नई दिल्ली, एजेंसियां। राजनीति के अपराधीकरण से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश की गई ताजा रिपोर्ट में सामने आया है कि लोकसभा के 543 सदस्यों में से 251 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। वहीं, राज्यसभा के 233 सदस्यों में से 75 के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज बताए गए हैं। इस तरह मौजूदा लोकसभा के करीब 46 प्रतिशत सांसद आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता और न्यायमित्र विजय हंसारिया की ओर से दाखिल हलफनामे में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के आंकड़ों का हवाला दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, लोकसभा के 251 सांसदों में से 170 सांसदों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इन अपराधों में दोष सिद्ध होने पर पांच साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है।
राज्यसभा के 75 सांसदों में से 40 के खिलाफ भी गंभीर आपराधिक मामले बताए गए हैं। हालांकि, किसी व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज होना अपने आप में उसे दोषी साबित नहीं करता है और अंतिम निर्णय अदालत की प्रक्रिया के बाद ही होता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा और पूर्व सांसदों तथा विधायकों के खिलाफ देशभर में कुल 4,192 आपराधिक मामले लंबित हैं। न्यायमित्र ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की निगरानी के बावजूद वर्ष 2018 से सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित मामलों की संख्या में अपेक्षित कमी नहीं आई है।
आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में सांसदों और विधायकों से जुड़े 1,243 मामलों का निपटारा हुआ, जबकि इसी अवधि में 1,050 नए मामले दर्ज हुए। इससे लंबित मामलों के तेजी से निपटारे की चुनौती बनी हुई है।
राज्यवार आंकड़ों में केरल सबसे ऊपर नजर आता है। रिपोर्ट के अनुसार, वहां 20 में से 19 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। तेलंगाना में 17 में से 14, ओडिशा में 21 में से 16 और झारखंड में 14 में से 10 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले बताए गए हैं।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 28 राज्यों में से 14 मुख्यमंत्रियों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं। इनमें तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी के खिलाफ सबसे अधिक 89 मामले बताए गए हैं। इसके बाद पश्चिम बंगाल के सुवेंदु अधिकारी के खिलाफ 29 और कर्नाटक के डी.के. शिवकुमार के खिलाफ 19 मामले दर्ज बताए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट में यह रिपोर्ट सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों के जल्द निपटारे से जुड़ी जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान पेश की गई है। रिपोर्ट के आंकड़ों ने देश में राजनीति के अपराधीकरण और जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लंबित मामलों के शीघ्र निपटारे को लेकर एक बार फिर बहस तेज कर दी है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर कांग्रेस और विपक्ष पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि देश में कुछ लोग संवैधानिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ लगातार ऐसा माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे उन्होंने ‘दिमागी नक्सलवाद’ का नाम दिया। ‘दिमागी नक्सल’ को लेकर पिछले कुछ दिनों से सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज है। निशिकांत दुबे ने किसे कहा ‘दिमागी नक्सल’ निशिकांत दुबे ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि कुछ राजनीतिक और वैचारिक समूह लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने वाली सोच को बढ़ावा दे रहे हैं। उनके बयान के बाद ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई है। हालांकि, ‘दिमागी नक्सल’ कोई कानूनी या आधिकारिक श्रेणी नहीं है। यह राजनीतिक बहस में इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है और इसके अर्थ को लेकर भी अलग-अलग राजनीतिक दलों की अलग-अलग व्याख्या सामने आ रही है। कांग्रेस और विपक्ष पर लगातार हमले बीजेपी नेताओं की ओर से यह बयान ऐसे समय आया है जब संसद में सरकार और विपक्ष के बीच कई मुद्दों को लेकर तीखी बहस चल रही है। सत्ता पक्ष विपक्ष पर संसद की कार्यवाही बाधित करने और राजनीतिक मुद्दों को लेकर गलत नैरेटिव फैलाने का आरोप लगा रहा है। वहीं, विपक्ष बीजेपी के इन आरोपों को राजनीतिक हमला बताते हुए सरकार की नीतियों और फैसलों पर सवाल उठा रहा है। इसी राजनीतिक टकराव के बीच ‘दिमागी नक्सल’ का मुद्दा भी चर्चा में आ गया है। बयान पर बढ़ सकता है राजनीतिक विवाद निशिकांत दुबे के बयान के बाद इस मुद्दे पर विपक्ष की ओर से प्रतिक्रिया आने की संभावना है। इससे पहले भी इस शब्द को लेकर नेताओं के बीच तीखी बयानबाजी देखने को मिली है। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी ‘दिमागी नक्सल’ विवाद पर तंज कसते हुए बीजेपी सरकार पर निशाना साधा है। फिलहाल ‘दिमागी नक्सल’ को लेकर राजनीतिक बयानबाजी लगातार तेज हो रही है और आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद के बाहर भी राजनीतिक बहस का विषय बन सकता है।
