रांची: JPSC-JSSC परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर रांची में जारी छात्र आंदोलन को अब बॉलीवुड अभिनेत्री और अधिवक्ता कुनिका सदानंद का भी समर्थन मिला है. कुनिका सदानंद आंदोलन स्थल पर पहुंचीं और छात्रों से मुलाकात कर उनकी मांगों को सुना. उन्होंने छात्रों की मांगों को जायज बताते हुए सरकार से संवेदनशीलता के साथ बातचीत कर समाधान निकालने की अपील की.
कुनिका सदानंद ने कहा कि नौकरी और शिक्षा से जुड़े मुद्दे युवाओं के भविष्य से सीधे जुड़े हैं. ऐसे में सरकार को छात्रों की बात गंभीरता से सुननी चाहिए और बातचीत के जरिये गतिरोध खत्म करने की कोशिश करनी चाहिए.
कुनिका सदानंद ने कहा कि उन्हें लगता है कि झारखंड सरकार इस मामले में केंद्र सरकार की तुलना में अधिक संवेदनशील तरीके से पहल कर सकती है. उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार छात्रों की मांगों पर विचार करने के लिए 10 से 15 दिन का समय ले और इस दौरान ठोस समाधान निकालने की कोशिश करे.
उन्होंने कहा कि आंदोलन को लगातार लंबा खींचने के बजाय सरकार और छात्रों के बीच संवाद होना चाहिए, ताकि किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके. उनके अनुसार, छात्रों की समस्याओं का समाधान बातचीत और सकारात्मक पहल से ही संभव है.
छात्रों की ओर से की जा रही जांच की मांग के सवाल पर कुनिका सदानंद ने CID की भूमिका और जवाबदेही को लेकर भी सवाल उठाये. उन्होंने कहा कि यदि किसी मामले में गिरफ्तारियां हुई हैं, तो जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली की भी समीक्षा होनी चाहिए.
उन्होंने छात्रों की ओर से सीबीआई जांच की मांग का भी जिक्र किया. हालांकि उन्होंने आशंका जतायी कि जांच एजेंसी बदलने से प्रक्रिया और लंबी हो सकती है. उनका कहना था कि सबसे जरूरी बात यह है कि जांच निष्पक्ष और प्रभावी तरीके से आगे बढ़े तथा मामले का समाधान जल्द हो.
कुनिका सदानंद ने बताया कि वह काफी समय से मुंबई से झारखंड में चल रहे छात्र आंदोलन को फॉलो कर रही थीं. झारखंड आने के बाद उन्होंने खुद आंदोलन स्थल पर पहुंचकर छात्रों से मिलने का फैसला किया.
उन्होंने बताया कि जिन लोगों ने झारखंड में उनकी मेहमाननवाजी की, उनसे भी उन्होंने कहा कि वह छात्रों के प्रदर्शन में जरूर जाना चाहती हैं. इसके बाद वह आंदोलन स्थल पहुंचीं और आंदोलनरत छात्रों के साथ बातचीत की.
कुनिका सदानंद ने दिल्ली के जंतर-मंतर और झारखंड में चल रहे छात्र आंदोलन के बीच अंतर का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि दिल्ली देश की राजधानी है, इसलिए वहां होने वाले आंदोलनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने की संभावना रहती है.
वहीं झारखंड के आंदोलन में बाहर से लोगों की संख्या कम दिखाई दे सकती है, लेकिन स्थानीय स्तर पर छात्रों और युवाओं का समर्थन काफी महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा कि झारखंड में रोजगार और परीक्षा व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवाल अचानक पैदा नहीं हुए हैं, बल्कि इनके पीछे लंबे समय की पृष्ठभूमि है.
अभिनेत्री ने झारखंड गठन के बाद रोजगार और शिक्षा से जुड़े सवालों का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि राज्य के गठन के पीछे स्थानीय लोगों और आदिवासी समुदाय के अधिकारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.
