राजनीति

Sayoni Ghosh’s New Look Fuels Political Buzz in Bengal

सायोनी घोष का बदला लुक, छोड़ी 'ममता बनर्जी की स्टाइल'; जींस, स्नीकर्स और न्यू हेयरकट के पीछे क्या है सियासी संदेश?

Deepshikha जून 15, 2026 0
TMC MP Sayoni Ghosh seen in a modern casual outfit amid political discussions over her changing public image.
Sayoni Ghosh New Look Sparks Political Buzz in West Bengal

 

कोलकाता: तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में जारी अंदरूनी घमासान के बीच जादवपुर की फायरब्रांड सांसद सायोनी घोष का नया अवतार चर्चा का विषय बन गया है। कभी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तरह सफेद सूती साड़ी, बड़ी बिंदी और सादगी भरे अंदाज में नजर आने वाली सायोनी अब जींस-टीशर्ट, कैजुअल कुर्तियों, मॉडर्न हेयरस्टाइल और स्नीकर्स में दिखाई दे रही हैं।

दिल्ली से लेकर कोलकाता तक राजनीतिक गलियारों में उनके इस बदलाव को लेकर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल फैशन में बदलाव नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक संदेश का संकेत हो सकता है।

साड़ी से स्नीकर्स तक, क्यों बदला सायोनी का अंदाज?

हाल के दिनों में सायोनी घोष कई सार्वजनिक कार्यक्रमों और राजनीतिक दौरों के दौरान अपने नए लुक में नजर आई हैं। उन्होंने पारंपरिक सफेद साड़ी और हवाई चप्पलों की जगह आधुनिक परिधान और स्नीकर्स को अपनाया है।

उनका यह बदलाव ऐसे समय सामने आया है, जब टीएमसी के भीतर नेतृत्व, रणनीति और संगठनात्मक दिशा को लेकर बहस तेज है। ऐसे में उनके नए मेकओवर को राजनीतिक संकेतों के रूप में भी देखा जा रहा है।

कभी कहा था- 'दीदी की सादगी मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा बन गई'

नवंबर 2025 में एक टीवी इंटरव्यू के दौरान सायोनी घोष ने ममता बनर्जी की सादगी से अपनी प्रेरणा का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि जिस पार्टी और नेता के साथ वे काम करती हैं, उनके मूल्यों और जीवनशैली का असर स्वाभाविक रूप से उनके व्यक्तित्व पर पड़ता है।

उन्होंने यह भी कहा था कि वे अपनी नेता की तरह आम लोगों, 'मां-माटी-मानुष' और जमीनी राजनीति के करीब रहना चाहती हैं।

अभिनय की दुनिया से राजनीति तक का सफर

टॉलीवुड की लोकप्रिय अभिनेत्री रहीं सायोनी घोष ने राजनीति में आने के बाद अपनी ग्लैमरस छवि को काफी हद तक पीछे छोड़ दिया था। उन्होंने खुद कई मौकों पर कहा कि अभिनय के दौरान भी वह व्यक्तिगत जीवन में सादगी पसंद करती थीं और राजनीति में आने के बाद ममता बनर्जी के व्यक्तित्व ने उन पर गहरा प्रभाव डाला।

क्या टीएमसी की अंदरूनी खींचतान से जुड़ा है मेकओवर?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि टीएमसी में जारी कथित 'ओल्ड गार्ड बनाम न्यू गार्ड' की खींचतान, पार्टी के अंदर नेतृत्व को लेकर चल रही बहस और हालिया विवादों के बीच सायोनी घोष अपनी एक स्वतंत्र राजनीतिक पहचान स्थापित करने की कोशिश कर रही हैं।

विश्लेषकों के मुताबिक, यह बदलाव उनकी 'इंडिपेंडेंट ब्रांडिंग' की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है, जिससे वे खुद को केवल किसी नेता की छवि तक सीमित न रखकर एक अलग राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में पेश कर सकें।

सियासी संदेश या व्यक्तिगत पसंद?

