वॉशिंगटन, एजेंसियां। कुवैत के पोर्ट शुआइबा में मार्च में हुए ईरानी ड्रोन हमले को लेकर अमेरिका में अब एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। इस हमले में छह अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई थी और कई अन्य घायल हुए थे। अब अमेरिकी सीनेटर टैमी बाल्डविन ने अमेरिकी रक्षा विभाग से इस हमले की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है।
ईरान ने 1 मार्च 2026 को कुवैत के पोर्ट शुआइबा में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकाने को ड्रोन से निशाना बनाया था। हमले में अमेरिकी सेना की 103वीं सस्टेनमेंट कमांड से जुड़े छह सैनिक मारे गए। पेंटागन ने बाद में सभी छह सैनिकों की पहचान जारी की थी।
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, हमले में कम से कम 20 सैनिक घायल हुए थे। बाद की रिपोर्टों में कई घायल सैनिकों को गंभीर चोटें आने की बात सामने आई, जिनमें जलने, छर्रे लगने और मस्तिष्क संबंधी चोटें शामिल थीं।
हमले के बाद कुछ घायल सैनिकों ने आरोप लगाया कि सैन्य ठिकाने पर पर्याप्त सुरक्षा और चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। सैनिकों के अनुसार, हमले से पहले अतिरिक्त चिकित्सा सहायता और सुरक्षा संसाधनों की जरूरत बताई गई थी, लेकिन पर्याप्त इंतजाम नहीं किए गए। इन दावों को लेकर अमेरिकी सांसदों ने रक्षा विभाग से जवाब मांगा है।
अमेरिकी सांसदों की ओर से यह भी सवाल उठाया गया है कि हमले के बाद घायल सैनिकों को तत्काल चिकित्सा सहायता क्यों नहीं मिल सकी। कुछ सैनिकों ने दावा किया कि उन्हें उचित चिकित्सा जांच और उपचार के लिए काफी इंतजार करना पड़ा।
5 अगस्त को अमेरिकी सीनेटर टैमी बाल्डविन ने रक्षा सचिव पीट हेगसेथ से हमले की सैन्य जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक करने की मांग की। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या हमले से पहले सैनिकों की सुरक्षा को लेकर मिली चेतावनियों और अतिरिक्त संसाधनों की मांग पर पर्याप्त कार्रवाई की गई थी।
बाल्डविन की मांग ऐसे समय सामने आई है जब अमेरिकी सांसद पहले से ही इस हमले में सैनिकों की सुरक्षा और बाद में घायल जवानों को मिली चिकित्सा सहायता को लेकर जांच की मांग कर रहे हैं। अब इस मामले में रक्षा विभाग की जांच रिपोर्ट पर सबकी नजर है।
कुवैत में अमेरिकी सैनिकों पर हुआ यह हमला अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव के शुरुआती दौर की सबसे घातक घटनाओं में शामिल रहा। इसके बाद खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों की सुरक्षा और ईरान की जवाबी कार्रवाई को लेकर चिंता बढ़ी। मौजूदा समय में भी अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयासों के साथ-साथ क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर आशंकाएं बनी हुई हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिका ने ब्राजील की राजदूत मारिया लुइजा रिबेरो वियोटी का वीजा रद्द कर दिया है। अमेरिका के इस कदम से दोनों देशों के बीच पहले से जारी राजनयिक विवाद और गहरा गया है। यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन और ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा की सरकार के बीच कई मुद्दों पर मतभेद बढ़ रहे हैं। अमेरिकी राजदूत की नियुक्ति को लेकर विवाद अमेरिका और ब्राजील के बीच ताजा विवाद की एक बड़ी वजह राजदूतों की नियुक्ति को लेकर पैदा हुआ गतिरोध है। ब्राजील ने ट्रंप प्रशासन की ओर से ब्रासीलिया में अमेरिकी राजदूत के लिए नामित डैनियल पेरेज को मंजूरी नहीं दी। इसके अलावा ब्राजील ने दो अमेरिकी राजनयिकों को वीजा देने से भी इनकार कर दिया था। अमेरिकी प्रशासन ने ब्राजील के इन कदमों को राजनयिक प्रक्रिया में अनुचित हस्तक्षेप बताया है। इसके जवाब में अब वॉशिंगटन ने ब्राजील की राजदूत का वीजा रद्द कर दिया है। ब्राजील ने अमेरिका के कदम की आलोचना की ब्राजील ने अमेरिकी कार्रवाई पर नाराजगी जताई है। राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा ने अमेरिका के इस कदम को गैर-जिम्मेदाराना बताया और संकेत दिया कि वॉशिंगटन की कार्रवाई ब्राजील के आंतरिक मामलों और आगामी चुनाव को प्रभावित करने की कोशिशों से जुड़ी हो सकती है। ब्राजील में अक्टूबर 2026 में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं। ऐसे में चुनावी प्रक्रिया और देश की राजनीतिक व्यवस्था को लेकर अमेरिका और ब्राजील के बीच पहले से ही मतभेद चल रहे हैं। व्यापारिक विवाद ने भी बढ़ाई दूरी दोनों देशों के बीच तनाव केवल राजनयिक मुद्दों तक सीमित नहीं है। अमेरिका ने जुलाई में ब्राजील के कुछ उत्पादों पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की कार्रवाई की थी। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय ने ब्राजील की कुछ व्यापारिक नीतियों और प्रथाओं को अमेरिकी वाणिज्य के लिए अनुचित बताया था। इसके अलावा अमेरिका और ब्राजील के नेताओं के बीच ब्राजील की चुनावी प्रक्रिया और घरेलू राजनीति को लेकर भी मतभेद सामने आते रहे हैं। इन घटनाक्रमों के कारण दोनों देशों के संबंधों में तनाव लगातार बढ़ रहा है। सामान्य संबंध बहाल करने का रास्ता खुला अमेरिकी अधिकारियों ने संकेत दिया है कि वीजा रद्द करने का फैसला स्थायी रूप से संबंध तोड़ने या ब्राजील की राजदूत को देश से निष्कासित करने के बराबर नहीं है। अमेरिका ने कहा है कि यदि राजनयिक स्तर पर पारस्परिकता कायम होती है तो वीजा बहाल करने का रास्ता खुला है। फिलहाल दोनों देशों के बीच राजनयिक विवाद के साथ व्यापार और चुनावी मुद्दे भी जुड़े हुए हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में ब्राजील और अमेरिका के बीच बातचीत और दोनों सरकारों के अगले कदम पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी रहेगी।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। कुवैत के पोर्ट शुआइबा में मार्च में हुए ईरानी ड्रोन हमले को लेकर अमेरिका में अब एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। इस हमले में छह अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई थी और कई अन्य घायल हुए थे। अब अमेरिकी सीनेटर टैमी बाल्डविन ने अमेरिकी रक्षा विभाग से इस हमले की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है। 1 मार्च को हुआ था घातक ड्रोन हमला ईरान ने 1 मार्च 2026 को कुवैत के पोर्ट शुआइबा में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकाने को ड्रोन से निशाना बनाया था। हमले में अमेरिकी सेना की 103वीं सस्टेनमेंट कमांड से जुड़े छह सैनिक मारे गए। पेंटागन ने बाद में सभी छह सैनिकों की पहचान जारी की थी। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, हमले में कम से कम 20 सैनिक घायल हुए थे। बाद की रिपोर्टों में कई घायल सैनिकों को गंभीर चोटें आने की बात सामने आई, जिनमें जलने, छर्रे लगने और मस्तिष्क संबंधी चोटें शामिल थीं। अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा पर उठे सवाल हमले के बाद कुछ घायल सैनिकों ने आरोप लगाया कि सैन्य ठिकाने पर पर्याप्त सुरक्षा और चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। सैनिकों के अनुसार, हमले से पहले अतिरिक्त चिकित्सा सहायता और सुरक्षा संसाधनों की जरूरत बताई गई थी, लेकिन पर्याप्त इंतजाम नहीं किए गए। इन दावों को लेकर अमेरिकी सांसदों ने रक्षा विभाग से जवाब मांगा है। अमेरिकी सांसदों की ओर से यह भी सवाल उठाया गया है कि हमले के बाद घायल सैनिकों को तत्काल चिकित्सा सहायता क्यों नहीं मिल सकी। कुछ सैनिकों ने दावा किया कि उन्हें उचित चिकित्सा जांच और उपचार के लिए काफी इंतजार करना पड़ा। सैन्य जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग 5 अगस्त को अमेरिकी सीनेटर टैमी बाल्डविन ने रक्षा सचिव पीट हेगसेथ से हमले की सैन्य जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक करने की मांग की। