राष्ट्रीय

Kharge Upset Over Leaders’ Silence on Haldwani Row

शुद्धिकरण विवाद पर खरगे की नाराजगी, CWC बैठक में बोले- नेताओं की चुप्पी से हुआ दुख

surbhi अगस्त 20, 2026 0
Congress president Mallikarjun Kharge expresses displeasure over leaders’ silence on Haldwani purification controversy
Mallikarjun Kharge CWC Meeting Over Haldwani Controversy

नई दिल्ली: हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद हुए कथित शुद्धिकरण कार्यक्रम को लेकर कांग्रेस के भीतर भी चर्चा तेज हो गई है। बुधवार को दिल्ली में हुई कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) की बैठक में खरगे ने इस मुद्दे पर पार्टी नेताओं की चुप्पी को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, खरगे ने बैठक में कहा कि उन्हें इस बात से दुख पहुंचा कि CWC के कई सदस्यों ने शुद्धिकरण की घटना की खुलकर निंदा करते हुए उनका समर्थन नहीं किया। हालांकि, उन्होंने किसी नेता का नाम लेकर शिकायत नहीं की।

हल्द्वानी रैली के बाद हुआ था शुद्धिकरण

मामला 8 अगस्त का है, जब मल्लिकार्जुन खरगे ने हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस की विजय शंखनाद रैली को संबोधित किया था। इसके दो दिन बाद, 10 अगस्त को दक्षिणपंथी संगठन श्री राम सेना से जुड़े लोगों ने रैली स्थल पर शुद्धिकरण हवन किया था।

इस घटना को लेकर कांग्रेस ने कड़ी आपत्ति जताई थी। पार्टी नेताओं ने इसे आपत्तिजनक बताते हुए आरोप लगाया था कि इस तरह की घटना के पीछे बीजेपी और आरएसएस से जुड़े लोगों की मानसिकता है।

खरगे ने संसद में भी उठाया था मुद्दा

शुद्धिकरण विवाद को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष पहले भी सार्वजनिक तौर पर नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। मानसून सत्र के आखिरी दिन उन्होंने संसद में भी इस मुद्दे को उठाया था।

कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने CWC की बैठक के बाद मीडिया से बातचीत में इस घटना को अस्वीकार्य और निंदनीय बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसी घटनाएं बीजेपी की मानसिकता को दर्शाती हैं।

बीजेपी ने घटना से किया किनारा

वहीं, बीजेपी ने शुद्धिकरण कार्यक्रम से खुद को अलग कर लिया था। पार्टी की ओर से इस अनुष्ठान की निंदा भी की गई थी।

अब CWC बैठक में खरगे की नाराजगी सामने आने के बाद यह मामला कांग्रेस के अंदर भी चर्चा का विषय बन गया है। पार्टी अध्यक्ष की टिप्पणी से साफ है कि वे चाहते हैं कि ऐसे मुद्दों पर पार्टी के वरिष्ठ नेता सार्वजनिक रूप से एकजुट होकर अपनी प्रतिक्रिया दें।

 

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Surbhi

राष्ट्रीय

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Supreme Court
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, वैवाहिक विवाद में पितृत्व जांच का आदेश हर मामले में नहीं दिया जा सकता

नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में बच्चे के DNA या पितृत्व परीक्षण को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। अदालत ने कहा है कि बच्चे का DNA टेस्ट नियमित या महज आरोप के आधार पर नहीं कराया जा सकता। हालांकि, यदि बच्चे की पितृत्व संबंधी बात मामले के फैसले के लिए महत्वपूर्ण हो और उसे साबित करने का कोई दूसरा प्रभावी तरीका उपलब्ध न हो, तो परिस्थितियों के आधार पर अदालत DNA जांच का आदेश दे सकती है।   केवल पति के शक पर DNA टेस्ट नहीं   सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, वैवाहिक विवाद में सिर्फ पति द्वारा पत्नी पर बेवफाई का आरोप लगाने या बच्चे को अपना जैविक बच्चा न मानने से स्वचालित रूप से DNA टेस्ट का आदेश नहीं दिया जा सकता। अदालत को मामले की परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों को देखना होगा।   वैध विवाह में जन्मे बच्चे के लिए कानूनी संरक्षण   अदालत ने पहले के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे की वैधता के पक्ष में कानून में एक महत्वपूर्ण धारणा मौजूद है। इस धारणा को चुनौती देने के लिए प्रथम दृष्टया पर्याप्त सामग्री और उचित आधार होना जरूरी है।   निजता और बच्चे के भविष्य का भी ध्यान   सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया है कि DNA जांच व्यक्ति की निजता और शारीरिक स्वायत्तता से जुड़ा संवेदनशील मामला है। इसलिए अदालतों को यह देखना चाहिए कि जांच वास्तव में मामले के निपटारे के लिए जरूरी है या विवाद का फैसला बिना DNA टेस्ट के भी किया जा सकता है।   पितृत्व मामले का मुख्य मुद्दा होना जरूरी   यदि बच्चे का पितृत्व सिर्फ मामले से जुड़ा हुआ एक सहायक या गौण मुद्दा है और विवाद का फैसला दूसरे साक्ष्यों से हो सकता है, तो DNA टेस्ट का आदेश देना उचित नहीं माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ऐसी जांच को अदालतें सामान्य प्रक्रिया की तरह इस्तेमाल नहीं कर सकतीं।