सायोनी घोष की ओर से उनके नए लुक को लेकर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन उनका बदला हुआ अंदाज राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि क्या यह सिर्फ व्यक्तिगत पसंद का मामला है या फिर बंगाल की राजनीति में बदलते समीकरणों के बीच एक नया राजनीतिक संदेश देने की कोशिश।

फिलहाल, टीएमसी के अंदरूनी संकट के दौर में सायोनी घोष का यह नया अवतार बंगाल की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे चुका है।

 

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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राज्यसभा चुनाव: ZPM उम्मीदवार के. लालतलुआंगकिमा जीते, पहली बार उच्च सदन पहुंची पार्टी

  मिजोरम की एकमात्र राज्यसभा सीट पर हुए चुनाव में सत्तारूढ़ Zoram People's Movement (जेडपीएम) ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। पार्टी के उम्मीदवार K. Lalhmingliana (के. लालतलुआंगकिमा) ने चुनाव जीतकर पहली बार पार्टी को संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा में प्रतिनिधित्व दिलाया है। 26 वोट हासिल कर दर्ज की शानदार जीत विधानसभा सचिव एवं निर्वाचन अधिकारी Jothansanga Ralte के अनुसार, चुनाव में कुल 36 वोट पड़े। इनमें जेडपीएम उम्मीदवार के. लालतलुआंगकिमा को 26 वोट मिले, जबकि विपक्षी Mizo National Front (एमएनएफ) की उम्मीदवार Jothansangi Hmar को 10 वोट प्राप्त हुए। एमएनएफ उम्मीदवार को उनकी पार्टी के सभी 10 विधायकों का समर्थन मिला, लेकिन विधानसभा में स्पष्ट बहुमत होने के कारण जेडपीएम उम्मीदवार की जीत पहले से ही लगभग तय मानी जा रही थी। पहली बार राज्यसभा में पहुंचेगी जेडपीएम यह जीत केवल एक चुनावी सफलता नहीं, बल्कि जेडपीएम के राजनीतिक इतिहास में एक बड़ी उपलब्धि है। पहली बार पार्टी का कोई प्रतिनिधि राज्यसभा पहुंचेगा, जिससे राष्ट्रीय राजनीति में उसकी उपस्थिति और प्रभाव बढ़ने की संभावना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस जीत से जेडपीएम को राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान मजबूत करने और पूर्वोत्तर के मुद्दों को संसद में अधिक प्रभावी ढंग से उठाने का अवसर मिलेगा। तीन विधायकों ने नहीं किया मतदान राज्यसभा चुनाव में तीन विधायकों ने मतदान प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लिया। इनमें शामिल हैं— K. Beichhua (भाजपा) K. Hrahmo (भाजपा) C. Ngunlianchunga (कांग्रेस) कांग्रेस विधायक सी. न्गुनलिआनचुंगा ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि उन्होंने पार्टी आलाकमान के निर्देशों के अनुसार मतदान से दूरी बनाई। वहीं, भाजपा के मीडिया संयोजक Johnny Lalthanpuia ने बताया कि पार्टी के दोनों विधायकों ने भी मतदान नहीं किया। स्वास्थ्य कारणों से वोट नहीं डाल सके एक विधायक निर्वाचन अधिकारी जोथानसांगा राल्ते ने बताया कि विधायक W. Chhuanawma स्वास्थ्य संबंधी कारणों से मतदान नहीं कर सके। इस प्रकार 40 सदस्यीय मिजोरम विधानसभा में से 36 विधायकों ने मतदान किया, जबकि चार सदस्य वोटिंग प्रक्रिया से बाहर रहे। जेडपीएम के लिए क्यों अहम है यह जीत? के. लालतलुआंगकिमा की जीत जेडपीएम के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण मानी जा रही है— पहली बार पार्टी को राज्यसभा में प्रतिनिधित्व मिला। राष्ट्रीय राजनीति में जेडपीएम की उपस्थिति मजबूत होगी। पूर्वोत्तर और मिजोरम से जुड़े मुद्दों को संसद में नई आवाज मिलेगी। पार्टी को भविष्य में राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक विस्तार का अवसर मिल सकता है। यह परिणाम मिजोरम की राजनीति में जेडपीएम की बढ़ती ताकत और उसके मजबूत जनाधार का भी संकेत माना जा रहा है।  

