पुजारा के मुताबिक, जडेजा अब टेस्ट क्रिकेट में केवल रन रोकने या पिच से मदद मिलने का इंतजार करने वाले गेंदबाज नहीं रहे। उनकी कोशिश अब हर गेंद पर बल्लेबाज को आउट करने की होती है। यही बदलाव उन्हें रेड-बॉल क्रिकेट में पहले से ज्यादा खतरनाक बनाता है।
जडेजा के टेस्ट रिकॉर्ड की बात करें तो उन्होंने 89 टेस्ट मैचों में 25.12 की औसत से 348 विकेट अपने नाम किए हैं। गेंद के साथ उनकी उपयोगिता के अलावा बल्लेबाजी और फील्डिंग में योगदान भी उन्हें भारतीय टेस्ट टीम के सबसे प्रभावशाली ऑलराउंडरों में शामिल करता है।
चेतेश्वर पुजारा के अनुसार, जडेजा के करियर के शुरुआती दौर में उनकी गेंदबाजी का मुख्य उद्देश्य रन रोकना हुआ करता था। खासतौर पर टेस्ट क्रिकेट में वह परिस्थितियों के हिसाब से गेंदबाजी करते थे और पिच से मदद मिलने पर विकेट लेने की कोशिश करते थे।
लेकिन अब उनकी सोच में बड़ा बदलाव आया है। पुजारा के मुताबिक जडेजा हर गेंद को विकेट लेने के अवसर के रूप में देखते हैं और बल्लेबाज को स्टंप्स की लाइन में फंसाने की कोशिश करते हैं।
यह मानसिक बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि टेस्ट क्रिकेट में लगातार आक्रमण बनाए रखना गेंदबाज के लिए आसान नहीं होता। जडेजा अब सिर्फ दबाव बनाने के बजाय उस दबाव को विकेट में बदलने की कोशिश करते नजर आते हैं।
पुजारा ने जडेजा की बदली गेंदबाजी के तकनीकी पहलू पर भी बात की। उनके अनुसार, आक्रामक सोच का असर गेंदबाजी की पूरी प्रक्रिया पर दिखाई देता है।
जब गेंदबाज का उद्देश्य विकेट लेना होता है, तो वह बल्लेबाज की कमजोरियों के हिसाब से अपनी गेंदबाजी में बदलाव करने की कोशिश करता है। जडेजा भी अब क्रीज का बेहतर इस्तेमाल कर रहे हैं। वह अलग-अलग कोणों से गेंद डालने और बल्लेबाज के अनुसार लेंथ में बदलाव करने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।
यही विविधता टेस्ट क्रिकेट में बल्लेबाज के लिए परेशानी बढ़ा सकती है। एक ही तरह की गेंदबाजी करने के बजाय कोण, लेंथ और गेंद की दिशा में बदलाव से जडेजा लगातार बल्लेबाज पर दबाव बना सकते हैं।
अब जडेजा की इस बदली हुई गेंदबाजी सोच की परीक्षा श्रीलंका के खिलाफ टेस्ट सीरीज में होगी। लंबे समय के बाद टेस्ट क्रिकेट में वापसी करने जा रहे जडेजा से भारतीय टीम को गेंद और बल्ले दोनों से महत्वपूर्ण योगदान की उम्मीद रहेगी।
श्रीलंकाई परिस्थितियों में स्पिन गेंदबाजों की भूमिका अहम हो सकती है। ऐसे में जडेजा की सटीक लाइन-लेंथ, क्रीज के इस्तेमाल की क्षमता और आक्रामक मानसिकता भारतीय टीम के लिए बड़ा हथियार साबित हो सकती है।
चेतेश्वर पुजारा का आकलन इस बात की ओर इशारा करता है कि जडेजा के खेल में अनुभव के साथ उनकी रणनीति भी विकसित हुई है। अब वह केवल बल्लेबाज को रोकने के बजाय उसे गलती करने के लिए मजबूर करने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।
टेस्ट क्रिकेट में गेंदबाज के लिए यही मानसिकता निर्णायक साबित हो सकती है। अगर जडेजा श्रीलंका के खिलाफ इसी आक्रामक दृष्टिकोण को प्रभावी ढंग से लागू करते हैं, तो भारतीय टीम को बीच के ओवरों में विकेट हासिल करने का मजबूत विकल्प मिल सकता है।
अब देखना होगा कि श्रीलंका के खिलाफ मैदान पर जडेजा की यह बदली हुई गेंदबाजी सोच कितनी प्रभावी साबित होती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
