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FSSAI का Dabur पर बड़ा एक्शन, ‘100% शुद्ध’ जैसे दावों वाले उत्पादों की बिक्री पर रोक

anjali kumari अगस्त 5, 2026 0
FSSAI Action
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नई दिल्ली, एजेंसियां। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग और प्रचार में किए जा रहे भ्रामक ‘100%’ दावों को लेकर Dabur India Ltd. के खिलाफ सख्त कार्रवाई की है। नियामक ने कंपनी को ऐसे खाद्य उत्पादों की बिक्री रोकने का निर्देश दिया है, जिन पर ‘100% Natural’, ‘100% Pure’, ‘100% Purity Guaranteed’, ‘100% Organic’ और ‘100% Tender Coconut Water’ जैसे दावे किए जा रहे थे।

 

इन उत्पादों पर उठे सवाल

 

FSSAI की कार्रवाई में Dabur के कई खाद्य उत्पादों के लेबलिंग दावों को लेकर आपत्ति जताई गई है। रिपोर्टों के अनुसार इनमें शहद, गाय का घी, एप्पल साइडर विनेगर, वर्जिन नारियल तेल, तिल का तेल, नारियल पानी और नारियल दूध जैसे उत्पाद शामिल हैं।

 

नियामक का कहना है कि ‘100%’ जैसे दावे अस्पष्ट और सत्यापित करना मुश्किल हो सकते हैं तथा इनसे उपभोक्ताओं के बीच उत्पाद की शुद्धता या गुणवत्ता को लेकर गलत धारणा बन सकती है।

 

FSSAI ने क्यों की कार्रवाई

 

FSSAI के अनुसार खाद्य उत्पादों के लेबल और विज्ञापन में किए जाने वाले दावे सत्य, स्पष्ट, सार्थक और गैर-भ्रामक होने चाहिए। ‘100%’ जैसे पूर्ण दावे उपभोक्ताओं को उत्पाद की पूर्ण शुद्धता या श्रेष्ठता का आभास दे सकते हैं। FSSAI पहले भी सभी Food Business Operators को खाद्य लेबल, पैकेजिंग और प्रचार सामग्री में ‘100%’ जैसे दावों से बचने की सलाह दे चुका है।

 

Dabur को बिक्री रोकने का निर्देश

 

ताजा कार्रवाई के तहत Dabur India को ऐसे उत्पादों की बिक्री रोकने और नियामक के निर्देशों के अनुरूप आवश्यक कदम उठाने को कहा गया है। यह कार्रवाई उपभोक्ताओं को भ्रामक लेबलिंग और मार्केटिंग दावों से बचाने के FSSAI के प्रयास का हिस्सा है।

 

FSSAI की कार्रवाई के बाद खाद्य क्षेत्र की अन्य कंपनियों पर भी अपने उत्पादों की पैकेजिंग और विज्ञापन में इस्तेमाल किए जा रहे ‘100%’ जैसे दावों की समीक्षा करने का दबाव बढ़ सकता है।

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Anjali Kumari Anjali123

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ISI समर्थित दो आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़, 9 आरोपी गिरफ्तार

पंजाब के अमृतसर में पुलिस ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से जुड़े दो कथित आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़ करने का दावा किया है। इस कार्रवाई में कुल 9 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें 4 नाबालिग और 5 वयस्क शामिल हैं। पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार आरोपियों में से अधिकांश का संबंध पेट्रोल बम मॉड्यूल से है और इनमें कई नाबालिग भी शामिल हैं। जंतर-मंतर विरोध प्रदर्शन से जुड़ा कनेक्शन अमृतसर पुलिस के मुताबिक, गिरफ्तार किए गए आठ आरोपी दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित एक विरोध प्रदर्शन में भी शामिल हुए थे। जांच में सामने आया है कि वहां उन्हें कथित तौर पर स्थानीय स्तर पर लॉजिस्टिक सपोर्ट उपलब्ध कराया गया, जिसमें पेट्रोल बम बनाने के लिए जरूरी सामग्री भी शामिल थी। पुलिस इस पूरे नेटवर्क और स्थानीय सहयोगियों की भूमिका की भी जांच कर रही है। रेलवे ट्रैक पर कैमरे लगाने की थी साजिश अमृतसर पुलिस आयुक्त गुरप्रीत सिंह भुल्लर ने बताया कि एक मॉड्यूल का काम रेलवे ट्रैक के ऊपर कैमरे लगाकर उसकी लाइव फीड पाकिस्तान भेजना था। शुरुआती जांच के मुताबिक, इन कैमरों के जरिए संवेदनशील गतिविधियों की निगरानी की जानी थी। पुलिस ने समय रहते कार्रवाई करते हुए कैमरे बरामद कर लिए और आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस का कहना है कि कैमरे खरीदने और अन्य खर्चों के लिए हवाला नेटवर्क के जरिए धन उपलब्ध कराया गया था। पेट्रोल बम बनाने और हमला करने की ट्रेनिंग जांच एजेंसियों के अनुसार, दूसरे मॉड्यूल के सदस्यों को ISI हैंडलर्स की ओर से पेट्रोल बम तैयार करने और इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग दी गई थी। उन्हें पुलिस और अन्य सुरक्षा प्रतिष्ठानों की रेकी करने के निर्देश भी दिए गए थे। हालांकि, पुलिस का कहना है कि आरोपी अपने कथित मंसूबों को अंजाम देने से पहले ही पकड़ लिए गए। पाकिस्तान स्थित हैंडलर्स पर शक पुलिस का मानना है कि दोनों मॉड्यूल को पाकिस्तान में बैठे ISI हैंडलर्स संचालित कर रहे थे। शुरुआती जांच में सीमा पार से निर्देश मिलने और स्थानीय नेटवर्क के जरिए सहायता उपलब्ध कराने के संकेत मिले हैं। सुरक्षा एजेंसियां अब इस पूरे नेटवर्क, फंडिंग और संभावित सहयोगियों की विस्तृत जांच कर रही हैं। जांच जारी फिलहाल पुलिस गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ कर रही है। अधिकारियों का कहना है कि मामले की जांच कई पहलुओं पर जारी है, जिसमें जंतर-मंतर कनेक्शन, स्थानीय मदद, हवाला फंडिंग और सीमा पार मौजूद कथित संचालकों की भूमिका शामिल है। पुलिस का दावा है कि समय रहते कार्रवाई कर एक बड़ी साजिश को विफल कर दिया गया।  

