मॉस्को/सेंट पीटर्सबर्ग, एजेंसियां। रूस के दूसरे सबसे बड़े शहर सेंट पीटर्सबर्ग के पास यूक्रेन के ड्रोन हमले के बाद एक बड़े गोदाम में भीषण आग लग गई। रूसी अधिकारियों के अनुसार, हमला लेनिनग्राद क्षेत्र में स्थित प्रमुख ई-कॉमर्स कंपनी वाइल्डबेरीज़ (Wildberries) के विशाल वेयरहाउस पर हुआ, जिसके बाद पूरे इलाके में धुएं का गुबार फैल गया।
लेनिनग्राद क्षेत्र के गवर्नर ने बताया कि यूक्रेनी ड्रोन के हमले के तुरंत बाद गोदाम में आग भड़क उठी। दमकल की कई टीमें घंटों तक आग बुझाने में जुटी रहीं। सुरक्षा कारणों से आसपास के इलाके को खाली कराया गया और हवाई सुरक्षा प्रणाली को अलर्ट पर रखा गया।
रूसी प्रशासन का आरोप है कि यूक्रेन अब केवल ऊर्जा प्रतिष्ठानों ही नहीं, बल्कि लॉजिस्टिक्स और सप्लाई नेटवर्क को भी निशाना बना रहा है। वाइल्डबेरीज़ रूस की सबसे बड़ी ऑनलाइन रिटेल कंपनियों में से एक है और उसका वेयरहाउस देशभर में सामान की आपूर्ति का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
विश्लेषकों का मानना है कि हाल के सप्ताहों में यूक्रेन ने रूस के भीतर गहराई तक ड्रोन हमले बढ़ाए हैं। इन हमलों का उद्देश्य रूस की आपूर्ति व्यवस्था और युद्ध से जुड़े लॉजिस्टिक्स ढांचे को प्रभावित करना बताया जा रहा है। हालांकि यूक्रेन ने इस विशेष हमले पर आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है।
रिपोर्टों के अनुसार, यह एक सप्ताह के भीतर वाइल्डबेरीज़ के गोदामों पर तीसरा बड़ा हमला है। लगातार हो रहे हमलों से कंपनी के परिचालन और हजारों छोटे कारोबारियों की आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
हमले के बाद सेंट पीटर्सबर्ग और आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी कर दी गई है। रूसी रक्षा मंत्रालय ने दावा किया कि कई अन्य यूक्रेनी ड्रोन को भी हवाई रक्षा प्रणाली ने मार गिराया, जबकि घटना की विस्तृत जांच जारी है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
बीजिंग, एजेंसियां। चीन ने यूरोप की 14 कंपनियों पर निर्यात प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है। यह कदम चीन और यूरोपीय देशों के बीच बढ़ते व्यापारिक और रणनीतिक तनाव के बीच उठाया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से वैश्विक सप्लाई चेन, विशेषकर हाई-टेक, रक्षा और औद्योगिक उपकरणों की आपूर्ति पर असर पड़ सकता है। 14 यूरोपीय कंपनियों पर लगाया गया प्रतिबंध चीन के वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, प्रतिबंधित कंपनियों को कुछ संवेदनशील और रणनीतिक वस्तुओं के निर्यात पर रोक लगा दी गई है। सरकार का कहना है कि यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा और देश के रणनीतिक हितों की रक्षा के लिए उठाया गया है। यूरोप-चीन व्यापार संबंधों में बढ़ सकता है तनाव विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के बाद चीन और यूरोपीय संघ (EU) के बीच व्यापारिक संबंधों में और तनाव बढ़ सकता है। हाल के महीनों में दोनों पक्षों के बीच इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर और अन्य तकनीकी उत्पादों को लेकर कई व्यापारिक विवाद सामने आए हैं। वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ सकता है असर चीन वैश्विक विनिर्माण और निर्यात का प्रमुख केंद्र है। ऐसे में निर्यात प्रतिबंधों का असर कई देशों की कंपनियों पर पड़ सकता है, जो चीनी कच्चे माल और तकनीकी उपकरणों पर निर्भर हैं। उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि इससे उत्पादन लागत बढ़ सकती है और कुछ क्षेत्रों में आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका है। वैश्विक कंपनियां हालात पर रख रही हैं नजर इस फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय कंपनियां और निवेशक चीन-यूरोप व्यापार संबंधों पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। यदि दोनों पक्षों के बीच तनाव और बढ़ता है, तो इसका असर वैश्विक व्यापार, निवेश और विनिर्माण क्षेत्र पर भी देखने को मिल सकता है।