रांची। देश के टॉप-10 सदर अस्पतालों में शामिल रांची सदर अस्पताल की कार्यप्रणाली और स्वास्थ्य सेवाओं को समझने के लिए बिहार राज्य स्वास्थ्य समिति की टीम ने गुरुवार को अस्पताल का भ्रमण किया। टीम ने यहां संचालित स्वास्थ्य योजनाओं, आयुष्मान भारत योजना और मरीजों को मिल रही सुपर स्पेशलिटी सेवाओं की जानकारी ली।
बिहार से आई टीम में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, बिहार के अपर कार्यपालक निदेशक स्पर्श गुप्ता, बिहार राज्य स्वास्थ्य समिति की विशेषज्ञ चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. कंचन कुमारी और क्षेत्रीय लेखा प्रबंधक प्रदीप कुमार शामिल थे।
भ्रमण के दौरान बिहार की टीम ने रांची के सिविल सर्जन डॉ. अमरेंद्र प्रसाद, सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. बिमलेश कुमार सिंह, आयुष्मान योजना के नोडल अधिकारी डॉ. अखिलेश झा, डॉ. रचित भूषण और आयुष्मान समन्वयक आशीष रंजन समेत अन्य चिकित्सकों और अधिकारियों से बातचीत की।
टीम ने अस्पताल में चल रही विभिन्न स्वास्थ्य योजनाओं और मरीजों को उपलब्ध कराई जा रही सुविधाओं के बारे में विस्तार से जानकारी हासिल की। इसके बाद टीम ने अस्पताल के अलग-अलग विभागों और सेवाओं का निरीक्षण किया।
बिहार राज्य स्वास्थ्य समिति की टीम ने रांची सदर अस्पताल में आयुष्मान योजना के तहत संचालित स्वास्थ्य सेवाओं का विशेष रूप से अवलोकन किया। टीम ने यहां की व्यवस्थाओं और कार्यप्रणाली की सराहना की तथा इन बेहतर व्यवस्थाओं को बिहार में लागू करने की संभावनाओं को लेकर जानकारी जुटाई।
इसके अलावा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत संचालित कार्यक्रमों, मानव संसाधन, दवाओं की उपलब्धता, जरूरी सुविधाओं और मरीजों को सेवा देने की व्यवस्था का भी जायजा लिया गया।
टीम ने संबंधित अधिकारियों और स्वास्थ्यकर्मियों से योजनाओं के जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन और निगरानी से जुड़ी जानकारी ली। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य दोनों राज्यों के बीच स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े बेहतर अनुभवों और कार्यप्रणालियों को साझा करना रहा।
रांची सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. बिमलेश कुमार सिंह ने कहा कि अस्पताल लगातार बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने की दिशा में काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि रांची सदर अस्पताल की व्यवस्थाओं को देखने के लिए बिहार की टीम का आना झारखंड की बेहतर होती स्वास्थ्य व्यवस्था की उपलब्धि है।
उन्होंने कहा कि आयुष्मान योजना के बेहतर क्रियान्वयन से अस्पताल में कई सुपर स्पेशलिटी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना संभव हुआ है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
