अमेरिका और Iran के बीच बढ़ता तनाव अगर खुले युद्ध में बदलता है, तो इसका असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहेगा। दुनिया की खाद्य सप्लाई, खेती-किसानी और आम लोगों की थाली तक पर इसका गहरा असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट 2022 के रूस-यूक्रेन युद्ध से भी बड़ा साबित हो सकता है, क्योंकि इस बार मामला दुनिया की सबसे अहम ऊर्जा सप्लाई रूट्स में से एक Strait of Hormuz से जुड़ा है। दुनिया का बड़ा हिस्सा यहीं से तेल और गैस प्राप्त करता है।
आधुनिक खेती पूरी तरह तीन चीजों पर निर्भर है:
अगर युद्ध के कारण तेल सप्लाई बाधित होती है, तो:
यानी खेती से लेकर खाने की प्लेट तक हर चरण प्रभावित होगा।
Saudi Aramco के CEO Amin Nasser ने चेतावनी दी है कि दुनिया पहले से ही “एनर्जी सप्लाई शॉक” का सामना कर रही है। अगर हालात बिगड़े, तो असर कई साल तक रह सकता है।
फर्टिलाइजर उद्योग प्राकृतिक गैस और तेल पर काफी निर्भर करता है। खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ने का मतलब है:
यही वजह है कि विशेषज्ञ 2027 तक असर बने रहने की आशंका जता रहे हैं।
United Nations Office for Project Services ने भी चेतावनी दी है कि अगर तनाव लंबा चला, तो करोड़ों लोग खाद्य संकट की चपेट में आ सकते हैं।
जो देश खाद्यान्न आयात पर निर्भर हैं, वहां हालात सबसे खराब हो सकते हैं, क्योंकि:
ऐसी स्थिति में अफ्रीका, दक्षिण एशिया और मध्य-पूर्व के गरीब देशों में भुखमरी का खतरा तेजी से बढ़ सकता है।
Strait of Hormuz दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल रूट्स में से एक है। यहां तनाव बढ़ने का मतलब:
अगर यह रास्ता असुरक्षित होता है, तो सिर्फ तेल ही नहीं, खाद्यान्न और जरूरी सामान की वैश्विक ढुलाई भी प्रभावित होगी।
अगर युद्ध लंबा चला, तो दुनिया भर में:
जैसी समस्याएं देखने को मिल सकती हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि कोविड महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक सप्लाई चेन पहले ही कमजोर हो चुकी है। ऐसे में अमेरिका-ईरान युद्ध दुनिया की अर्थव्यवस्था को एक और बड़े झटके में धकेल सकता है।
सबसे बड़ी चिंता यही है कि अगर खाद और ईंधन की सप्लाई लंबे समय तक प्रभावित हुई, तो इसका असर सिर्फ कुछ महीनों का नहीं बल्कि कई सालों तक दिखाई दे सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
अदन, एजेंसियां। लाल सागर के रणनीतिक बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य में खाद्य सामग्री ले जा रहे एक कमर्शियल जहाज पर मिसाइल हमला हुआ है। यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार ने इस हमले के लिए ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों को जिम्मेदार ठहराया है। हमले में कम से कम छह लोगों की मौत हुई है। तीन बैलिस्टिक मिसाइलों से बनाया निशाना यमन के परिवहन मंत्रालय के मुताबिक, हूतियों ने ‘तिहामा’ नाम के एक छोटे कार्गो जहाज पर तीन बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। जहाज पर खाद्य सामग्री ले जाई जा रही थी। मिसाइल हमले के बाद जहाज में आग लग गई। अधिकारियों के अनुसार, शुरुआती हमले में चार क्रू मेंबर्स की मौत हुई। इनमें तीन पाकिस्तानी और एक इंडोनेशियाई नागरिक शामिल थे। चार अन्य क्रू मेंबर्स घायल हुए। रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान दोबारा हुआ हमला हमले के बाद बचाव अभियान शुरू किया गया। यमन सरकार के अनुसार, रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान जहाज को दोबारा निशाना बनाया गया। इस दूसरे हमले को अधिकारियों ने रेस्क्यू टीम और जहाज पर मौजूद लोगों की जान को खतरे में डालने वाली कार्रवाई बताया। बाद में यमन के कोस्ट गार्ड ने पुष्टि की कि मृतकों में दो बचावकर्मी भी शामिल हैं। इस तरह हमले में मरने वालों की कुल संख्या छह हो गई। जहाज के मालिकाना हक को लेकर सामने आई अलग-अलग जानकारी शुरुआती रिपोर्टों में दावा किया गया था कि हमले की चपेट में आया जहाज सऊदी अरब के स्वामित्व वाला है। हालांकि, समुद्री ट्रैकिंग और खुफिया जानकारी से जुड़ी अलग-अलग रिपोर्टों में जहाज के मालिकाना हक को लेकर अलग जानकारी सामने आई। MarineTraffic के डेटा के अनुसार, ‘तिहामा’ तंजानिया के झंडे के नीचे संचालित हो रहा था और इसके मालिक मिस्र तथा यमन में पंजीकृत कंपनियां बताई गई हैं। जाजान में अरामको रिफाइनरी पर भी हमला इस बीच सऊदी अरब के जाजान इलाके में अरामको रिफाइनरी में आग लगने की घटना भी सामने आई। हूती प्रवक्ता याह्या सरी ने दावा किया कि उनके समूह ने सऊदी अरब द्वारा सादा और हज्जा प्रांतों में किए गए ड्रोन ऑपरेशंस के जवाब में रिफाइनरी को ड्रोन से निशाना बनाया। सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्रालय ने रिफाइनरी में आग लगने की पुष्टि करते हुए बताया कि आग पर काबू पा लिया गया है। लाल सागर में इस ताजा हमले के बाद क्षेत्र में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा और समुद्री यातायात को लेकर चिंता एक बार फिर बढ़ गई है।
