झारखंड

चाईबासा में देवर ने भाभी की पीट-पीटकर की हत्या, आरोपी गिरफ्तार

Anjali Kumari अप्रैल 28, 2026 0
chaibasa crime news
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चाईबासा। चाईबासा के मंझारी थाना क्षेत्र के कासिया गांव में एक सनसनीखेज हत्या का मामला सामने आया है। यहां एक व्यक्ति ने अपनी 65 वर्षीय भाभी पार्वती भूमिज की डंडे से पीट-पीटकर हत्या कर दी। शुरुआत में मृतका की मौत को सामान्य माना जा रहा था, लेकिन अंतिम संस्कार की तैयारी के दौरान गर्दन और गाल पर गहरे चोट के निशान दिखने से परिजनों को शक हुआ। इसके बाद मामले की सूचना पुलिस को दी गई।

 

पुलिस पूछताछ में आरोपी ने कबूला जुर्म


पुलिस ने मौके पर पहुंचकर जांच शुरू की और संदेह के आधार पर मृतका के देवर दुलाई भूमिज को हिरासत में लिया। सख्त पूछताछ के दौरान आरोपी ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। उसकी निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल किया गया डंडा भी बरामद कर लिया गया है। पुलिस ने शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया है और मामले की गहन जांच जारी है।

 

पहले भी कर चुका है पत्नी की हत्या


पुलिस के अनुसार आरोपी का आपराधिक इतिहास काफी गंभीर रहा है। वर्ष 2011 में उसने अपनी पत्नी इंद्रावती भूमिज की हत्या मसाला पीसने वाले पत्थर से वार कर की थी। इस मामले में उसे 13 साल की उम्रकैद की सजा हुई थी। हाल ही में जेल से रिहा होने के बाद वह गांव लौटा था और अब उसने इस वारदात को अंजाम दिया।

 

हत्या के कारणों की जांच जारी


फिलहाल पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि आरोपी ने अपनी भाभी की हत्या क्यों की। गांव में इस घटना के बाद दहशत का माहौल है। पुलिस का कहना है कि जल्द ही पूरे मामले का खुलासा किया जाएगा।

 

हजारीबाग में सड़क हादसे में वायुसेना जवान की मौत


वहीं हजारीबाग  में एक सड़क हादसे में वायुसेना के जवान दीपक कुमार (34) की मौत हो गई। बस और मोटरसाइकिल की टक्कर में उनकी मौके पर ही जान चली गई। वह छुट्टी पर घर आए थे और एक शादी में जा रहे थे।

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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प्रसिद्ध सेंदरा पर्व में पुरुषों के पारंपरिक वेश में शिकार के लिए निकलती हैं आदिवासी महिलाएं

रांची। झारखंड के आदिवासी समाज का प्रसिद्ध सेंदरा पर्व इस बार एक नए और सकारात्मक रूप में देखने को मिला। सदियों पुरानी परंपरा के तहत जहां पहले शिकार किया जाता था, वहीं इस बार आदिवासियों ने वन्यजीवों की रक्षा का संकल्प लिया। यह बदलाव प्रकृति संरक्षण की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।   दलमा अभयारण्य में दिखी नई पहल दलमा वन्यजीव अभयारण्य में आयोजित इस पर्व में झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल से हजारों आदिवासी शामिल हुए। पारंपरिक हथियारों के साथ जंगलों में प्रवेश तो किया गया, लेकिन इस बार शिकार नहीं किया गया। इसके बजाय वन्यजीवों की पूजा कर उन्हें बचाने का संदेश दिया गया। वन विभाग के जागरूकता अभियान का इस बदलाव में महत्वपूर्ण योगदान रहा।   महिलाओं की अनोखी परंपरा सेंदरा पर्व को ‘जनी शिकार’ भी कहा जाता है, जिसमें महिलाएं पुरुषों के पारंपरिक वेश में जंगल की ओर जाती हैं। यह परंपरा साहस और सामुदायिक शक्ति का प्रतीक है। एक लोककथा के अनुसार, संकट के समय महिलाओं ने इसी रूप में गांव की रक्षा की थी, जिसके बाद यह परंपरा शुरू हुई।   प्रकृति और संस्कृति का संगम आदिवासी समाज के लिए यह पर्व केवल शिकार तक सीमित नहीं, बल्कि जल, जंगल और जमीन के प्रति सम्मान का प्रतीक है। इस बार लोगों ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना है, न कि वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाना।   सुरक्षा के कड़े इंतजाम वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए प्रशासन ने करीब 500 जवानों की तैनाती की और कई चेकपोस्ट बनाए। ड्रोन और सीसीटीवी से निगरानी भी की गई। अधिकारियों ने आदिवासी समाज के इस सकारात्मक बदलाव की सराहना की और इसे ऐतिहासिक कदम बताया।

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ट्रेजरी घोटाला का बढ़ रहा दायरा शिक्षक और DSP ने भी की गड़बड़ी