उनके अनुसार, राज्य बनने के बाद भी रोजगार और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई सवाल पूरी तरह हल नहीं हो सके हैं. उन्होंने कहा कि इन समस्याओं की पूरी जिम्मेदारी केवल मौजूदा सरकार पर डालना उचित नहीं होगा, क्योंकि अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में भी ये मुद्दे बने रहे हैं.
कुनिका सदानंद ने सरकारी नौकरियों में बड़ी संख्या में पदों को एक साथ निकालने की व्यवस्था पर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि उनकी राय में सरकार को नियमित अंतराल पर रिक्तियों की जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए और लगातार नियुक्ति प्रक्रिया चलानी चाहिए.
उन्होंने सुझाव दिया कि हर साल या नियमित रूप से उपलब्ध पदों की स्पष्ट जानकारी सामने आनी चाहिए, ताकि अभ्यर्थियों को लंबे समय तक इंतजार न करना पड़े और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे.
रद्द हुई परीक्षाओं में शामिल अभ्यर्थियों के भविष्य को लेकर भी उन्होंने चिंता जतायी. कुनिका सदानंद ने कहा कि जिन अभ्यर्थियों की कोई गलती नहीं थी, लेकिन परीक्षा रद्द होने के कारण उन्हें दोबारा परीक्षा प्रक्रिया में शामिल होना पड़ रहा है, उन्हें उम्र सीमा में उचित छूट दी जानी चाहिए.
उन्होंने कहा कि व्यवस्था की गलती का खामियाजा उन छात्रों को नहीं भुगतना चाहिए, जिन्होंने अपनी तैयारी और समय परीक्षा के लिए लगाया था.
कुनिका सदानंद ने कहा कि उनके पास जितनी भी पहचान और सामाजिक अनुभव है, उसका इस्तेमाल वह छात्रों की आवाज को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए करना चाहती हैं. उन्होंने सोशल मीडिया को भी आंदोलन से जुड़े मुद्दों और छात्रों की मांगों को लोगों तक पहुंचाने का प्रभावी माध्यम बताया.
उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य यह देखना है कि छात्रों की समस्याएं ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचें और सरकार तक भी उनकी बात मजबूती से पहुंचे. साथ ही उन्होंने कहा कि आंदोलन में कौन बॉलीवुड से आया और कौन नहीं आया, इस पर चर्चा करने के बजाय छात्रों के मुद्दों और उनके समाधान पर ध्यान दिया जाना चाहिए.
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
जमशेदपुर। लौहनगरी जमशेदपुर में दुर्गा पूजा की तैयारियां तेज हो गई हैं। न्यू सिदगोड़ा दुर्गा एवं काली पूजा समिति इस बार श्रद्धालुओं के लिए खास आकर्षण तैयार कर रही है। समिति करीब 17 लाख रुपये की लागत से काशी विश्वनाथ मंदिर की तर्ज पर भव्य पूजा पंडाल बनवा रही है। वैदिक मंत्रोच्चार के साथ शुरू हुआ निर्माण सोमवार को विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पंडाल निर्माण की शुरुआत की गई। पारंपरिक तरीके से बांस गाड़कर निर्माण कार्य शुरू किया गया। समिति के पदाधिकारी और सदस्य इस दौरान मौजूद रहे। बंगाल के कारीगर देंगे पंडाल को भव्य रूप पंडाल को आकर्षक और कलात्मक स्वरूप देने के लिए पश्चिम बंगाल के अनुभवी कारीगरों की टीम बुलाई गई है। कारीगर काशी विश्वनाथ मंदिर की स्थापत्य कला और भव्यता को पंडाल के स्वरूप में उतारने में जुटे हैं। समिति के मुख्य संरक्षक चंद्रगुप्त सिंह के अनुसार, पंडाल निर्माण में करीब 17 लाख रुपये खर्च होंगे। पंडाल के साथ विशेष विद्युत सज्जा और आंतरिक सजावट भी की जाएगी। 