नई दिल्ली: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर दुनिया के सबसे प्रभावशाली खुफिया गठबंधनों में से एक Five Eyes intelligence alliance ने गंभीर चेतावनी जारी की है। गठबंधन का कहना है कि AI की अगली पीढ़ी के मॉडल आने वाले कुछ ही महीनों में वैश्विक साइबर सुरक्षा परिदृश्य को पूरी तरह बदल सकते हैं। इससे साइबर हमलों की रफ्तार, दायरा और जटिलता कई गुना बढ़ सकती है।
फाइव आइज की निगरानी संस्था FIORC (Five Eyes Intelligence Oversight and Review Council) ने सरकारों, व्यवसायों और कॉर्पोरेट नेतृत्व से अपील की है कि वे साइबर सुरक्षा और साइबर रेजिलिएंस (Cyber Resilience) को तत्काल प्राथमिकता दें।
संयुक्त बयान में कहा गया है कि "फ्रंटियर AI सिस्टम" मौजूदा उद्योग की अपेक्षाओं से कहीं अधिक शक्तिशाली साबित हो सकते हैं और साइबर हमलों तथा उनके बचाव दोनों में बुनियादी बदलाव ला सकते हैं। यह बदलाव वर्षों में नहीं, बल्कि कुछ महीनों में देखने को मिल सकता है।
गठबंधन के अनुसार, AI किसी डिजिटल कमजोरी की पहचान होने और साइबर अपराधियों द्वारा उसका फायदा उठाने के बीच के समय को तेजी से कम कर रहा है, जिससे साइबर खतरों का जोखिम बढ़ रहा है।
यह बयान उस समय आया है, जब अमेरिका ने Anthropic द्वारा विकसित कुछ उन्नत AI सिस्टम तक विदेशी नागरिकों की पहुंच सीमित करने का फैसला किया है। यह कदम अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों की सलाह पर उठाया गया है।
फाइव आइज ने अपने बयान में किसी विशेष कंपनी या AI मॉडल का नाम नहीं लिया, लेकिन उसने स्पष्ट संकेत दिया कि अत्याधुनिक AI मॉडल वैश्विक साइबर सुरक्षा के लिए नई चुनौतियां पैदा कर सकते हैं।
फाइव आइज ने यह भी स्वीकार किया कि AI साइबर सुरक्षा को मजबूत करने के लिए शक्तिशाली उपकरण भी उपलब्ध करा सकता है। संगठन का कहना है कि यदि AI का उपयोग रणनीतिक और जिम्मेदारीपूर्ण तरीके से किया जाए तो यह साइबर हमलों की पहचान, निगरानी और प्रतिक्रिया को पहले से अधिक प्रभावी बना सकता है।
गठबंधन ने कंपनियों के बोर्ड और वरिष्ठ अधिकारियों से कहा है कि वे:
बयान में कहा गया, "AI भविष्य की तकनीक नहीं है, यह पहले से मौजूद है। फ्रंटियर AI के तेजी से विकास का अर्थ है कि साइबर जोखिमों को लेकर हमारी धारणाएं वर्षों नहीं, बल्कि महीनों में पुरानी पड़ सकती हैं।"
फाइव आइज ने चेतावनी दी कि दुनिया को बदलते साइबर खतरों का सामना करने के लिए अभी से तैयार होना होगा, क्योंकि AI आने वाले समय में वैश्विक डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह नया रूप देने जा रहा है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
वॉशिंगटन: अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को बड़ा कानूनी झटका लगा है। एक संघीय अदालत ने उस विवादित डेटाबेस को समाप्त करने का आदेश दिया है, जिसमें लाखों अमेरिकी नागरिकों की संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी एकत्र की गई थी। अदालत ने इसे गैर-कानूनी बताते हुए कहा कि इससे नागरिकों की निजता और मतदान के अधिकार दोनों को खतरा पैदा हुआ है। अमेरिकी जिला जज स्पार्कल सूकनानन ने अपने फैसले में कहा कि संघीय सरकार ने जानबूझकर अमेरिकी नागरिकों के गोपनीयता अधिकारों का उल्लंघन किया है। उन्होंने कहा कि जब वोट देने जैसे बुनियादी अधिकार खतरे में हों, तब अदालत मूकदर्शक नहीं रह सकती। राज्यों द्वारा वोटर लिस्ट से नाम हटाने का आरोप अदालत ने कहा कि कई राज्यों ने इस डेटाबेस का इस्तेमाल योग्य अमेरिकी नागरिकों को वोटर सूची से हटाने के लिए किया। जज के अनुसार, सरकार ने नागरिकता संबंधी ऐसे डेटा का उपयोग किया, जिसकी विश्वसनीयता पर पहले से सवाल मौजूद थे। फैसले में कहा गया कि यह मामला दो बुनियादी संवैधानिक अधिकारों—निजता के अधिकार और मतदान के अधिकार—से जुड़ा है और