रांची। झारखंड में वेतन निकासी से जुड़े एक बड़े ट्रेजरी घोटाले का खुलासा महालेखाकार (AG) की ऑडिट रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के 33 में से 14 कोषागारों में तैनात कर्मचारियों ने सिस्टम की तकनीकी खामियों का फायदा उठाकर एक ही महीने में दो-दो बार वेतन और एरियर की निकासी कर ली। इस गड़बड़ी में डीएसपी से लेकर सिपाही और अन्य सरकारी कर्मचारी तक शामिल पाए गए हैं।   ऑडिट रिपोर्ट में क्या आया सामने? ऑडिट रिपोर्ट में सामने आया है कि कुल 614 कर्मचारियों ने इस फर्जीवाड़े को अंजाम दिया, जिससे सरकारी खजाने को 31.47 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। इनमें से करीब 7.67 करोड़ रुपये केवल दोहरे वेतन भुगतान के कारण निकाले गए। यह मामला वित्तीय निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।   घोटाले की सबसे चौंकाने वाली बात क्या है? घोटाले की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि डीएसपी से लेकर सिपाही स्तर के कर्मचारियों ने सिस्टम की खामियों का फायदा उठाकर करोड़ो रुपये की अवैध निकासी की। डीएसपी स्तर के अधिकारियों नौशाद आलम, राजेश यादव, मणिभूषण प्रसाद और मुकेश कुमार महतो पर आरोप है कि उन्होंने अपनी पदस्थापनाओं के दौरान नियमों की अनदेखी करते हुए दोहरा वेतन और एरियर प्राप्त किया। इसके अलावा बड़ी संख्या में सिपाही, सहायक शिक्षक और चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी भी इस सूची में शामिल हैं।   14 कोषागार महालेखाकार द्वारा चिन्हित 14 कोषागार रांची, हजारीबाग, बोकारो, देवघर, पलामू, गोड्डा, जमशेदपुर, गुमला, खूंटी और रामगढ़ सहित अन्य जिलों में स्थित हैं। इन सभी स्थानों पर वेतन भुगतान प्रणाली में गंभीर खामियां उजागर हुई हैं। जांच में कई सिपाहियों और कर्मचारियों के नाम भी सामने आए हैं, जिन्होंने तकनीकी लूपहोल का लाभ उठाकर अवैध भुगतान प्राप्त किया। महालेखाकार ने इस पूरे मामले को गंभीर वित्तीय अनियमितता मानते हुए राज्य सरकार को दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने और अवैध रूप से निकाली गई राशि की वसूली सुनिश्चित करने की सिफारिश की है। यह घोटाला सरकारी वित्तीय प्रणालियों में कई खामियां पर सवाल खड़ा करता है।  ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए तकनीकी सुधार, पारदर्शिता और कड़ी निगरानी व्यवस्था लागू करना बेहद जरूरी है।

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झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 54 पुलिसकर्मियों का ट्रांसफर रद्द

रांची। झारखंड हाई कोर्ट  ने पुलिसकर्मियों के ट्रांसफर से जुड़े एक अहम मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने W.P (S) No. 1781 of 2025 पर सुनवाई करते हुए 54 पुलिसकर्मियों के ट्रांसफर आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने पाया कि इन तबादलों में निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया था। इसके साथ ही पुलिस मुख्यालय द्वारा जारी आदेश (ज्ञापांक 238/पी, दिनांक 24.02.2025) को भी निरस्त कर दिया गया। अदालत ने निर्देश दिया कि सभी प्रभावित पुलिसकर्मियों को पुनः धनबाद जिले में योगदान कराया जाए।   राहत के लिए दर-दर भटके, अंततः कोर्ट से मिली न्याय यह मामला उन पुलिसकर्मियों से जुड़ा है, जिन्हें “प्रशासनिक दृष्टिकोण” का हवाला देकर अलग-अलग जिलों में ट्रांसफर किया गया था। उन्होंने कई स्तरों पर अपनी शिकायत रखी, लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई। अंततः निराश होकर सभी ने नए स्थानों पर योगदान दे दिया, लेकिन न्याय के लिए उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया।   कोर्ट ने कहा—बिना ठोस आधार ट्रांसफर अनुचित सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि किसी भी सरकारी कर्मचारी का ट्रांसफर बिना ठोस कारण और नियमों के अनुरूप प्रक्रिया अपनाए नहीं किया जा सकता। यह निर्णय न केवल संबंधित पुलिसकर्मियों के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि भविष्य के लिए भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।   पुलिस एसोसिएशन ने उठाए पारदर्शिता के मुद्दे झारखंड पुलिस एसोसिएशन ने लंबे समय से इस मुद्दे को उठाते हुए आरोप लगाया था कि “प्रशासनिक दृष्टिकोण” के नाम पर कई बार मनमाने तरीके से तबादले किए जाते हैं। एसोसिएशन ने कहा कि इससे पुलिसकर्मियों के परिवार और मनोबल पर नकारात्मक असर पड़ता है। डीजीपी से स्पष्ट गाइडलाइन की मांग एसोसिएशन ने राज्य के पुलिस महानिदेशक से ट्रांसफर प्रक्रिया के लिए स्पष्ट और पारदर्शी गाइडलाइन जारी करने की मांग की है, ताकि भविष्य में ऐसे विवादों से बचा जा सके।

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