जमशेदपुर: Tata Steel ने अपने कॉरपोरेट कम्युनिकेशन विभाग में बड़ा संगठनात्मक बदलाव किया है। नया कम्युनिकेशन स्ट्रक्चर 1 सितंबर 2026 से प्रभावी होगा। कंपनी के अनुसार इस पुनर्गठन का उद्देश्य ब्रांड, स्टेकहोल्डर जुड़ाव और आंतरिक संचार को और मजबूत करना है। चीफ पीपुल ऑफिसर अत्रेयी सान्याल की ओर से जारी सर्कुलर के मुताबिक कई अधिकारियों को नई जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं और कुछ पद फिलहाल रिक्त रखे गए हैं। राजेश राजन को मिली बड़ी जिम्मेदारी राजेश राजन अब हेड कम्युनिकेशन रॉ मैटेरियल्स एंड झारखंड की जिम्मेदारी संभालेंगे। वह जमशेदपुर से काम करते हुए सीधे चीफ कॉरपोरेट कम्युनिकेशन को रिपोर्ट करेंगे। वहीं रवि कुमार के पदनाम में बदलाव करते हुए उन्हें हेड डिजिटल एंड एक्सटर्नल कम्युनिकेशन बनाया गया है। वह मुंबई मुख्यालय से अपनी जिम्मेदारी संभालेंगे। ओनम प्रियदर्शी हेड इंटरनल कम्युनिकेशन के पद पर कोलकाता से काम जारी रखेंगी। मालिनी गुप्ता को हेड कॉरपोरेट ब्रांड मैनेजमेंट की जिम्मेदारी दी गई है और वह मुंबई से काम करेंगी। तीन अहम पद फिलहाल रिक्त पुनर्गठन के तहत कंपनी ने तीन प्रमुख पदों को फिलहाल रिक्त रखा है। इनमें भुवनेश्वर का कम्युनिकेशन प्रमुख, जमशेदपुर का इवेंट मैनेजमेंट एंड कॉरपोरेट प्रोटोकॉल प्रमुख और कोलकाता का एंटरप्राइज कंटेंट मैनेजमेंट प्रमुख शामिल हैं। इन पदों के लिए आगे नए प्रमुखों की नियुक्ति की जा सकती है। निचले स्तर पर भी बदलाव नई संरचना में कई अन्य अधिकारियों की जिम्मेदारियां भी तय की गई हैं। झारखंड और जमशेदपुर क्षेत्र में अनुष्का सिन्हा, निभा कुमारी शर्मा, साइरस नमीन जहां पटेल और उमाकांत समेत अन्य अधिकारी रॉ मैटेरियल्स एवं झारखंड कम्युनिकेशन टीम के साथ काम करेंगे। इसके अलावा नमित गुप्ता को कॉरपोरेट ब्रांडिंग, इशानी दत्ता को इंटरनल कम्युनिकेशन, कीर्ति उप्रेती को कंटेंट, स्नेहा बिस्वास को सोशल मीडिया एवं डिजिटल और इशिता के भोगाई को इवेंट मैनेजमेंट की जिम्मेदारी दी गई है।
रांची: झारखंड में जेपीएससी और जेएसएससी समेत प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर जारी विवाद के बीच छात्र संगठनों का आक्रोश एक बार फिर सामने आया है। झारखंड हाईकोर्ट में गुरुवार को हुई सुनवाई के बाद जेपीएससी-जेएसएससी रिफॉर्म मंच ने राज्य सरकार पर छात्रों के साथ छल करने का आरोप लगाया है। मंच ने शुक्रवार को राज्यभर में मुख्यमंत्री का पुतला दहन करने का आह्वान किया है। रांची प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में मंच के नेताओं ने हाईकोर्ट की कार्रवाई को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की। मंच के रविंद्र पासवान ने कहा कि सुनवाई के दौरान हुई कार्रवाई से छात्रों को ठगा हुआ महसूस हुआ। सरकार की मंशा पर छात्र नेताओं ने उठाए सवाल रविंद्र पासवान ने कहा कि मुख्यमंत्री और सरकार के प्रतिनिधिमंडल की ओर से पहले छात्रों के हित में खड़े होने की बात कही गई थी। इसी वजह से छात्रों को उम्मीद थी कि अदालत की कार्यवाही में भी सरकार की ओर से छात्रहित को मजबूती से रखा जाएगा। उनका आरोप है कि हाईकोर्ट में हुई कार्रवाई के दौरान सरकार की ओर से वैसी मंशा दिखाई नहीं दी, जिसकी छात्रों को उम्मीद थी। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सरकार वास्तव में राज्य के छात्रों के साथ है, तो अदालत में भी उसका प्रभाव दिखाई देना चाहिए था। शुक्रवार को राज्यभर में पुतला दहन का आह्वान मंच ने इसी विरोध के तहत शुक्रवार को राज्य के सभी जिलों में मुख्यमंत्री का पुतला दहन करने का ऐलान किया है। छात्र नेताओं का कहना है कि यह कार्यक्रम सरकार के खिलाफ विरोध दर्ज कराने के लिए किया जाएगा। मंच के नेताओं ने कहा कि यदि सरकार ने छात्रों की मांगों और उनकी चिंताओं को गंभीरता से नहीं लिया, तो आने वाले समय में आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा। बड़े आंदोलन की चेतावनी मंच के कुणाल प्रताप सिंह ने आरोप लगाया कि हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से प्रभावी कानूनी पक्ष नहीं रखा गया। उनका कहना था कि जिस स्तर की कानूनी तैयारी की उम्मीद थी, वह नजर नहीं आई। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार छात्रों के साथ इसी तरह का रवैया जारी रखती है, तो दो महीने का इंतजार किए बिना ही बड़ा आंदोलन शुरू किया जा सकता है। मंच का दावा है कि इस आंदोलन में बड़ी संख्या में छात्र शामिल होंगे और मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग उठाई जाएगी। प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर पहले से जारी है विवाद झारखंड में JPSC और JSSC की विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर लंबे समय से अभ्यर्थियों के बीच नाराजगी है। परीक्षा प्रक्रिया, कथित अनियमितताओं और भर्ती से जुड़े विभिन्न मुद्दों को लेकर छात्र संगठन लगातार आंदोलन कर रहे हैं। अब हाईकोर्ट की सुनवाई के बाद छात्र नेताओं के ताजा बयान ने इस विवाद को और राजनीतिक रूप दे दिया है। हालांकि, मंच की ओर से लगाए गए आरोप उसके अपने दावे हैं और इन पर सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है। आने वाले दिनों में सरकार और छात्र संगठनों के बीच बातचीत होती है या आंदोलन और तेज होता है, इस पर सबकी नजर रहेगी।
रांची: झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की डिप्लोमा स्तरीय भर्ती परीक्षा से जुड़े कथित घोटाले में अरुण कुमार की हालिया गिरफ्तारी ने जांच की गति और कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सामने आए जांच दस्तावेजों के मुताबिक, अरुण की भूमिका और कथित पेपर लीक नेटवर्क की जानकारी जांच एजेंसी को वर्ष 2022 में ही मिल गई थी। इसके बावजूद उसकी गिरफ्तारी करीब चार साल बाद हुई। मामले में एक अन्य आरोपी अभिषेक कुमार की गिरफ्तारी के बाद पूछताछ और कॉल डिटेल रिकॉर्ड की जांच से कथित नेटवर्क की कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आई थीं। जांच में अरुण पर परीक्षा का ठेका लेने के बाद कथित तौर पर पेपर लीक कर अभ्यर्थियों से पैसे वसूलने की साजिश में शामिल होने का आरोप सामने आया था। कम दर पर टेंडर लेकर वसूली की कथित साजिश जांच से जुड़े दस्तावेजों के अनुसार, अरुण कुमार मेसर्स आईसीएन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और बिंसिस नामक कंपनियों से जुड़ा था। इन कंपनियों को झारखंड की डिप्लोमा स्तरीय भर्ती परीक्षा से जुड़े काम का ठेका मिला था। जांच में आरोप लगाया गया कि टेंडर प्रक्रिया में खर्च होने के बाद रकम की भरपाई के लिए अभ्यर्थियों से अवैध तरीके से पैसे वसूलने की योजना बनाई गई। इसी कथित योजना के तहत प्रश्नपत्र लीक कराने और चुनिंदा अभ्यर्थियों को परीक्षा से पहले उत्तर उपलब्ध कराने की बात सामने आई। विवाद बढ़ने के बाद संबंधित परीक्षा को स्थगित करना पड़ा था। अभिषेक की गिरफ्तारी से सामने आया था नेटवर्क 22 सितंबर 2022 को पटना हाईकोर्ट के