दोनों की रक्षा करना न्यायपालिका की जिम्मेदारी है। क्या है विवादित डेटाबेस? यह मामला 'सिस्टेमैटिक एलियन वेरिफिकेशन फॉर एंटाइटलमेंट्स' (SAVE) प्रणाली से जुड़ा है, जिसे अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) संचालित करता है। इसका उपयोग नागरिकता और आव्रजन स्थिति की पुष्टि के लिए किया जाता है। सितंबर 2025 में मतदान अधिकार और गोपनीयता से जुड़े कई संगठनों, जिनका नेतृत्व 'लीग ऑफ वूमेन वोटर्स' कर रहा था, ने इस प्रणाली में किए गए बदलावों को चुनौती देते हुए अदालत में मुकदमा दायर किया था। ट्रंप के कार्यकारी आदेश से बढ़ा विवाद मार्च 2025 में राष्ट्रपति ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत संघीय चुनावों में वोटर पंजीकरण के लिए नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण देना अनिवार्य किया गया था। आदेश में संघीय एजेंसियों को राज्यों के लिए नागरिकता सत्यापन प्रणाली विकसित करने का निर्देश दिया गया था। ट्रंप प्रशासन का तर्क था कि अमेरिकी चुनाव प्रणाली में नागरिकता सत्यापन के नियम पर्याप्त रूप से लागू नहीं किए जा रहे हैं। लीग ऑफ वूमेन वोटर्स की प्रतिक्रिया फैसले का स्वागत करते हुए 'लीग ऑफ वूमेन वोटर्स' ने कहा कि अदालत ने सरकार की चुनावी प्रक्रिया में गैर-कानूनी हस्तक्षेप की कोशिश को विफल कर दिया है। संगठन के अनुसार, यह डेटाबेस लाखों अमेरिकियों की संवेदनशील जानकारी को एक जगह इकट्ठा कर रहा था, जिससे वे अनुचित जांच और गैर-कानूनी तरीके से वोटर सूची से हटाए जाने के जोखिम का सामना कर सकते थे। यह फैसला अमेरिका में चुनावी पारदर्शिता, मतदाता अधिकारों और नागरिकों की गोपनीयता को लेकर चल रही बहस को और तेज कर सकता है।
वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि तेहरान अमेरिका के साथ हुए अंतरिम समझौते का पालन नहीं करता है, तो वाशिंगटन सख्त कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर ईरान का रवैया ठीक नहीं रहा, तो वह वही करेंगे जो आवश्यक होगा। पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा, "अगर ईरान अपने समझौते पर खरा नहीं उतरता या उसका व्यवहार सही नहीं रहता है, तो मुझे जो करना पड़ेगा, मैं वह करूंगा।" उनके इस बयान को ईरान के लिए सीधी चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है। अमेरिका-ईरान अंतरिम समझौते के बाद ट्रंप का सख्त संदेश गौरतलब है कि पिछले सप्ताह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian के बीच एक अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब कुछ महीने पहले अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर सैन्य कार्रवाई तथा उसके जवाब में ईरान के हमलों ने पूरे पश्चिम एशिया को युद्ध की स्थिति में पहुंचा दिया था। समझौते के बावजूद ट्रंप का यह बयान संकेत देता है कि वाशिंगटन ईरान के हर कदम पर कड़ी निगरानी रखेगा और किसी भी उल्लंघन पर कठोर प्रतिक्रिया देने के लिए तैयार है। अमेरिकी किसानों को मिलेगा फायदा ट्रंप ने कहा कि ईरान की जो धनराशि पहले से रोकी गई थी, उसका इस्तेमाल केवल अमेरिका से खाद्य उत्पाद खरीदने के लिए किया जाएगा। उन्होंने दावा किया कि इस व्यवस्था से अमेरिकी किसानों को सीधा आर्थिक लाभ मिलेगा। ट्रंप ने कहा, "वह सारा पैसा भोजन की खरीद के रूप में वापस अमेरिका आ रहा है। ईरान की आबादी 9.1 करोड़ है और वे अपने लोगों का पेट भरने में सक्षम नहीं हैं। इसलिए जो पैसा जारी किया जा रहा है, वह सीधे हमारे किसानों के पास जाएगा।" युद्ध के बाद गहरा मानवीय और आर्थिक संकट ईरान, इजरायल और लेबनान में जारी संघर्ष ने पश्चिम एशिया में भारी मानवीय संकट पैदा कर दिया है। युद्ध और सैन्य कार्रवाइयों के कारण हजारों लोगों की जान जा चुकी है, जबकि लाखों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं। इस संघर्ष