कोलंबो, एजेंसियां। शुभमन गिल की कप्तानी में भारतीय टेस्ट टीम श्रीलंका पहुंच गई है। भारत और श्रीलंका के बीच आगामी टेस्ट सीरीज को लेकर टीम ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। भारतीय टीम का यह दौरा टेस्ट क्रिकेट में नई चुनौती के साथ-साथ कप्तान शुभमन गिल के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। श्रीलंका में टेस्ट क्रिकेट की चुनौती भारतीय टीम लंबे समय बाद श्रीलंका में टेस्ट मुकाबले खेलने उतरेगी। श्रीलंकाई परिस्थितियों में स्पिन गेंदबाजों की भूमिका अहम रहने की उम्मीद है। ऐसे में भारतीय बल्लेबाजों और गेंदबाजों के सामने परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढालने की चुनौती होगी। टीम प्रबंधन की नजर खिलाड़ियों की फिटनेस और परिस्थितियों के अनुसार सही संयोजन तैयार करने पर रहेगी। भारतीय बल्लेबाजी क्रम में गिल के अलावा अनुभवी और युवा खिलाड़ियों से भी अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद होगी। गिल के नेतृत्व पर रहेगी नजर टेस्ट कप्तान के तौर पर शुभमन गिल के नेतृत्व पर भी इस दौरे में खास नजर रहेगी। कप्तानी की जिम्मेदारी मिलने के बाद उनके सामने टीम को विदेशी परिस्थितियों में सफल बनाने की चुनौती है। गिल के लिए यह दौरा अपनी कप्तानी में टीम को मजबूत करने और टेस्ट क्रिकेट में भारत की स्थिति को और बेहतर बनाने का अहम मौका माना जा रहा है। सीरीज से पहले तैयारी पर फोकस श्रीलंका पहुंचने के बाद भारतीय टीम का फोकस अभ्यास और परिस्थितियों के अनुकूल ढलने पर रहेगा। खासकर स्पिन के खिलाफ बल्लेबाजी और श्रीलंकाई बल्लेबाजों को रोकने के लिए गेंदबाजी रणनीति पर काम किया जाएगा। भारतीय टीम की नजर सीरीज में मजबूत शुरुआत करने पर होगी। वहीं श्रीलंका घरेलू परिस्थितियों का फायदा उठाकर भारत को चुनौती देने की कोशिश करेगा।
नई दिल्ली: भारतीय क्रिकेट में इस समय खिलाड़ियों के भविष्य से लेकर चयन समिति की भूमिका तक कई बड़े सवाल चर्चा में हैं। इसी बीच मुख्य चयनकर्ता अजीत अगरकर के भविष्य को लेकर भी अटकलें तेज हो गई हैं। पहले माना जा रहा था कि अगरकर का कार्यकाल 2027 वनडे विश्व कप तक बढ़ाया जा सकता है, लेकिन अब भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के भीतर उनके कार्यकाल को लेकर नए सिरे से विचार किए जाने की खबरें सामने आ रही हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बोर्ड के सामने दो विकल्पों पर चर्चा हो रही है। पहला, अगरकर को करीब एक साल का विस्तार दिया जाए और उन्हें 2027 वनडे विश्व कप तक चयन समिति की कमान संभालने का मौका मिले। दूसरा विकल्प वीवीएस लक्ष्मण का नाम है, जिन्हें अगरकर की जगह मुख्य चयनकर्ता की जिम्मेदारी दी जा सकती है। हालांकि, अभी तक इस संबंध में कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। ऐसे में अगरकर की विदाई तय मानना जल्दबाजी होगी। वीवीएस लक्ष्मण के नाम पर क्यों हो रहा विचार? वीवीएस लक्ष्मण भारतीय क्रिकेट के अनुभवी चेहरों में शामिल हैं। वह राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी से जुड़े रहे हैं और भारतीय टीम के कोचिंग सेटअप में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा