मुंबई, एजेंसियां। मुंबई के प्रसिद्ध सिद्धिविनायक मंदिर ट्रस्ट के दान में कथित गड़बड़ी को लेकर विवाद बढ़ गया है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) प्रमुख राज ठाकरे द्वारा मंदिर के दान से जुड़े गंभीर आरोप लगाए जाने के बाद महाराष्ट्र सरकार ने मामले में रिपोर्ट मांगी है। इस विवाद ने राज्य की राजनीति में भी हलचल बढ़ा दी है।
राज ठाकरे ने आरोप लगाया है कि सिद्धिविनायक मंदिर में हर साल बड़ी मात्रा में चढ़ावा आता है और इसमें से करीब 18 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष गायब होने का दावा किया गया है। हालांकि, यह आंकड़ा फिलहाल आरोप के रूप में सामने आया है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। मंदिर ट्रस्ट की ओर से इन आरोपों पर सफाई भी सामने आई है और दान से जुड़े रिकॉर्ड तथा व्यवस्था को लेकर अपना पक्ष रखा गया है।
विवाद बढ़ने के बाद महाराष्ट्र सरकार ने मामले से संबंधित रिपोर्ट तलब की है। सरकार की ओर से तथ्यों और मंदिर ट्रस्ट के वित्तीय रिकॉर्ड के आधार पर स्थिति स्पष्ट किए जाने की प्रक्रिया शुरू हुई है.
इस बीच भाजपा नेता राम कदम ने राज ठाकरे से उनके आरोपों के समर्थन में ठोस सबूत पेश करने की मांग की है। वहीं शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत ने मामले की जांच की मांग की है।
मामले के बीच मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था और सीसीटीवी निगरानी को लेकर भी सवाल उठे हैं। एक ताजा रिपोर्ट में मंदिर में सीसीटीवी व्यवस्था और दान से जुड़ी गतिविधियों को लेकर कई सवाल सामने आने की बात कही गई है।
फिलहाल दान की रकम में कथित चोरी या गड़बड़ी के आरोप साबित नहीं हुए हैं। सरकारी रिपोर्ट और आगे होने वाली जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और क्या किसी व्यक्ति या संस्था की जिम्मेदारी तय होती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
NEET UG 2026: नीट-यूजी 2026 परीक्षा एक बार फिर विवादों में है। छह अभ्यर्थियों ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) पर OMR शीट की स्कैन कॉपी में उत्तर बदलने का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। सुप्रीम कोर्ट ने काउंसिलिंग शुरू होने से पहले मामले की जल्द सुनवाई पर सहमति जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने जल्द सुनवाई को दी मंजूरी प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने याचिकाकर्ताओं की उस मांग को स्वीकार किया, जिसमें काउंसिलिंग प्रक्रिया शुरू होने से पहले मामले की शीघ्र सुनवाई की अपील की गई थी। क्या है छात्रों का आरोप? याचिकाकर्ता छात्रों का कहना है कि परीक्षा के दौरान उन्होंने OMR शीट में जो उत्तर भरे थे, NTA की वेबसाइट पर अपलोड की गई स्कैन कॉपी में वे उत्तर अलग दिखाई दे रहे हैं। छात्रों के अनुसार: कई प्रश्नों के उत्तर बदले हुए या गलत दर्ज किए गए हैं। इससे उनके वास्तविक अंक प्रभावित हुए हैं। यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ तो उनकी मेरिट रैंक और मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पर असर पड़ सकता है। 600 से अधिक अंक पाने वाले छात्रों का दावा अदालत में छात्रों के वकील ने बताया कि याचिकाकर्ताओं ने परीक्षा में 600 से 650 से अधिक अंक प्राप्त किए हैं। उनका कहना है कि OMR शीट में कथित गड़बड़ी के कारण उन्हें नुकसान हुआ है और मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है। NTA से संपर्क के बावजूद नहीं मिला समाधान याचिका के मुताबिक, छात्रों ने OMR शीट में कथित विसंगतियों को लेकर NTA को कई ईमेल भेजे और कुछ अभ्यर्थी व्यक्तिगत रूप से एजेंसी के कार्यालय भी पहुंचे। हालांकि, उनका आरोप है कि NTA की ओर से कोई संतोषजनक जवाब या समाधान नहीं