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शेख हसीना के कार्यक्रम पर भारत का जवाब, विदेश मंत्रालय बोला- सरकार का कोई संबंध नहीं

Sheikh Hasina Program: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम को ऑनलाइन संबोधित करने को लेकर भारत ने अपना रुख साफ कर दिया है। विदेश मंत्रालय (MEA) ने स्पष्ट किया कि इस कार्यक्रम का भारत सरकार से कोई संबंध नहीं है और यह पूरी तरह एक निजी आयोजन है। विदेश मंत्रालय ने क्या कहा? मंगलवार (4 अगस्त) को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि शेख हसीना जिस कार्यक्रम को संबोधित करने जा रही हैं, उसका आयोजन FCC South Asia नामक एक निजी मीडिया संस्था कर रही है। उन्होंने कहा, "यह भारत सरकार का कार्यक्रम नहीं है। इसका आयोजन एक निजी संस्था कर रही है और सरकार की इसमें कोई भूमिका नहीं है।" बांग्लादेश ने भारत से क्या अपील की थी? भारत की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है जब बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने भारत से अनुरोध किया था कि शेख हसीना और अवामी लीग के नेताओं को भारतीय भूमि से राजनीतिक भाषण देने की अनुमति न दी जाए। अंतरिम सरकार का कहना था कि ऐसे कार्यक्रमों से बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है और दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों पर भी असर पड़ सकता है। दो साल बाद सार्वजनिक संबोधन शेख हसीना अगस्त 2024 में छात्र आंदोलन के बाद सत्ता से हटने के बाद से भारत में रह रही हैं। अब वह करीब दो साल बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से लोगों को संबोधित करेंगी। वह 5 अगस्त 2026 को नई दिल्ली के सर मार्क टली ऑडिटोरियम में आयोजित FCC South Asia के कार्यक्रम में ऑनलाइन शामिल होकर अपना संबोधन देंगी। क्यों अहम है यह कार्यक्रम? शेख हसीना के इस संबोधन पर बांग्लादेश और भारत दोनों की नजरें टिकी हैं। हालांकि भारत ने साफ कर दिया है कि यह निजी कार्यक्रम है और इसे किसी भी तरह से भारत सरकार का आधिकारिक समर्थन या मंजूरी नहीं माना जाना चाहिए।  

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जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने के सात साल पूरे होने पर राजनीतिक चर्चा
अनुच्छेद 370 हटने के सात साल पूरे, जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग फिर तेज

जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के सात साल पूरे, राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग फिर चर्चा में श्रीनगर, एजेंसियां। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधान हटाए जाने के आज सात साल पूरे हो गए हैं। 5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष दर्जे को समाप्त कर दिया था। इसके साथ ही तत्कालीन राज्य को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख नाम के दो केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजित किया गया था।   राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग तेज     सात साल पूरे होने के मौके पर जम्मू-कश्मीर में राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है। क्षेत्रीय राजनीतिक दल लंबे समय से केंद्र सरकार से जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा वापस देने की मांग करते रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव के बाद निर्वाचित सरकार बनने के बावजूद राज्य का दर्जा बहाल नहीं होने का मुद्दा राजनीतिक बहस में बना हुआ है।     5 अगस्त 2019 को हुआ था बड़ा संवैधानिक बदलाव     5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष संवैधानिक प्रावधानों को प्रभावी रूप से समाप्त करने का निर्णय लिया था। इसके बाद जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के तहत राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में बांटा गया। इस फैसले के बाद जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश बना, जहां विधानसभा का प्रावधान है, जबकि लद्दाख को बिना विधानसभा वाला केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया।     सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राज्य का दर्जा महत्वपूर्ण मुद्दा     अनुच्छेद 370 से जुड़े मामले में सुप्रीम Court ने दिसंबर 2023 में केंद्र के फैसले को बरकरार रखा था। अदालत ने जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव कराने और 30 सितंबर 2024 तक चुनाव प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया था। इसके बाद जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव हुए और निर्वाचित सरकार का गठन हुआ। अब राजनीतिक दलों की प्रमुख मांगों में पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करना शामिल है।     केंद्र के फैसले पर राजनीतिक बहस जारी     अनुच्छेद 370 हटाए जाने के सात साल बाद भी इस फैसले को लेकर राजनीतिक मतभेद कायम हैं। केंद्र सरकार इसे जम्मू-कश्मीर को देश की मुख्यधारा में और मजबूती से जोड़ने वाला कदम बताती रही है, जबकि कई क्षेत्रीय दल राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग कर रहे हैं।   ऐसे में 5 अगस्त की तारीख जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक बार फिर महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बनी हुई है।

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