चुके हैं। खिलाड़ियों और टीम प्रबंधन के साथ उनका लंबा अनुभव उन्हें इस भूमिका के लिए मजबूत दावेदार बना सकता है। रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि बोर्ड के कुछ पदाधिकारी लक्ष्मण के अनुभव और खिलाड़ियों के बीच उनकी स्वीकार्यता को सकारात्मक पहलू मानते हैं। खासतौर पर वरिष्ठ खिलाड़ियों के साथ उनके संबंधों को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यही वजह है कि चयन समिति की भूमिका में बदलाव की स्थिति बनती है तो लक्ष्मण का नाम चर्चा में आ सकता है। हालांकि, यह अभी संभावित विकल्प है, आधिकारिक नियुक्ति नहीं। अगरकर को भी मिल सकता है विस्तार दूसरी तरफ अजीत अगरकर के लिए रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। बोर्ड का एक वर्ग 2027 वनडे विश्व कप को ध्यान में रखते हुए उन्हें आगे भी मुख्य चयनकर्ता बनाए रखने के पक्ष में बताया जा रहा है। भारतीय क्रिकेट के लिए 2027 वनडे विश्व कप महत्वपूर्ण लक्ष्य है। ऐसे में चयन समिति में निरंतरता बनाए रखना भी बोर्ड के लिए एक अहम पहलू हो सकता है। श्रीलंका के खिलाफ आगामी दो टेस्ट मैचों की सीरीज का प्रदर्शन भी इस पूरे समीकरण में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अगर भारतीय टीम अच्छा प्रदर्शन करती है, तो अगरकर के कार्यकाल को आगे बढ़ाने की संभावना मजबूत हो सकती है। रोहित शर्मा के भविष्य ने बढ़ाई थी हलचल अगरकर की भूमिका पर चर्चा ऐसे समय हो रही है जब भारतीय क्रिकेट में वरिष्ठ खिलाड़ियों के भविष्य को लेकर पहले से ही बहस चल रही है। इंग्लैंड दौरे के दौरान रोहित शर्मा के वनडे करियर को लेकर अटकलें तेज हो गई थीं। दूसरे वनडे से पहले ऐसी चर्चाएं सामने आईं कि लॉर्ड्स में होने वाला मुकाबला रोहित का आखिरी मैच हो सकता है। इसके बाद सोशल मीडिया पर उनके भविष्य को लेकर बहस और तेज हो गई। मामले को स्पष्ट करते हुए बीसीसीआई सचिव देवजीत सैकिया ने कहा था कि जब तक रोहित टीम की योजनाओं का हिस्सा हैं, तब तक वह भारतीय टीम के नियमित सदस्य बने रहेंगे। इसके बाद रोहित ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 138 रन की पारी खेली। हालांकि, उनकी इस बेहतरीन पारी के बावजूद भारत मुकाबला जीतने में सफल नहीं रहा। 2027 विश्व कप को लेकर चयन समिति में मतभेद? रोहित शर्मा के भविष्य को लेकर चयन समिति के भीतर भी अलग-अलग विचार होने की बात सामने आई है। एक पक्ष का मानना है कि 2027 विश्व कप को ध्यान में रखते हुए अभी से नई पीढ़ी की टीम तैयार करने की जरूरत है। वहीं दूसरी तरफ बोर्ड के कुछ अधिकारी वरिष्ठ खिलाड़ियों के अनुभव और टीम में उनकी भूमिका को भी महत्व दे रहे हैं। इसके अलावा सार्वजनिक प्रतिक्रिया और सोशल मीडिया पर बनने वाली धारणा भी इस पूरे मामले का एक पहलू बन चुकी है। ऐसे में चयनकर्ताओं के सामने चुनौती सिर्फ टीम चुनने की नहीं, बल्कि अनुभव और भविष्य की जरूरतों के बीच संतुलन बनाने की भी है। भारत के हालिया प्रदर्शन की भी होगी समीक्षा इंग्लैंड और आयरलैंड दौरों पर भारत के प्रदर्शन को लेकर भी सवाल उठे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने इन दौरों पर खेले गए 10 मुकाबलों में से 8 में हार का सामना किया। दौरे के बाद प्रदर्शन की समीक्षा के लिए बैठक होनी थी, लेकिन बीसीसीआई