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोपीय संघ (EU) को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि अमेरिकी टेक कंपनियों को निशाना बनाने की कीमत यूरोप को चुकानी पड़ेगी। यह बयान यूरोपीय आयोग द्वारा Google पर €890 मिलियन (लगभग 1 अरब डॉलर) का जुर्माना लगाने के एक दिन बाद आया है। Google पर जुर्माना बना विवाद की वजह यूरोपीय आयोग ने Google पर डिजिटल मार्केट्स एक्ट (DMA) के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए दो मामलों में कुल €890 मिलियन का जुर्माना लगाया। आयोग का कहना है कि Google ने अपने Search और Play Store में अपने ही प्लेटफॉर्म को अनुचित बढ़त दी, जिससे प्रतिस्पर्धा प्रभावित हुई। ट्रंप ने कहा— EU अमेरिकी कंपनियों को 'लूट' रहा है ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा कि यूरोपीय संघ अमेरिकी कंपनियों को "Robbing American Companies" (लूट रहा है)। उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई "अवैध और बेहद अनैतिक" है और इसके जवाब में अमेरिका Trade Act 1974 की Section 301 के तहत यूरोपीय संघ की व्यापारिक नीतियों की औपचारिक जांच शुरू करेगा। नए टैरिफ लगाने की चेतावनी ट्रंप ने संकेत दिया कि जांच के बाद यूरोपीय संघ के उत्पादों पर "Substantial Tariff" (भारी आयात शुल्क) लगाया जा सकता है। उनका कहना है कि अमेरिका अपने उद्योगों और करदाताओं के हितों की रक्षा करेगा और यूरोपीय संघ की कथित भेदभावपूर्ण नीतियों का जवाब देगा। EU ने अपने फैसले का बचाव किया यूरोपीय आयोग ने कहा कि Google पर लगाया गया जुर्माना पूरी तरह प्रतिस्पर्धा कानूनों के तहत है और इसका उद्देश्य डिजिटल बाजार में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करना है। आयोग ने स्पष्ट किया कि किसी भी कंपनी के साथ उसके मूल देश के आधार पर भेदभाव नहीं किया गया है। बढ़ सकता है अमेरिका-EU व्यापार तनाव विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका वास्तव में नए टैरिफ लागू करता है, तो अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच व्यापारिक तनाव और बढ़ सकता है। दोनों पक्ष पहले भी डिजिटल टैक्स, टेक कंपनियों और व्यापार शुल्क को लेकर आमने-सामने रहे हैं।
Pakistan on CJP Protest: दिल्ली में नीट-यूजी पेपर लीक मामले को लेकर चल रहे CJP (कॉकरोच जनता पार्टी) के आंदोलन और छात्रों पर हुए पुलिस लाठीचार्ज पर पाकिस्तान की पहली प्रतिक्रिया सामने आई है। पाकिस्तान ने इस पूरे विवाद को भारत का आंतरिक मामला बताते हुए किसी भी तरह की टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। पाकिस्तान ने क्या कहा? पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर हुसैन अंद्राबी से प्रेस ब्रीफिंग के दौरान पूछा गया कि दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस कार्रवाई को क्या वह मानवाधिकारों का उल्लंघन मानते हैं। इस पर उन्होंने कहा कि यह भारत का आंतरिक मामला है और पाकिस्तान इस पर कोई टिप्पणी नहीं करेगा। पेपर लीक पर सरकार की तैयारी नीट-यूजी पेपर लीक विवाद के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेपर लीक मामलों की तेज सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने और दोषियों को जल्द सख्त सजा दिलाने की घोषणा की है। सरकार परीक्षा प्रणाली को और मजबूत बनाने के लिए कानून में संशोधन की तैयारी भी कर रही है। CJP ने उठाए व्यवस्था पर सवाल प्रधानमंत्री की घोषणा पर प्रतिक्रिया देते हुए CJP ने कहा कि केवल दोषियों को सजा देने से समस्या खत्म नहीं होगी। संगठन के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रांका ने कहा कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि पेपर बार-बार लीक क्यों हो रहे हैं। रांका ने आरोप लगाया कि व्यवस्था में जवाबदेही की कमी है। उन्होंने कहा कि जब तक जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं होगी, सिस्टम को मजबूत नहीं बनाया जाएगा और दोषियों के मन में कानून का डर पैदा नहीं होगा, तब तक पेपर लीक जैसी घटनाएं नहीं रुकेंगी। सरकार और CJP के बीच गतिरोध केंद्र सरकार का कहना है कि वह आंदोलनकारी छात्रों से बातचीत के लिए तैयार है। केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने दावा किया कि पिछले 24 घंटे के दौरान CJP को चार बार बातचीत का प्रस्ताव भेजा गया, लेकिन संगठन की ओर से कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला। उन्होंने कहा कि सरकार छात्रों से उनके कार्यालय या आवास सहित किसी भी उपयुक्त स्थान पर चर्चा के लिए तैयार है। हिंसा में शामिल लोगों पर कार्रवाई की तैयारी सूत्रों के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान हिंसा में शामिल लोगों की पहचान के लिए दिल्ली पुलिस सीसीटीवी फुटेज, वीडियो रिकॉर्डिंग और अन्य तकनीकी साक्ष्यों की जांच कर रही है। जिन लोगों की हिंसा में संलिप्तता सामने आएगी, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई के साथ पासपोर्ट रद्द करने जैसे कदम भी उठाए जा सकते हैं। सुरक्षा के मद्देनजर बढ़ाई गई सतर्कता दिल्ली में प्रदर्शन को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी कर दी गई है। कनॉट प्लेस और आसपास के इलाकों में एहतियात के तौर पर कई दुकानें, कार्यालय और रेस्तरां निर्धारित समय से पहले बंद कराए गए हैं। वहीं CJP ने ऐलान किया है कि यदि उनकी प्रमुख मांगों पर ठोस फैसला नहीं हुआ तो आंदोलन आगे भी जारी रहेगा।