का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल, शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बढ़ती चिंताओं ने दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। समझौते के भविष्य पर टिकी दुनिया की नजर विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका-ईरान अंतरिम समझौते की सफलता काफी हद तक दोनों देशों की प्रतिबद्धता पर निर्भर करेगी। यदि समझौते की शर्तों का पालन नहीं हुआ, तो पश्चिम एशिया में एक बार फिर तनाव बढ़ सकता है, जिसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ने की आशंका है।
दोहा: कतर के प्रमुख गैस निर्यात केंद्र रास लाफान इंडस्ट्रियल सिटी में सोमवार (22 जून) को हुए भीषण विस्फोट में भारतीय नागरिकों समेत कम से कम 13 लोगों की मौत हो गई, जबकि 66 लोग घायल हो गए। हादसे की पुष्टि कतर के ऊर्जा मंत्री साद शेरिदा अल-काबी ने की है। इस घटना ने न केवल कतर के ऊर्जा क्षेत्र को झटका दिया है, बल्कि वैश्विक गैस आपूर्ति को लेकर भी नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। दोहा में मीडिया को संबोधित करते हुए ऊर्जा मंत्री साद शेरिदा अल-काबी ने बताया कि रास लाफान औद्योगिक क्षेत्र स्थित गैस निर्यात टर्मिनल में हुए विस्फोट की प्रारंभिक जांच से यह एक औद्योगिक दुर्घटना प्रतीत होती है।हादसे के कारणों का पता लगाने के लिए विस्तृत जांच शुरू कर दी गई है। भारतीय दूतावास ने जताया शोक, सहायता का आश्वासन दोहा स्थित भारतीय दूतावास ने घटना पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि वह कतर सरकार और स्थानीय प्रशासन के लगातार संपर्क में है। दूतावास ने मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना प्रकट करते हुए कहा कि प्रभावित भारतीय नागरिकों और उनके परिवारों को हरसंभव सहायता प्रदान की जाएगी। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, घायलों में भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, तंजानिया, गिनी, केन्या, नाइजीरिया और कतर सहित कई देशों के नागरिक शामिल हैं। कतर के ऊर्जा क्षेत्र का सबसे अहम केंद्र है रास लाफान रास लाफान इंडस्ट्रियल सिटी कतर के प्राकृतिक गैस उत्पादन, प्रसंस्करण और निर्यात का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। यहां दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी (LNG) निर्यात टर्मिनलों में से एक संचालित होता है। इस क्षेत्र में हुई किसी भी बड़ी दुर्घटना का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ना स्वाभाविक माना जाता है। धमाके के बाद पूरे संयंत्र में आग लग गई, जिसके कारण राहत और बचाव कार्य में काफी मुश्किलें आईं। गैस निर्यात दोबारा शुरू करने की तैयारी के दौरान हुआ हादसा रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान और होर्मुज स्ट्रेट से जुड़े क्षेत्रीय तनाव के कारण कतर पिछले कुछ समय से अपने कई ग्राहकों को गैस की आपूर्ति नहीं कर पा रहा था। इसके चलते देश ने अस्थायी रूप से गैस उत्पादन भी सीमित कर दिया था। हाल ही में क्षेत्रीय तनाव में कमी आने के बाद सरकारी कंपनी कतरएनर्जी ने अपने निर्यात टर्मिनलों को दोबारा चालू करने की प्रक्रिया शुरू की थी। इसी दौरान बरजान गैस आपूर्ति संयंत्र में अचानक विस्फोट हुआ और भीषण आग लग गई। क्या बढ़ सकती है गैस की किल्लत? ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रास लाफान टर्मिनल लंबे समय तक प्रभावित रहता है, तो वैश्विक एलएनजी बाजार में आपूर्ति संबंधी दबाव बढ़ सकता है। एशियाई देशों, विशेषकर भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े आयातकों पर इसका असर पड़ने की आशंका है। कतर सरकार ने फिलहाल गैस आपूर्ति पर बड़े असर से इनकार किया है और कहा है कि स्थिति को सामान्य बनाने के लिए तेजी से कदम उठाए जा रहे हैं।