कोलकाता, एजेंसियां। तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने पश्चिम बंगाल के कृष्णनगर स्थित सर्किट हाउस में देर रात कमरा खाली कराने के मामले को लेकर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया है। उन्होंने नदिया जिले के तीन वरिष्ठ अधिकारियों पर संसदीय प्रोटोकॉल के कथित उल्लंघन और अवमाननापूर्ण व्यवहार का आरोप लगाया है। देर रात सर्किट हाउस खाली करने को कहा महुआ मोइत्रा के अनुसार, वह 14 अगस्त की शाम करीब 6:15 बजे नदिया सर्किट हाउस पहुंची थीं। उन्हें कमरा आवंटित किया गया और शाम को चाय तथा रात में भोजन भी उपलब्ध कराया गया। इसके बाद रात करीब 9:47 बजे अतिरिक्त जिलाधिकारी ने उन्हें फोन कर सर्किट हाउस खाली करने को कहा। कारण पूछने पर कथित तौर पर बताया गया कि यह आदेश ऊपर से आया है। तीन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग मोइत्रा ने अपने नोटिस में नदिया के जिलाधिकारी श्रीकांत पाली, अतिरिक्त जिलाधिकारी नृपेंद्र सिंह और नाजरेथ डिप्टी कलेक्टर अनामिका बेरा के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने मामले को लोकसभा की विशेषाधिकार समिति के पास भेजने का आग्रह किया है। मोइत्रा का आरोप है कि उन्हें देर रात सर्किट हाउस खाली करने के लिए कहा गया, जबकि पहले से उनकी बुकिंग थी। उन्होंने यह भी दावा किया कि उन्हें कोई वैकल्पिक ठहरने की व्यवस्था नहीं दी गई। सांसदों के प्रोटोकॉल का उठाया मुद्दा महुआ मोइत्रा ने अपने नोटिस में सांसदों के लिए निर्धारित सरकारी प्रोटोकॉल का हवाला देते हुए कहा कि अपने निर्वाचन क्षेत्र के दौरे पर आए सांसद को निर्धारित सुविधाएं मिलनी चाहिए। उन्होंने इस घटना को अपने संसदीय दायित्वों के निर्वहन में बाधा और सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया है। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष से मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने और यह सुनिश्चित करने की मांग की है कि भविष्य में उनके निर्वाचन क्षेत्र में दौरे के दौरान उन्हें बिना किसी दबाव या उत्पीड़न के संसदीय जिम्मेदारियां निभाने की सुविधा मिले। माकपा सांसद ने भी जांच की मांग की मामले में माकपा सांसद के. राधाकृष्णन ने भी लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर जांच की मांग की है। उन्होंने कहा कि एक मौजूदा महिला सांसद के साथ इस तरह का व्यवहार गंभीर मामला है और सांसदों की सुरक्षा एवं संसदीय गरिमा से जुड़े प्रोटोकॉल को स्पष्ट किया जाना चाहिए। महुआ मोइत्रा की ओर से दिए गए विशेषाधिकार नोटिस के बाद यह मामला अब संसद के स्तर पर जांच और कार्रवाई की दिशा में आगे बढ़ सकता है। हालांकि, संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से लगाए गए आरोपों पर अंतिम स्थिति अभी स्पष्ट नहीं हुई है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। राजनीति के अपराधीकरण से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश की गई ताजा रिपोर्ट में सामने आया है कि लोकसभा के 543 सदस्यों में से 251 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। वहीं, राज्यसभा के 233 सदस्यों में से 75 के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज बताए गए हैं। इस तरह मौजूदा लोकसभा के करीब 46 प्रतिशत सांसद आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं। 170 लोकसभा सांसदों पर गंभीर आपराधिक मामले सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता और न्यायमित्र विजय हंसारिया की ओर से दाखिल हलफनामे में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के आंकड़ों का हवाला दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, लोकसभा के 251 सांसदों में से 170 सांसदों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इन अपराधों में दोष सिद्ध होने पर पांच साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है। राज्यसभा के 75 सांसदों में से 40 के खिलाफ भी गंभीर आपराधिक मामले बताए गए हैं। हालांकि, किसी व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज होना अपने आप में उसे दोषी साबित नहीं करता है और अंतिम निर्णय अदालत की प्रक्रिया के बाद ही होता है। सांसदों और विधायकों के 4,192 मामले लंबित रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा और पूर्व सांसदों तथा विधायकों के खिलाफ देशभर में कुल 4,192 आपराधिक मामले लंबित हैं। न्यायमित्र ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की निगरानी के बावजूद वर्ष 2018 से सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित मामलों की संख्या में अपेक्षित कमी नहीं आई है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में सांसदों और विधायकों से जुड़े 1,243 मामलों का निपटारा हुआ, जबकि इसी अवधि में 1,050 नए मामले दर्ज हुए। इससे लंबित मामलों के तेजी से निपटारे की चुनौती बनी हुई है। केरल और झारखंड समेत कई राज्यों में स्थिति गंभीर राज्यवार आंकड़ों में केरल सबसे ऊपर नजर आता है। रिपोर्ट के अनुसार, वहां 20 में से 19 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। तेलंगाना में 17 में से 14, ओडिशा में 21 में से 16 और झारखंड में 14 में से 10 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले बताए गए हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 28 राज्यों में से 14 मुख्यमंत्रियों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं। इनमें तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी के खिलाफ सबसे अधिक 89 मामले बताए गए हैं। इसके बाद पश्चिम बंगाल के सुवेंदु अधिकारी के खिलाफ 29 और कर्नाटक के डी.के. शिवकुमार के खिलाफ 19 मामले दर्ज बताए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट में यह रिपोर्ट सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों के जल्द निपटारे से जुड़ी जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान पेश की गई है। रिपोर्ट के आंकड़ों ने देश में राजनीति के अपराधीकरण और जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लंबित मामलों के शीघ्र निपटारे को लेकर एक बार फिर बहस तेज कर दी है।