बिहार : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की वोटिंग खत्म होते ही बिहार की सियासत में हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं। सूत्रों के मुताबिक 3 मई या 6 मई को नए मंत्रियों को शपथ दिलाई जा सकती है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कैबिनेट विस्तार की तारीख भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति पर निर्भर करेगी। पश्चिम बंगाल से मिलने वाले राजनीतिक फीडबैक के आधार पर अंतिम फैसला लिया जा सकता है।
अगर स्थिति अनुकूल रही तो 6 मई को विस्तार संभव है, जबकि किसी भी अनिश्चितता की स्थिति में यह प्रक्रिया 3 मई को पहले ही पूरी की जा सकती है।
बिहार में मुख्यमंत्री समेत अधिकतम 36 मंत्री बनाए जा सकते हैं। हालांकि, सभी पद एक साथ भरे जाने की संभावना कम है। पहले की तरह कुछ सीटें खाली रखी जा सकती हैं, ताकि भविष्य में राजनीतिक संतुलन साधा जा सके।
नई सरकार में भले ही मुख्यमंत्री भाजपा से हों, लेकिन जनता दल यूनाइटेड को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलने की संभावना जताई जा रही है।
पुराने फॉर्मूले के तहत जदयू को संख्या और अहम मंत्रालयों में प्राथमिकता मिल सकती है। चर्चा है कि भाजपा के करीब 14 और जदयू के 15 मंत्री बनाए जा सकते हैं।
पूर्व डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा की वापसी लगभग तय मानी जा रही है। उन्हें कौन सा विभाग मिलेगा, इसे लेकर अभी अटकलें जारी हैं।
राजस्व, भूमि सुधार और पथ निर्माण जैसे बड़े मंत्रालयों पर उनकी दावेदारी मानी जा रही है।
एनडीए के सहयोगी दलों को भी कैबिनेट में प्रतिनिधित्व मिलने की संभावना है।
लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा और राष्ट्रीय लोक मोर्चा को पहले की तरह जगह मिल सकती है।
इन दलों से जुड़े प्रमुख नेता जैसे जीतन राम मांझी, चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा के करीबी चेहरों को मौका मिलने की संभावना जताई जा रही है।
अब बिहार की राजनीति में सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सम्राट चौधरी अपनी पहली कैबिनेट में किन चेहरों को शामिल करते हैं और कौन से अहम विभाग किस दल के हिस्से में जाते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। लोकसभा ने सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 को मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही देश की शीर्ष अदालत में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 34 से बढ़कर 38 हो जाएगी। विधेयक लोकसभा में बिना विस्तृत बहस के पारित हुआ। सुप्रीम कोर्ट में बढ़ेंगे चार जज नए प्रावधान के तहत सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश समेत कुल 38 न्यायाधीश हो सकेंगे। इससे शीर्ष अदालत में लंबित मामलों के बढ़ते बोझ को कम करने और मामलों की सुनवाई में तेजी लाने में मदद मिलने की उम्मीद है। केंद्र सरकार ने इससे पहले मई में जजों की संख्या बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। इसके बाद इस बदलाव को कानूनी रूप देने के लिए संशोधन विधेयक संसद में लाया गया था। लंबित मामलों के बोझ को कम करने पर जोर सुप्रीम कोर्ट में बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं। जजों की संख्या बढ़ने से अधिक पीठों का गठन किया जा सकेगा और मामलों की सुनवाई के लिए न्यायिक क्षमता बढ़ेगी। सरकार का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत करने के साथ-साथ लोगों को समय पर न्याय उपलब्ध कराने की दिशा में कदम उठाना है। लोकसभा में बिना बहस के हुआ पारित विधेयक उस समय पारित हुआ जब सदन में विभिन्न मुद्दों को लेकर विपक्ष का हंगामा जारी था। रिपोर्ट के अनुसार, विधेयक पर विस्तृत चर्चा नहीं हुई और इसे लोकसभा ने मंजूरी दे दी। अब विधेयक को राज्यसभा की मंजूरी और उसके बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति की प्रक्रिया से गुजरना होगा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की नई स्वीकृत संख्या प्रभावी होगी।