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कोलकाता, एजेंसियां। मध्य कोलकाता के मिर्जा गालिब स्ट्रीट स्थित होटल शिखा इन में लगी भीषण आग में मरने वाले 9 लोगों में 5 बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान हुई है। इनमें से चार लोग एक ही परिवार के सदस्य थे। घटना में छह अन्य बांग्लादेशी नागरिक घायल हुए थे।   एक ही परिवार के चार लोगों की मौत   मृतकों में बांग्लादेश के कुश्तिया निवासी पत्रकार देबाशीष दत्ता, उनकी पत्नी, दो वर्षीय बेटे और पत्नी के पिता शामिल हैं। परिवार भारत यात्रा पर आया था और हादसे के बाद उनके घर में मातम पसरा है।   रात करीब 1:45 बजे लगी थी आग   हादसा 19 अगस्त की तड़के करीब 1:45 बजे पांच मंजिला इमारत में हुआ, जहां कई होटल और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान संचालित होते हैं। आग के बाद इमारत में धुआं भर गया और कई लोग कमरों में फंस गए। करीब 80 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला गया।   धुएं में दम घुटने से हुई कई मौतें   प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, कई लोगों की मौत धुएं के कारण दम घुटने से हुई। इमारत में कई कमरों में पर्याप्त खिड़कियां और सुरक्षित निकास की व्यवस्था नहीं होने की बात भी सामने आई है। आग लगने के वास्तविक कारण की जांच जारी है।   घटना की जांच के लिए SIT गठित   हादसे के बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) गठित किया है। पुलिस ने होटल के लीजधारक अबू जफर को गिरफ्तार किया है और दो कर्मचारियों को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है।

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सुप्रीम कोर्ट ने विधायकों की अयोग्यता पर स्पीकर की संवैधानिक भूमिका स्पष्ट की
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, विधायकों की अयोग्यता पर स्पीकर का अधिकार; कोर्ट नहीं निभा सकता उनकी भूमिका

नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के शिवसेना विवाद से जुड़ी सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि विधायकों की अयोग्यता पर फैसला लेने की पहली संवैधानिक जिम्मेदारी विधानसभा के स्पीकर की है। अदालत ने कहा कि वह खुद स्पीकर की भूमिका ग्रहण करके किसी विधायक को अयोग्य घोषित नहीं कर सकती। हालांकि, स्पीकर के फैसले की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।   शिंदे गुट के विधायकों की अयोग्यता का मामला     यह मामला उद्धव ठाकरे गुट की ओर से दायर याचिका से जुड़ा है, जिसमें एकनाथ शिंदे गुट में शामिल हुए विधायकों को अयोग्य घोषित करने की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह सवाल आया कि अगर स्पीकर का फैसला कानूनी रूप से गलत पाया जाता है तो क्या सुप्रीम कोर्ट खुद विधायकों को अयोग्य घोषित कर सकता है।     कोर्ट ने कहा- स्पीकर की भूमिका नहीं ले सकते     जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि क्या अदालत खुद स्पीकर की भूमिका निभाकर शिंदे गुट के विधायकों को अयोग्य घोषित कर सकती है। अदालत ने संकेत दिया कि वह स्पीकर के आदेश को रद्द कर मामले को दोबारा निर्णय के लिए स्पीकर के पास भेज सकती है, लेकिन खुद अयोग्यता का फैसला लेना अलग विषय है।     दसवीं अनुसूची के तहत स्पीकर को अधिकार     संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल के आधार पर विधायकों की अयोग्यता से जुड़े मामलों पर फैसला लेने का अधिकार विधानसभा के स्पीकर को दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों में भी कहा गया है कि सामान्य परिस्थितियों में स्पीकर ही इन याचिकाओं पर फैसला करने वाले उपयुक्त संवैधानिक प्राधिकारी हैं।     स्पीकर का फैसला न्यायिक समीक्षा के दायरे में     हालांकि स्पीकर को अयोग्यता पर फैसला लेने का अधिकार है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनका निर्णय अदालत की समीक्षा से बाहर है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि स्पीकर के फैसले को उचित मामलों में न्यायिक समीक्षा के तहत चुनौती दी जा सकती है।     महाराष्ट्र की राजनीति पर भी पड़ेगा असर     सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी महाराष्ट्र के शिवसेना बनाम शिवसेना विवाद के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इस मामले में विधायकों की अयोग्यता और स्पीकर के अधिकार को लेकर लंबे समय से कानूनी लड़ाई चल रही है। अदालत का रुख भविष्य में ऐसे दल-बदल मामलों में न्यायपालिका और विधानसभा अध्यक्ष की संवैधानिक भूमिकाओं की सीमा तय करने में अहम हो सकता है।  

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