ग्लासगो, एजेंसियां। स्कॉटलैंड के ग्लासगो में शुरू हुए कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 इस बार कई बड़े बदलावों के साथ आयोजित किए जा रहे हैं। आयोजन समिति ने लागत कम रखने और प्रतियोगिता को सीमित स्वरूप में आयोजित करने के उद्देश्य से क्रिकेट समेत नौ प्रमुख खेलों को कार्यक्रम से बाहर रखा है। इस फैसले के बाद खेल जगत में व्यापक चर्चा शुरू हो गई है और कई देशों ने इसे खिलाड़ियों के लिए बड़ा झटका बताया है।
इस संस्करण में क्रिकेट, हॉकी, बैडमिंटन, कुश्ती, निशानेबाजी, टेबल टेनिस, ट्रायथलॉन, स्क्वैश और बीच वॉलीबॉल जैसे खेल प्रतियोगिता का हिस्सा नहीं हैं। इन खेलों के बाहर होने से भारत, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और अन्य देशों की पदक संभावनाओं पर भी सीधा असर पड़ेगा।
आयोजन समिति का कहना है कि ग्लासगो ने सीमित समय में खेलों की मेजबानी की जिम्मेदारी संभाली है। ऐसे में आयोजन को आर्थिक रूप से व्यावहारिक बनाने और बुनियादी ढांचे पर अतिरिक्त खर्च से बचने के लिए प्रतियोगिता को केवल 10 खेलों तक सीमित रखा गया है। इससे आयोजन का कुल खर्च काफी कम होने की उम्मीद है।
भारत पारंपरिक रूप से बैडमिंटन, कुश्ती, निशानेबाजी, क्रिकेट और टेबल टेनिस जैसे खेलों में शानदार प्रदर्शन करता रहा है। इन खेलों के बाहर होने से भारतीय दल की संभावित पदक संख्या प्रभावित हो सकती है। अब भारत की सबसे बड़ी उम्मीदें एथलेटिक्स, वेटलिफ्टिंग, मुक्केबाजी और पैरा स्पर्धाओं पर टिकी हैं।
कई खेल महासंघों और खिलाड़ियों ने लोकप्रिय खेलों को हटाए जाने पर निराशा व्यक्त की है। उनका कहना है कि कॉमनवेल्थ गेम्स युवा खिलाड़ियों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को साबित करने का महत्वपूर्ण मंच होता है। ऐसे में कई खेलों को बाहर रखने से खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय अनुभव हासिल करने का अवसर कम मिलेगा।
कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन ने संकेत दिया है कि यह फैसला केवल ग्लासगो 2026 के लिए है। भविष्य में मेजबान शहर और आयोजन की परिस्थितियों के अनुसार इन खेलों को फिर से शामिल किया जा सकता है। खेल विशेषज्ञों का मानना है कि अगले संस्करण में क्रिकेट और अन्य लोकप्रिय खेलों की वापसी की संभावना बनी हुई है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
इस्लामाबाद/मुजफ्फराबाद, एजेंसियां। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। चुनाव ऐसे समय कराए जा रहे हैं जब क्षेत्र में सरकार और सेना के खिलाफ विरोध प्रदर्शन, आर्थिक संकट और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां बनी हुई हैं। स्थानीय राजनीतिक दलों ने चुनाव प्रचार तेज कर दिया है, जबकि प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है। तीन चरणों में कराए जाएंगे चुनाव पाकिस्तान के चुनाव अधिकारियों के अनुसार, विधानसभा चुनाव अब तीन चरणों में कराए जाएंगे। चुनाव प्रक्रिया जुलाई के अंत से शुरू होकर अगस्त के पहले सप्ताह तक चलेगी। चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दलों के सैकड़ों उम्मीदवार मैदान में हैं और लाखों मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। विरोध प्रदर्शनों के बीच बढ़ी चुनौती चुनाव से पहले PoK के कई इलाकों में महंगाई, बिजली संकट और प्रशासनिक नीतियों के विरोध में प्रदर्शन हुए हैं। हाल के दिनों में सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पों की घटनाएं भी सामने आई हैं। इन हालातों को देखते हुए चुनाव के दौरान अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती की जा रही है। सरकार और विपक्ष आमने-सामने पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N), पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) और अन्य दल चुनाव में अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से कराए जाने चाहिए, जबकि सरकार का कहना है कि सभी आवश्यक व्यवस्थाएं की जा रही हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नजर PoK की स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी नजर बनी हुई है। हालिया विरोध प्रदर्शनों और हिंसा की घटनाओं के बाद संयुक्त राष्ट्र ने क्षेत्र में मानवाधिकारों की स्थिति पर चिंता जताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है। विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव परिणाम क्षेत्र की राजनीतिक दिशा और पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति दोनों पर असर डाल सकते हैं।