मिला, जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। पहले भी उठ चुके हैं ऐसे सवाल NEET-UG 2026 में OMR शीट और परिणामों को लेकर इससे पहले भी कई कानूनी विवाद सामने आ चुके हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट, झारखंड हाईकोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट में भी अभ्यर्थियों ने OMR शीट और घोषित अंकों में अंतर का आरोप लगाते हुए याचिकाएं दायर की थीं। पेपर लीक के बाद दोबारा हुई थी परीक्षा गौरतलब है कि NEET-UG 2026 की परीक्षा पहले 3 मई को आयोजित की गई थी। प्रश्नपत्र लीक के आरोपों के बाद परीक्षा रद्द कर दी गई और 21 जून को दोबारा परीक्षा कराई गई। अब OMR शीट में कथित गड़बड़ी को लेकर परीक्षा एक बार फिर विवादों में आ गई है।
संसद में जन्म और मृत्यु पंजीकरण संशोधन विधेयक पारित, देरी से रजिस्ट्रेशन के नियम होंगे सख्त नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद ने जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 को मंजूरी दे दी है। राज्यसभा ने बुधवार को विधेयक पारित किया, जबकि लोकसभा इसे पहले ही 31 जुलाई को पारित कर चुकी थी। विधेयक का उद्देश्य देश में जन्म और मृत्यु के पंजीकरण की प्रक्रिया को मजबूत और अधिक प्रभावी बनाना है। दो साल से अधिक देरी पर न्यायिक मजिस्ट्रेट की मंजूरी संशोधन में जन्म या मृत्यु के पंजीकरण में लंबे समय तक हुई देरी को लेकर नियमों को सख्त किया गया है। दो साल से अधिक देरी होने पर पंजीकरण के लिए अब प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश आवश्यक होगा। मौजूदा व्यवस्था में ऐसी देरी के मामलों में जिला मजिस्ट्रेट, उप-मंडल मजिस्ट्रेट या अधिकृत कार्यकारी मजिस्ट्रेट आदेश जारी कर सकते थे। हर जन्म और मृत्यु के रिकॉर्ड को मजबूत करने पर जोर केंद्र सरकार का कहना है कि संशोधन का उद्देश्य देश में होने वाले हर जन्म और मृत्यु का सही तरीके से पंजीकरण सुनिश्चित करना है। इससे सरकारी रिकॉर्ड को अधिक सटीक बनाने और विभिन्न सरकारी सेवाओं में जन्म-मृत्यु संबंधी दस्तावेजों के इस्तेमाल को बेहतर तरीके से व्यवस्थित करने में मदद मिलेगी। राज्यसभा में बिना चर्चा के पारित हुआ विधेयक राज्यसभा में विधेयक को लेकर विपक्ष के विरोध के बीच इसे पारित किया गया। रिपोर्ट के अनुसार सदन में इस पर विस्तृत चर्चा नहीं हो सकी। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने विधेयक को आगे बढ़ाया। अब विधेयक के कानून बनने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी और उसके बाद अधिसूचना से संबंधित प्रक्रिया पूरी होगी।
ऊना। हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में लगातार हो रही बारिश के बीच बुधवार सुबह बड़ा हादसा टल गया। हरोली उपमंडल की पंडोगा खड्ड में बने कॉजवे को पार करते समय एक कार तेज पानी के बहाव में बह गई। कार में सवार दो युवकों ने समय रहते वाहन से छलांग लगाकर अपनी जान बचा ली। घटना सुबह करीब 5:30 बजे की बताई जा रही है। जानकारी के अनुसार, चंबा जिले के रोहित कुमार अपने साथी के साथ कॉजवे पार कर रहे थे, लेकिन बारिश के कारण खड्ड में जलस्तर बढ़ने और तेज बहाव का सही अंदाजा नहीं लगा सके, जिससे कार बहाव में फंस गई और लगभग 100 मीटर तक बह गई। स्थानीय लोगों ने ट्रैक्टर से निकाली कार, पुलिस ने जारी की चेतावनी घटना की सूचना मिलते ही स्थानीय लोग मौके पर पहुंचे और काफी मशक्कत के बाद ट्रैक्टर की मदद से कार को खड्ड से बाहर निकाला। दोनों युवक सुरक्षित हैं और उन्हें कोई गंभीर चोट नहीं आई। डीएसपी हरोली मोहन रावत ने बताया कि कार चालक से पूछताछ की जा रही है और पूरे मामले की जांच जारी है। उन्होंने लोगों से अपील की कि लगातार बारिश के दौरान उफनते नदी-नालों और पानी से डूबे कॉजवे को पार करने की कोशिश न करें, क्योंकि इससे जान का खतरा बढ़ सकता है।