाया गया है। नितिन नवीन की नई टीम के ऐलान के साथ बीजेपी के संगठनात्मक ढांचे में लंबे समय से चल रही बदलाव की प्रक्रिया अब पूरी हो गई है। नई टीम में अनुभव और अलग-अलग राज्यों के नेताओं को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश दिखाई दे रही है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस के भाषण में इस्तेमाल किए गए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर रविवार को राजनीतिक विवाद तेज हो गया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने पीएम मोदी पर पलटवार करते हुए सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ कहे जाने पर गर्व है। पीएम मोदी ने लाल किले से क्या कहा? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए कहा था कि सशस्त्र नक्सलवाद काफी कमजोर हुआ है, लेकिन ‘दिमागी नक्सल’ मानसिकता अभी भी चुनौती बनी हुई है। उन्होंने ऐसी विचारधारा को पहचानने और उससे सावधान रहने की बात कही। पीएम मोदी के मुताबिक, माओवादी हिंसा के खिलाफ सुरक्षा अभियानों के साथ-साथ विकास कार्यों के जरिए भी इस चुनौती से निपटा गया है। उन्होंने चेतावनी दी कि हथियारबंद नक्सलवाद कमजोर होने के बावजूद वैचारिक स्तर पर सक्रिय तत्वों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। चिदंबरम ने सोशल मीडिया पर दिया जवाब पी. चिदंबरम ने 16 अगस्त को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर बेहद संक्षिप्त लेकिन तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा कि “I am proud to be a dimagi naxal!” यानी उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ कहे जाने पर गर्व है। यह प्रतिक्रिया पीएम मोदी के स्वतंत्रता दिवस संबोधन के एक दिन बाद सामने आई। चिदंबरम की इस टिप्पणी को प्रधानमंत्री के बयान के खिलाफ राजनीतिक और वैचारिक पलटवार के तौर पर देखा जा रहा है। कांग्रेस ने भी पीएम के बयान पर उठाए सवाल इससे पहले कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी प्रधानमंत्री के ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान की आलोचना की थी। उन्होंने ‘अर्बन नक्सल’ शब्द के पुराने राजनीतिक इस्तेमाल का उल्लेख करते हुए कहा कि संसद में सरकार से इसकी परिभाषा पूछे जाने पर गृह मंत्री ने कहा था कि ‘अर्बन नक्सल’ जैसी कोई आधिकारिक परिभाषा नहीं है। वहीं, सत्ता पक्ष के कुछ नेताओं ने पीएम मोदी के बयान का समर्थन किया है। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और बिहार के नेता जीतन राम मांझी ने वैचारिक नक्सलवाद के खतरे को लेकर प्रधानमंत्री की बात का समर्थन किया। बयान से बढ़ी राजनीतिक बहस पीएम मोदी और पी. चिदंबरम के बीच यह जुबानी टकराव ऐसे समय हुआ है जब स्वतंत्रता दिवस के भाषण के बाद नक्सलवाद, वैचारिक असहमति और राजनीतिक विरोध को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बहस तेज हो गई है। चिदंबरम की टिप्पणी के बाद ‘दिमागी नक्सल’ शब्द सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में भी प्रमुख मुद्दा बन गया है।