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रांची। झारखंड में राज्यसभा की 2 सीटों के लिए हो रही वोटिंग खत्म हो गई। अंतिम वोट झामुमो नेता और मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने डाला। वहीं, उनसे पहले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मतदान किया। सभी 81 विधायकों ने राज्यसभा चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग किया और अब नतीजों का इंतजार है। मतगणना शाम 5 बजे से होगी, जबकि 7 बजे तक नतीजे घोषित किए जाने की संभावना है। एनडीए समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी और झामुमो उम्मीदवार बैजनाथ राम अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। हम 100 फीसदी जीतेंगे पूर्व मंत्री बैजनाथ राम ने विधानसभा परिसर में मीडियाकर्मियों से बातचीत में कहा कि मुझे पूरा भरोसा है और हम 100 फीसदी जीतेंगे। उन्होंने कहा कि इंडी गठबंधन के दोनों उम्मीदवार जीत रहे हैं। बैजनाथ राम ने कहा कि मुझे 30 वोट मिलेंगे और हमारी जीत पक्की है। बैजनाथ राम ने कहा कि एनडीए चाहे जो भी दावा करे, लेकिन उनके पास जरूरी संख्या नहीं है।  बीजेपी कर रही जीत का दावा इस बीच वोटिंग के बाद बीजेपी के वरीय विधायक सीपी सिंह ने कहा कि जीत का आत्मविश्वास इतना ज्यादा है कि आप कल्पना नहीं कर सकते। उम्मीद पर ही तो दुनिया कायम है। सीपी सिंह ने कहा कि उम्मीद के बिना तो कोई जिंदा भी नहीं रह सकता है। वोटिंग के बाद पूर्व मंत्री भानुप्रताप शाही ने कहा कि झारखंड के विकास के लिए हमने परिमल नाथवानी की जीत पक्की करने का फैसला किया है। भानुप्रताप शाही ने दावा किया कि परिमल नाथवानी को कम से कम 36 वोट तो मिल ही रहे हैं।  परिमल नाथवानी ने भी किया जीत का दावा इस बीच परिमल नाथवानी ने भी अपनी जीत का दावा किया। उन्होंने कहा कि मुझे पूरा भरोसा है कि मैं जीतूंगा। मुझे सभी विधायकों पर विश्वास है। यदि मौका मिला तो मैं निश्चित रूप से झारखंड की सेवा करूंगा। क्या उन्हें कांग्रेस विधायकों का समर्थन प्राप्त है, मीडियाकर्मियों के इस सवाल पर परिमल नाथवानी ने कहा कि मुझे सभी का समर्थन प्राप्त है।

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Samajwadi Party chief Akhilesh Yadav addresses party leaders while announcing plans to challenge BJP in Gorakhpur ahead of UP Assembly Elections 2027.
योगी के गढ़ गोरखपुर में बीजेपी को घेरने की तैयारी में सपा, अखिलेश बोले- 2027 में कमल नहीं खिलने देंगे

  लखनऊ/गोरखपुर: समाजवादी पार्टी (सपा) ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां तेज कर दी हैं। पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गढ़ गोरखपुर में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को चुनौती देने का बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि इस बार समाजवादी पार्टी गोरखपुर में बीजेपी को शून्य पर लाने के लिए पूरी ताकत से काम करेगी। गोरखपुर में कार्यकर्ता सम्मेलन की तैयारी लखनऊ में पार्टी की बैठक के दौरान अखिलेश यादव ने कहा कि जल्द ही गोरखपुर में सपा कार्यकर्ताओं का बड़ा सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। उन्होंने बताया कि प्रदेश अध्यक्ष श्याम लाल पाल जल्द ही सम्मेलन की तारीख की घोषणा करेंगे। अखिलेश यादव ने कहा, "हमने संकल्प लिया है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में गोरखपुर में बीजेपी को कड़ी चुनौती देंगे। जहां भी हमारी कमियां हैं, उन्हें दूर किया जाएगा और संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत किया जाएगा।" कार्यकर्ताओं के सम्मान की बात सपा प्रमुख ने कहा कि पार्टी अपने प्रत्येक कार्यकर्ता के सम्मान और उनके सुख-दुख में भागीदारी के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि मजबूत संगठन और कार्यकर्ताओं की एकजुटता के दम पर पार्टी 2027 के चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करेगी। शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था पर योगी सरकार को घेरा अखिलेश यादव ने योगी सरकार के दस साल के कार्यकाल पर सवाल उठाते हुए कहा कि भाजपा सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को कमजोर किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश में अपराध की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं और सरकार जनता से किए गए वादों को पूरा करने में असफल रही है। उन्होंने कहा, "भाजपा ने झूठे वादे करके जनता को गुमराह करने का काम किया है। प्रदेश के लोग बदलाव चाहते हैं और समाजवादी पार्टी उनकी उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए तैयार है।" ओपी राजभर के बयान पर भी किया पलटवार सपा प्रमुख ने मंत्री ओपी राजभर के हालिया बयान पर भी तंज कसा। उन्होंने शायराना अंदाज में कहा, "दाना और गाना, कब तक चलेगा ये अफसाना।" अखिलेश यादव के इस बयान को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले गोरखपुर समेत पूर्वांचल में सपा की आक्रामक चुनावी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। अब सभी की नजरें गोरखपुर में होने वाले प्रस्तावित कार्यकर्ता सम्मेलन और सपा की आगे की राजनीतिक रणनीति पर टिकी हैं।  

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