1953 से जारी है दुर्गा पूजा की परंपरा न्यू सिदगोड़ा दुर्गा एवं काली पूजा समिति वर्ष 1953 से लगातार दुर्गा पूजा का आयोजन करती आ रही है। सात दशक से अधिक पुरानी इस परंपरा के तहत समिति हर साल अलग और आकर्षक थीम के जरिए श्रद्धालुओं को नया अनुभव देने का प्रयास करती है। इस बार क्या होगा खास? काशी विश्वनाथ मंदिर की तर्ज पर बनेगा पंडाल करीब 17 लाख रुपये होंगे खर्च बंगाल के कुशल कारीगर करेंगे निर्माण खास विद्युत और आंतरिक सजावट होगी 1953 से लगातार हो रहा है पूजा का आयोजन काशी विश्वनाथ मंदिर की थीम के कारण इस बार सिदगोड़ा का दुर्गा पूजा पंडाल जमशेदपुर में खास आकर्षण का केंद्र बनने की उम्मीद है।
रांची। झारखंड में JPSC-JSSC समेत प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ी मांगों को लेकर जारी छात्र आंदोलन के बीच सरकार और छात्रों के बीच चौथे दौर की वार्ता शुरू हो गई है। सोमवार को 10 सदस्यीय छात्र डेलिगेशन सरकार से बातचीत के लिए स्टेट गेस्ट हाउस पहुंचा। दोनों पक्षों के बीच लंबित मांगों पर सहमति बनाने की कोशिश की जा रही है। सरकार की ओर से चार मंत्री बातचीत में शामिल छात्रों से बातचीत के लिए सरकार की ओर से मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू, दीपिका पांडेय सिंह, संजय प्रसाद यादव और चमरा लिंडा शामिल हैं। छात्रों की ओर से 10 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल वार्ता में अपनी मांगें रख रहा है। तीन दौर की बातचीत में नहीं बनी सहमति सरकार और छात्रों के बीच इससे पहले तीन दौर की वार्ता हो चुकी है। हालांकि, कई प्रमुख मांगों पर अब तक सहमति नहीं बन पाई है। छात्रों की ओर से मुख्यमंत्री आवास घेराव के ऐलान के बाद सरकार ने एक बार फिर बातचीत की पहल की है। अब चौथे दौर की बैठक को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उम्मीद है कि सरकार की ओर से छात्रों की लंबित मांगों को लेकर कोई ठोस प्रस्ताव रखा जा सकता है। JPSC-JSSC परीक्षा और CBI जांच समेत कई मांगें छात्रों की प्रमुख मांगों में JPSC और JSSC की प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की जांच, संबंधित परीक्षा को रद्द करने, CBI जांच और भर्ती प्रक्रिया में सुधार जैसे मुद्दे शामिल हैं। छात्र लगातार परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता की मांग कर रहे हैं। वहीं सरकार की ओर से गठित मंत्रियों की कमेटी पहले भी छात्र प्रतिनिधियों से बातचीत कर चुकी है। बैठक के बाद तय होगी आंदोलन की आगे की रणनीति चौथे दौर की वार्ता में अगर किसी अहम मुद्दे पर सहमति बनती है तो आंदोलन को लेकर आगे की रणनीति बदल सकती है। वहीं बातचीत बेनतीजा रहने की स्थिति में छात्र अपने आंदोलन को आगे बढ़ाने का फैसला कर सकते हैं। बैठक के नतीजे पर अब छात्र संगठनों और सरकार दोनों की नजर है। ये 10 छात्र वार्ता में शामिल छात्रों के 10 सदस्यीय डेलिगेशन में: रविंद्र पासवान पीयूष कुमार सिंह रविंद्र कुमार रवि कार्तिक सोरेन राजेश प्रसाद उमेश प्रसाद शशांक कुमार अंकित कुमार आनंद कुमार शालू कुमारी वार्ता के बाद यह स्पष्ट होगा कि सरकार और छात्रों के बीच गतिरोध टूटता है या आंदोलन आगे भी जारी रहेगा।