सचिव देवजीत सैकिया की तबीयत खराब होने के कारण इसे टाल दिया गया। अब आने वाले दिनों में समीक्षा बैठक होने की उम्मीद है। बताया जा रहा है कि मुख्य कोच गौतम गंभीर इस बैठक में ऑनलाइन माध्यम से शामिल हो सकते हैं। इस समीक्षा में टीम के प्रदर्शन, चयन संबंधी फैसलों और आगे की रणनीति पर चर्चा संभव है। अब नजर बीसीसीआई की अगली बैठक पर मुख्य चयनकर्ता के भविष्य को लेकर स्थिति सितंबर में होने वाली बीसीसीआई की वार्षिक आम सभा की बैठक के दौरान और स्पष्ट हो सकती है। फिलहाल अगरकर को हटाने या लक्ष्मण को उनकी जगह नियुक्त करने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। इसलिए फिलहाल तस्वीर दो संभावनाओं के बीच दिखाई दे रही है—एक तरफ अगरकर को 2027 विश्व कप तक बनाए रखने का विकल्प है, तो दूसरी तरफ वीवीएस लक्ष्मण जैसे अनुभवी नाम को चयन समिति की कमान सौंपने की चर्चा है। आखिरकार फैसला बीसीसीआई की रणनीति, टीम के प्रदर्शन और 2027 विश्व कप की तैयारियों को ध्यान में रखते हुए लिया जाएगा। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय क्रिकेट में चयन की कमान अगरकर के हाथ में रहती है या लक्ष्मण को नई जिम्मेदारी मिलती है।
पुणे, एजेंसियां। ग्लासगो में संपन्न कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के शानदार प्रदर्शन में पुणे स्थित आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट (ASI) की भूमिका एक बार फिर सामने आई है। वैज्ञानिक प्रशिक्षण, अनुशासन और उच्च स्तरीय खेल सुविधाओं के दम पर सेना से जुड़े खिलाड़ियों ने भारत के पदक अभियान में बड़ा योगदान दिया। भारत के 39 पदकों में सेना का बड़ा योगदान भारत ने ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में कुल 39 पदक—13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य जीतकर पदक तालिका में चौथा स्थान हासिल किया। इनमें भारतीय सैन्यकर्मियों ने 18 पदक जीते, जिसमें भारतीय सेना के खिलाड़ियों के खाते में 16 पदक रहे। ASI में वैज्ञानिक प्रशिक्षण पर जोर पुणे का आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट भारत के प्रमुख उच्च प्रदर्शन केंद्रों में गिना जाता है। यहां खिलाड़ियों को वैज्ञानिक प्रशिक्षण, फिटनेस, खेल विज्ञान और अनुशासित प्रशिक्षण व्यवस्था का लाभ मिलता है। खास तौर पर मुक्केबाजी में ASI की भूमिका उल्लेखनीय रही है। संस्थान ने कई ऐसे खिलाड़ियों को तैयार करने में योगदान दिया है, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। बॉक्सिंग समेत कई खेलों में दिखा असर कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत ने मुक्केबाजी में अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया और 10 पदक जीते, जिनमें 7 स्वर्ण शामिल रहे। इसके अलावा भारोत्तोलन, जूडो, एथलेटिक्स और पैरा-एथलेटिक्स में भी भारत ने शानदार प्रदर्शन किया। 2030 अहमदाबाद कॉमनवेल्थ गेम्स से बढ़ी उम्मीदें ग्लासगो में भारत के प्रदर्शन ने 2030 में अहमदाबाद में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर उम्मीदें बढ़ा दी हैं। सेना और ASI जैसे संस्थानों के उच्च प्रदर्शन वाले प्रशिक्षण मॉडल को आगे मजबूत किया गया तो भारत को घरेलू मैदान पर और बेहतर पदक प्रदर्शन करने में मदद मिल सकती है।