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या हमले से पहले सैनिकों की सुरक्षा को लेकर मिली चेतावनियों और अतिरिक्त संसाधनों की मांग पर पर्याप्त कार्रवाई की गई थी। बाल्डविन की मांग ऐसे समय सामने आई है जब अमेरिकी सांसद पहले से ही इस हमले में सैनिकों की सुरक्षा और बाद में घायल जवानों को मिली चिकित्सा सहायता को लेकर जांच की मांग कर रहे हैं। अब इस मामले में रक्षा विभाग की जांच रिपोर्ट पर सबकी नजर है। मध्य-पूर्व में तनाव का बड़ा असर कुवैत में अमेरिकी सैनिकों पर हुआ यह हमला अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव के शुरुआती दौर की सबसे घातक घटनाओं में शामिल रहा। इसके बाद खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों की सुरक्षा और ईरान की जवाबी कार्रवाई को लेकर चिंता बढ़ी। मौजूदा समय में भी अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयासों के साथ-साथ क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर आशंकाएं बनी हुई हैं।
ब्राजील के साओ पाउलो राज्य में स्थित एक केमिकल प्लांट में भीषण आग लगने के बाद कई जोरदार धमाके हुए, जिससे पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई। आग इतनी विकराल थी कि आसमान में सैकड़ों फीट तक घना काला धुआं और आग की ऊंची लपटें दिखाई देने लगीं। एहतियात के तौर पर आसपास के इलाकों से लोगों को सुरक्षित निकाला गया और करीब 150 लोगों का रेस्क्यू किया गया। स्थानीय प्रशासन के अनुसार, आग ग्रेटर साओ पाउलो के इटाक्वाक्वेसेटुबा (Itaquaquecetuba) स्थित क्वेमा क्विमिका (Quema Quimica) नामक रासायनिक संयंत्र में स्थानीय समयानुसार दोपहर करीब 3 बजे लगी। कई धमाकों से दहशत, घर छोड़कर भागे लोग आग लगने के कुछ ही देर बाद प्लांट में लगातार कई धमाके हुए, जिससे आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों में दहशत फैल गई। कई परिवार एहतियातन अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर चले गए। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में फैक्ट्री से उठती आग की विशाल लपटें और 100 फीट से अधिक ऊंचाई तक उठता काला धुआं साफ दिखाई दे रहा है। अधिकारियों ने भी घटनास्थल पर कई विस्फोट होने की पुष्टि की है। 30 दमकल गाड़ियां और 60 से ज्यादा फायरफाइटर मौके पर आग पर काबू पाने के लिए 30 दमकल गाड़ियों और 60 से अधिक दमकलकर्मियों को मौके पर तैनात किया गया है। फायर ब्रिगेड लगातार आग बुझाने और उसे आसपास की औद्योगिक इकाइयों तक फैलने से रोकने की कोशिश कर रही है। अधिकारियों के मुताबिक, अब तक किसी के हताहत होने की पुष्टि नहीं हुई है। सॉल्वेंट टैंक बन रहे आग की बड़ी वजह स्थानीय मीडिया के अनुसार, जिस प्लांट में आग लगी है वहां सॉल्वेंट स्टोर करने के लिए 24 बड़े टैंक मौजूद हैं। प्रत्येक टैंक की क्षमता लगभग 31 क्यूबिक मीटर बताई गई है। इन टैंकों में मौजूद अत्यधिक ज्वलनशील रसायनों के कारण आग तेजी से फैलती गई और लगातार धमाके होते रहे। एक वायरल वीडियो में धमाके की वजह से मैनहोल का ढक्कन हवा में उछलता दिखाई देता है। बताया गया है कि इस विस्फोट की चपेट में आने से वहां से गुजर रहा एक व्यक्ति गिर पड़ा, हालांकि उसकी स्थिति को लेकर आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। आसपास की बिजली आपूर्ति बंद स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने आसपास के क्षेत्रों की बिजली आपूर्ति अस्थायी रूप से बंद कर दी है, ताकि किसी बड़े हादसे से बचा जा सके। प्रभावित क्षेत्र के लोगों को सुरक्षित दूरी बनाए रखने और प्रशासन के निर्देशों का पालन करने की सलाह दी गई है। क्या बनाती है यह कंपनी? आग से प्रभावित कंपनी Quema Quimica सॉल्वेंट्स और पॉलिएस्टर रेजिन के उत्पादन और विपणन का काम करती है। चूंकि प्लांट में बड़ी मात्रा में ज्वलनशील रसायन मौजूद हैं, इसलिए आग बुझाने का अभियान काफी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। फिलहाल दमकल विभाग की टीमें लगातार आग पर काबू पाने में जुटी हैं और घटना के कारणों की जांच शुरू कर दी गई है। अधिकारियों का कहना है कि आग पूरी तरह बुझने के बाद ही नुकसान और संभावित कारणों का विस्तृत आकलन किया जाएगा।