बेरूत, एजेंसियां। अमेरिका की मध्यस्थता में हुए लेबनान-इज़राइल समझौते को लागू करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। समझौते के तहत दक्षिणी लेबनान के चुनिंदा क्षेत्रों में लेबनानी सेना (LAF) की तैनाती तेज कर दी गई है, जबकि इज़राइली सेना चरणबद्ध तरीके से कुछ इलाकों से पीछे हट रही है। इस पहल का उद्देश्य सीमा क्षेत्र में तनाव कम करना और लंबे समय से संघर्ष प्रभावित इलाकों में लेबनान सरकार का नियंत्रण बहाल करना है। 'पायलट ज़ोन' से शुरू हुआ समझौते का क्रियान्वयन समझौते के पहले चरण में दक्षिणी लेबनान के ज़ौतर अल-घरबियेह सहित कुछ क्षेत्रों को 'पायलट ज़ोन' के रूप में चुना गया है। इन इलाकों से इज़राइली सैनिकों की वापसी के बाद लेबनानी सेना ने सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालनी शुरू कर दी है। सेना इलाके में विस्फोटक सामग्री की तलाश, सुरक्षा व्यवस्था और सरकारी नियंत्रण स्थापित करने का काम कर रही है। प्रधानमंत्री नवाफ सलाम ने किया दौरा लेबनान के प्रधानमंत्री नवाफ सलाम ने दक्षिणी सीमा के प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर कहा कि सरकार पूरे दक्षिणी लेबनान में राज्य का अधिकार स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने स्थानीय लोगों से धैर्य बनाए रखने की अपील करते हुए भरोसा दिलाया कि पुनर्निर्माण और पुनर्वास का काम तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा। हिज़्बुल्लाह के हथियारों का मुद्दा बना चुनौती समझौते का एक अहम हिस्सा दक्षिणी लेबनान में केवल सरकारी सुरक्षा बलों की मौजूदगी सुनिश्चित करना है। इसके तहत हिज़्बुल्लाह के हथियारों और सैन्य ढांचे को हटाने की योजना भी शामिल है। हालांकि हिज़्बुल्लाह ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई है और अपने हथियार छोड़ने से इनकार किया है, जिससे समझौते के पूर्ण क्रियान्वयन को लेकर चुनौतियां बनी हुई हैं। विस्थापित नागरिकों की वापसी अभी सीमित हालांकि कुछ क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की तैनाती शुरू हो चुकी है, लेकिन बड़े पैमाने पर विस्थापित लोगों की घर वापसी अभी संभव नहीं हो सकी है। कई गांवों में भारी तबाही, क्षतिग्रस्त मकान और बिना फटे गोला-बारूद की मौजूदगी के कारण सेना ने लोगों से फिलहाल लौटने से बचने की अपील की है। 4 अगस्त की वार्ता पर टिकी निगाहें समझौते के अगले चरण को आगे बढ़ाने के लिए 4 अगस्त को इटली में लेबनान, इज़राइल और अमेरिकी प्रतिनिधियों के बीच नई वार्ता प्रस्तावित है। इस बैठक में इज़राइली सैनिकों की आगे की वापसी, लेबनानी सेना की अतिरिक्त तैनाती और सीमा क्षेत्र में स्थायी शांति बहाल करने की दिशा में आगे की रणनीति पर चर्चा होने की उम्मीद है।
इस्लामाबाद, एजेंसियां। पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर एक बार फिर राजनीतिक विवादों के केंद्र में हैं। पाकिस्तान की विपक्षी राजनीति में यह आरोप लगाया जा रहा है कि सैन्य प्रतिष्ठान आलोचकों की आवाज़ दबाने के लिए धार्मिक और राजनीतिक नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहा है। ताज़ा विवाद तब सामने आया जब एक कथित बैठक को लेकर नई राजनीतिक बहस शुरू हो गई। फज़लुर रहमान के समर्थन में उठे सवाल रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान उलेमा काउंसिल के प्रमुख हाफिज़ ताहिर महमूद अशरफी और लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े हाफिज़ तल्हा सईद की कथित मुलाकात के बाद विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि सेना प्रमुख आसिम मुनीर की आलोचना करने वाले जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (फ) के प्रमुख मौलाना फज़लुर रहमान पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है। हालांकि पाकिस्तान की सेना ने इन आरोपों पर आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। विपक्ष ने निष्पक्ष राजनीति की मांग की विपक्षी दलों का कहना है कि पाकिस्तान में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए राजनीतिक गतिविधियों में सैन्य हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। उन्होंने सरकार से इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने और राजनीतिक दलों को स्वतंत्र रूप से काम करने देने की मांग की है। क्षेत्रीय सुरक्षा मुद्दों पर भी सक्रिय हैं आसिम मुनीर इसी बीच, आसिम मुनीर हाल ही में पाकिस्तान दौरे पर आए ईरान के गृह मंत्री एस्कंदर मोमेनी से भी मिले। दोनों नेताओं के बीच सीमा सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। यह बैठक ऐसे समय हुई है जब पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति लगातार चर्चा में बनी हुई है।