तत्कालीन सेक्शन ऑफिसर अभिषेक कुमार को रांची पुलिस ने पटना स्थित उसके आवास से गिरफ्तार किया था। पूछताछ में उसने अरुण कुमार के साथ अपने कथित संपर्क और परीक्षा से जुड़ी योजना के बारे में जानकारी दी थी। जांच के मुताबिक, दोनों की पहचान वर्ष 2019 में पटना हाईकोर्ट में काम करने के दौरान हुई थी। बाद में अरुण ने कथित तौर पर अभिषेक से संपर्क कर झारखंड की डिप्लोमा स्तरीय भर्ती परीक्षा का टेंडर मिलने और प्रश्नपत्र लीक कर पैसे वसूलने की योजना बताई थी। आरोप है कि इसके बाद अभिषेक भी इस नेटवर्क का हिस्सा बन गया और उसने अपनी टीम तैयार की। सीडीआर से भी मिली थी अहम जानकारी जांच एजेंसी के मुताबिक, आरोपियों के कॉल डिटेल रिकॉर्ड की जांच में भी नेटवर्क की गतिविधियों से जुड़े संकेत मिले थे। रिपोर्ट के अनुसार, 2 जुलाई 2022 को गिरोह के कुछ सदस्य पटना के पुनपुन-परसाबाजार क्षेत्र में सक्रिय थे और अगले दिन उनके रांची पहुंचने की जानकारी सामने आई थी। इससे जांच एजेंसी के पास कथित नेटवर्क की गतिविधियों को लेकर महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य मौजूद होने की बात सामने आती है। ऐसे में चार साल बाद हुई गिरफ्तारी ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब शुरुआती जांच में ही महत्वपूर्ण सुराग उपलब्ध थे, तो कार्रवाई में इतनी देरी क्यों हुई। परीक्षा से पहले अभ्यर्थियों को कथित तौर पर रटवाए गए उत्तर पूछताछ में सामने आई जानकारी के अनुसार, करीब 100 अभ्यर्थियों को परीक्षा से एक दिन पहले पटना बुलाया गया था। आरोप है कि उनके मोबाइल फोन और मूल प्रमाणपत्र अपने पास रख लिए गए थे। इसके बाद अभ्यर्थियों को पुनपुन क्षेत्र के एक हॉल और पटना शहर के एक मकान में रखा गया। जांच में आरोप है कि वहां उन्हें परीक्षा के करीब 80 प्रतिशत प्रश्नों के उत्तर याद करवाए गए। बाद में उन्हें वाहनों के जरिए रांची और बोकारो के परीक्षा केंद्रों तक पहुंचाया गया। यदि जांच में ये आरोप प्रमाणित होते हैं, तो यह सिर्फ पेपर लीक का मामला नहीं बल्कि भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता और हजारों अभ्यर्थियों के भविष्य से जुड़ा गंभीर मामला बन जाता है। चार साल की देरी पर अब उठ रहे सवाल अरुण कुमार की गिरफ्तारी के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि 2022 में सामने आए कथित नेटवर्क और उपलब्ध जांच सामग्री के बावजूद कार्रवाई इतने लंबे समय तक क्यों नहीं हुई। क्या उस समय जांच किसी स्तर पर अटक गई थी या आरोपियों तक पहुंचने में कोई कानूनी अथवा प्रशासनिक बाधा थी, यह जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा। JSSC भर्ती परीक्षाओं को लेकर पहले से ही पारदर्शिता और निष्पक्षता के सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में इस मामले की जांच में पुराने रिकॉर्ड, डिजिटल साक्ष्य, टेंडर प्रक्रिया, आरोपी व्यक्तियों के बीच संपर्क और अभ्यर्थियों से कथित लेन-देन की कड़ियों को जोड़ना बेहद महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल अरुण कुमार की गिरफ्तारी के बाद 2022 की जांच फिर चर्चा में है। अब देखना होगा कि आगे की जांच में कथित पेपर लीक नेटवर्क से जुड़े और कितने नाम सामने आते हैं और चार साल की देरी की वजह भी स्पष्ट होती है या नहीं।