जमशेदपुर: टाटा मोटर्स जमशेदपुर ने अपने कर्मचारियों के लिए स्वतंत्रता दिवस पर पर्यावरण-अनुकूल परिवहन सुविधा की शुरुआत की है. अब कंपनी के कर्मचारी सामान्य बसों के बजाय आधुनिक इलेक्ट्रिक एसी बसों से ड्यूटी आना-जाना करेंगे. पहले चरण में सात ईवी एसी बसों का परिचालन शुरू किया गया है. टेल्को स्थित सुभंत मूलगांवकर स्टेडियम से टाटा मोटर्स जमशेदपुर के प्लांट हेड अनुराग छारिया और महामंत्री आरके सिंह ने संयुक्त रूप से सात इलेक्ट्रिक एसी बसों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया. इस दौरान टाटा मोटर्स वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष शशि भूषण प्रसाद समेत कंपनी और यूनियन के कई वरिष्ठ पदाधिकारी मौजूद रहे. बसों को रवाना करने के बाद अधिकारियों और यूनियन प्रतिनिधियों ने खुद बस में सफर कर कर्मचारियों के लिए उपलब्ध करायी गयी नई सुविधा का जायजा लिया. गर्मी और उमस से मिलेगी राहत नई इलेक्ट्रिक एसी बसों के शुरू होने से कर्मचारियों को ड्यूटी आने-जाने के दौरान गर्मी और उमस से राहत मिलेगी. वातानुकूलित होने के कारण सफर अधिक आरामदायक होगा. वहीं इलेक्ट्रिक बसें शून्य टेलपाइप उत्सर्जन के साथ चलती हैं, जिससे पारंपरिक ईंधन से चलने वाली बसों की तुलना में स्थानीय वायु प्रदूषण कम करने में मदद मिलेगी. कंपनी की इस पहल को ग्रीन ट्रांसपोर्टेशन की दिशा में एक कदम माना जा रहा है. इससे कर्मचारियों को सुरक्षित और आरामदायक परिवहन सुविधा मिलने के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा. सामान्य बसों की जगह लेगी ईवी बसें अब तक टाटा मोटर्स के कर्मचारी ड्यूटी आने-जाने के लिए सेंट्रल ट्रांसपोर्ट की सामान्य बसों का इस्तेमाल करते थे. नई व्यवस्था के तहत धीरे-धीरे इन बसों की जगह आधुनिक इलेक्ट्रिक एसी बसों को शामिल किया जा रहा है. पहले चरण में सात बसों को परिचालन में लाया गया है. इन बसों को फिलहाल ऐसे रूटों पर चलाया जाएगा, जहां कर्मचारियों की आवाजाही अधिक रहती है. टेल्को कॉलोनी के रूट से होगी शुरुआत पहले चरण में इलेक्ट्रिक एसी बसों का संचालन मुख्य रूप से टेल्को कॉलोनी के विभिन्न सेक्टरों और आंतरिक मार्गों पर किया जाएगा. इससे इन क्षेत्रों में रहने वाले टाटा मोटर्स कर्मचारियों को नई परिवहन सुविधा का सीधा लाभ मिलेगा. कंपनी की योजना केवल सात बसों तक सीमित नहीं है. आने वाले समय में कर्मचारियों की जरूरत और रूट के अनुसार इन बसों की संख्या बढ़ाने की तैयारी है. शहर के अन्य प्रमुख रूटों पर भी होगा विस्तार प्रबंधन की ओर से इलेक्ट्रिक बस सेवा का विस्तार चरणबद्ध तरीके से शहर के अन्य प्रमुख मार्गों तक करने की योजना है. इससे अधिक संख्या में कर्मचारियों को ईवी बसों की सुविधा मिल सकेगी. टाटा मोटर्स की यह पहल कर्मचारियों के दैनिक सफर को सुविधाजनक बनाने के साथ-साथ कंपनी के ग्रीन और पर्यावरण-अनुकूल परिवहन को बढ़ावा देने के प्रयासों का हिस्सा है. आने वाले समय में इलेक्ट्रिक बसों का नेटवर्क बढ़ने से जमशेदपुर में कंपनी के कर्मचारी परिवहन में ईवी की हिस्सेदारी और बढ़ सकती है.