बुडापेस्ट, एजेंसियां। हंगरी की संसद ने मंगलवार, 11 अगस्त 2026, को पूर्व सुप्रीम कोर्ट प्रमुख एंड्रास बाका (András Baka) को देश का नया राष्ट्रपति चुन लिया। 73 वर्षीय बाका इस पद के लिए एकमात्र उम्मीदवार थे और उन्हें 140 सांसदों का समर्थन मिला, जबकि 6 सांसदों ने विरोध में मतदान किया। विपक्षी फिडेज़ पार्टी ने मतदान का बहिष्कार किया। विक्टर ओर्बान के आलोचक रहे हैं बाका एंड्रास बाका को हंगरी के पूर्व प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बान के आलोचक के तौर पर जाना जाता है। वह 2009 में देश के सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख बने थे, लेकिन न्यायिक सुधारों को लेकर सरकार की आलोचना करने के बाद 2011 में उनका कार्यकाल समय से पहले समाप्त कर दिया गया था। बाद में यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय ने उनकी समयपूर्व बर्खास्तगी को उनके अधिकारों का उल्लंघन माना था। पीटर मैज्यार की सरकार का बड़ा कदम बाका का चुनाव प्रधानमंत्री पीटर मैज्यार की सरकार द्वारा ओर्बान-युग की संस्थागत व्यवस्था में बदलाव की कोशिश के बीच हुआ है। मैज्यार की Tisza पार्टी ने बाका को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाया था। बाका ने अपने शुरुआती संबोधन में राजनीतिक बदलाव के दौरान बदले की राजनीति से बचने और देश के सभी नागरिकों का प्रतिनिधित्व करने की बात कही। 19 अगस्त को संभालेंगे राष्ट्रपति पद संसद द्वारा चुने जाने के बावजूद बाका तुरंत राष्ट्रपति पद का कार्यभार नहीं संभालेंगे। रिपोर्टों के अनुसार वह 19 अगस्त 2026 को आधिकारिक रूप से पद ग्रहण करेंगे। हंगरी में राष्ट्रपति का पद मुख्य रूप से औपचारिक है, लेकिन राष्ट्रपति को कानूनों की समीक्षा करने समेत कुछ महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं। यह चुनाव हंगरी की राजनीति में इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि बाका का राष्ट्रपति बनना ओर्बान युग के बाद संस्थागत बदलाव की दिशा में एक प्रतीकात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है।
दमिश्क, एजेंसियां। सीरिया की एक अदालत ने पूर्व राष्ट्रपति बशर अल-असद को युद्ध अपराधों और मानवता के खिलाफ अपराधों के मामले में अनुपस्थिति में मौत की सजा सुनाई है। 11 अगस्त 2026 को सुनाए गए इस फैसले में हत्या, यातना और मनमानी गिरफ्तारी समेत गंभीर अपराधों के लिए असद को दोषी ठहराया गया। यह असद के सत्ता से हटने के बाद उनके खिलाफ सीरिया में आया पहला बड़ा आधिकारिक दोषसिद्धि फैसला है। भाई और पूर्व अधिकारियों को भी मौत की सजा अदालत ने बशर अल-असद के भाई माहेर अल-असद को भी अनुपस्थिति में मौत की सजा सुनाई है। इसके अलावा पूर्व सुरक्षा अधिकारी आतेफ नजीब को भी मौत की सजा दी गई। नजीब अदालत में मौजूद थे और उनके खिलाफ कार्रवाई 2011 में दारा में हुए दमन से जुड़ी है, जिसे सीरियाई विद्रोह की शुरुआत से जोड़ा जाता है। सीरियाई गृहयुद्ध के दौरान गंभीर अपराधों का आरोप अदालत का फैसला करीब 14 साल चले सीरियाई गृहयुद्ध के दौरान हुई हत्याओं, यातना, मनमानी गिरफ्तारियों और अन्य मानवाधिकार उल्लंघनों से संबंधित है। इस संघर्ष में लगभग 5 लाख लोगों की मौत होने का अनुमान है। असद शासन पर नागरिकों के खिलाफ व्यापक दमन और युद्ध अपराधों के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं। असद रूस में, सजा लागू करना बड़ी चुनौती बशर अल-असद दिसंबर 2024 में सत्ता से बेदखल होने के बाद रूस चले गए थे, जहां उन्हें शरण मिली। चूंकि वह सीरियाई अदालत में मौजूद नहीं थे, इसलिए फैसला अनुपस्थिति में सुनाया गया। इसी वजह से मौत की सजा को वास्तव में लागू करना फिलहाल बड़ी चुनौती है। इस फैसले को सीरिया में जवाबदेही और संक्रमणकालीन न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि, मानवाधिकार संगठनों ने मुकदमे की निष्पक्षता और कानूनी प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए हैं।