दतिया, एजेंसियां। मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस ने जीत दर्ज कर भाजपा को बड़ा झटका दिया है। इस नतीजे को 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की सियासत के लिए अहम माना जा रहा है। कांग्रेस की जीत के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह है, जबकि भाजपा के सामने अपने प्रदर्शन की समीक्षा की चुनौती खड़ी हो गई है। कांग्रेस उम्मीदवार ने दर्ज की जीत दतिया उपचुनाव के नतीजे में कांग्रेस उम्मीदवार ने भाजपा प्रत्याशी को पीछे छोड़ते हुए सीट अपने नाम कर ली। मतगणना के दौरान शुरुआती दौर से ही दोनों प्रमुख दलों के बीच मुकाबला देखने को मिला, लेकिन अंतिम परिणाम कांग्रेस के पक्ष में रहा। इस जीत के साथ कांग्रेस ने दतिया में अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने का संदेश दिया है। पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने जीत को जनता के समर्थन का परिणाम बताया। भाजपा के लिए क्यों अहम है नतीजा दतिया सीट पर भाजपा की हार को 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार है और पार्टी अगले विधानसभा चुनाव में सत्ता बरकरार रखने की तैयारी में जुटी है। ऐसे में उपचुनाव का परिणाम भाजपा के लिए स्थानीय संगठन, उम्मीदवार चयन और चुनावी रणनीति की समीक्षा का कारण बन सकता है। कांग्रेस ने बढ़ाया राजनीतिक आत्मविश्वास उपचुनाव में जीत से कांग्रेस को राज्य में अपने संगठन को मजबूत करने और आगामी चुनावों के लिए कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने में मदद मिल सकती है। पार्टी अब इस परिणाम को प्रदेश की राजनीति में अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए इस्तेमाल कर सकती है। कांग्रेस नेताओं ने मतदाताओं का आभार जताते हुए इसे पार्टी की नीतियों और स्थानीय मुद्दों की जीत बताया है। 2028 के चुनाव पर टिकी नजर दतिया उपचुनाव का परिणाम भले ही एक सीट तक सीमित हो, लेकिन इसके राजनीतिक संदेश को लेकर चर्चा तेज हो गई है। 2028 में होने वाले मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला रहने की संभावना है। अब दोनों दल इस नतीजे से मिले संकेतों के आधार पर अपनी रणनीति तैयार करेंगे। भाजपा के लिए चुनौती जहां संगठन को और मजबूत करने की होगी, वहीं कांग्रेस इस जीत की लय को प्रदेश के दूसरे क्षेत्रों तक पहुंचाने की कोशिश करेगी।
चेन्नई, एजेंसियां। तमिलनाडु में कावेरी जल विवाद को लेकर आयोजित एक रैली के दौरान डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन की अभिनेत्री तृषा को लेकर की गई कथित टिप्पणी पर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद विपक्षी दलों तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने डीएमके पर तीखा हमला बोला है और टिप्पणी को अनुचित बताते हुए कार्रवाई की मांग की है। रैली के दौरान हुई विवादित टिप्पणी तंजावुर में कावेरी जल विवाद पर आयोजित रैली में उदयनिधि स्टालिन मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की आलोचना कर रहे थे। इसी दौरान भीड़ से अभिनेत्री तृषा के नाम के नारे लगाए गए। वायरल वीडियो के अनुसार, उदयनिधि ने इस पर मुस्कुराते हुए एक टिप्पणी की, जिसे सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री विजय और अभिनेत्री तृषा को लेकर चल रही चर्चाओं से जोड़कर देखा गया। हालांकि, बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका इशारा केवल कावेरी के पानी की ओर था। TVK ने जताई कड़ी आपत्ति TVK विधायक रेवंत चरण ने उदयनिधि की टिप्पणी को आपत्तिजनक और अस्वीकार्य बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि डीएमके राजनीतिक संवाद का स्तर गिरा रही है और ध्यान भटकाने के लिए उकसावे वाली राजनीति कर रही है। रेवंत चरण का कहना है कि कावेरी मुद्दे पर आयोजित प्रदर्शन को अपेक्षित जनसमर्थन नहीं मिला, इसलिए विवादित बयान देकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जा रही है। BJP ने गिरफ्तारी की मांग की तमिलनाडु भाजपा ने भी इस बयान की कड़ी आलोचना की है। पार्टी के प्रवक्ता नारायणन तिरुपति ने टिप्पणी को अशोभनीय और अभद्र बताते हुए उदयनिधि स्टालिन की गिरफ्तारी की मांग की। उन्होंने डीएमके नेतृत्व और पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की चुप्पी पर भी सवाल उठाए। कावेरी विवाद के बीच बढ़ा राजनीतिक तनाव यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब तमिलनाडु सरकार ने कावेरी जल विवाद को लेकर कर्नाटक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। राज्य सरकार का आरोप है कि कर्नाटक, कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) के निर्देशों के बावजूद तमिलनाडु के हिस्से का निर्धारित पानी नहीं छोड़ रहा है। तमिलनाडु सरकार ने अपनी याचिका में कहा है कि कई बार निर्देश दिए जाने के बावजूद कर्नाटक ने तय मात्रा में पानी जारी नहीं किया, जिससे राज्य के किसानों और सिंचाई व्यवस्था पर असर पड़ रहा है। सोशल मीडिया पर जारी बहस उदयनिधि स्टालिन की कथित टिप्पणी का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इसे लेकर राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है, जबकि डीएमके की ओर से अब तक इस विवाद पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।