रांची। बिजली के पोल पर अनधिकृत और असुरक्षित तरीके से लगाए गए टेलीकॉम, ओएफसी और टीवी केबल के खिलाफ झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड (जेबीवीएनएल) ने सख्त कार्रवाई शुरू कर दी है। कंपनियों को केबल व्यवस्थित करने के लिए दी गई 16 अगस्त की अंतिम समयसीमा खत्म होने के बाद निगम ने अब खुद ऐसे केबल हटाने का अभियान शुरू कर दिया है।
जेबीवीएनएल के अनुसार, सुरक्षा मानकों का पालन नहीं करने वाले केबल और उपकरणों को हटाने में आने वाला खर्च संबंधित कंपनी या एजेंसी से वसूला जाएगा। निगम ने इससे पहले जून में भी दूरसंचार कंपनियों को केबल सुरक्षित करने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट के स्वत: संज्ञान मामले के बाद 13 अगस्त को कंपनियों को अंतिम नोटिस जारी किया गया था।
अभियान के पहले चरण में रांची के कई प्रमुख इलाकों में बिजली पोल पर झूलते और असुरक्षित केबल हटाए गए। इनमें कुसई चौक, हिनू रोड, हरमू रोड, श्रद्धानंद रोड, कांके रोड, तुपुदाना, बूटी मोड़, मेन रोड, कोचा टोली, खेलगांव रोड, कोकर, करमटोली और जगन्नाथपुर समेत कई इलाके शामिल हैं।
इसके अलावा डोरंडा, हिनू, डंगराटोली, लालपुर, पुरुलिया रोड, मोरहाबादी, चिरौंदी और नामकुम में भी कार्रवाई की जा रही है।
जेबीवीएनएल ने कार्रवाई के लिए रांची के ईस्ट, वेस्ट, सेंट्रल, न्यू कैपिटल, डोरंडा और कोकर विद्युत आपूर्ति प्रमंडलों को जिम्मेदारी दी है। रांची के अलावा खूंटी, गुमला, लोहरदगा और सिमडेगा में भी अनधिकृत और असुरक्षित केबल हटाने के निर्देश दिए गए हैं।
निगम के मुताबिक कई जगह बिना अनुमति बिजली पोल पर बड़ी संख्या में केबल लगाए गए हैं। कई केबल निर्धारित सुरक्षित ऊंचाई से नीचे झूल रहे हैं। इससे बड़े वाहनों के केबल में फंसने, तार टूटने और बिजली के बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है। बारिश के मौसम में ऐसे केबल हादसे का कारण बन सकते हैं।
जेबीवीएनएल ने संबंधित कंपनियों से बिजली के पोल पर लगाए गए केबल और उपकरणों का पूरा विवरण भी मांगा है। इसमें पोल की GPS लोकेशन, प्रत्येक पोल पर लगे केबलों की संख्या और उपकरणों की जानकारी शामिल है। निगम का कहना है कि कई कंपनियों ने निर्देश के बावजूद पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई है।
अभियान के तहत बीएसएनएल, रेलटेल, रिलायंस जियो, वोडाफोन समेत दूरसंचार कंपनियों और स्थानीय केबल ऑपरेटरों के केबल भी जांच के दायरे में हैं। जेबीवीएनएल ने सभी संबंधित कंपनियों से एक सप्ताह के भीतर केबल की वैधता का प्रमाण देने और उन्हें सुरक्षा मानकों के अनुरूप व्यवस्थित करने को कहा है।
जेबीवीएनएल ने साफ किया है कि निर्धारित मानकों का पालन नहीं करने वाले और अवैध तरीके से लगाए गए केबल निगम अपने स्तर से हटाएगा। इस कार्रवाई में होने वाला पूरा खर्च संबंधित कंपनी या एजेंसी से वसूला जाएगा।
निगम के मुताबिक अभियान का उद्देश्य केवल अवैध केबल हटाना नहीं है, बल्कि बिजली के पोल और वितरण व्यवस्था को सुरक्षित रखने के साथ राहगीरों और वाहन चालकों के लिए दुर्घटना का खतरा कम करना भी है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
धनबाद के बेलगड़िया में झरिया के अग्नि प्रभावित क्षेत्रों से विस्थापित परिवारों के पुनर्वास को लेकर बड़ी पहल की गई है। जिला प्रशासन ने 38.23 एकड़ सरकारी जमीन को झरिया पुनर्वास एवं विकास प्राधिकरण (JRDA) के नाम 99 वर्ष की लीज पर देने का प्रस्ताव राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग को भेजा है। इस जमीन पर अस्पताल, सामुदायिक भवन, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, सूक्ष्म उद्योग और वस्त्र उद्योग समेत कई जरूरी सुविधाएं विकसित करने की योजना है। इससे बेलगड़िया पुनर्वास क्षेत्र में रहने वाले विस्थापित परिवारों को बेहतर नागरिक सुविधाएं मिलने की उम्मीद है। म्यूटेशन नहीं होने से लंबे समय से अटकी थी प्रक्रिया बेलगड़िया की अधिग्रहित जमीन सरकारी खाते में दर्ज होने के बावजूद म्यूटेशन नहीं होने के कारण इसे JRDA को लीज पर देने की प्रक्रिया लंबे समय से आगे नहीं बढ़ पा रही थी। अब जिला प्रशासन ने मामले में पहल करते हुए विभाग को प्रस्ताव भेजा है। इसमें बलियापुर अंचल के मौजा बेलगड़िया की 38.23 एकड़ गैर-आबाद सरकारी भूमि को JRDA के नाम 99 साल की लीज पर देने का अनुरोध किया गया है। पहले 29 एकड़ जमीन का था प्रस्ताव जिला प्रशासन की ओर से पहले इस उद्देश्य के लिए 29 एकड़ जमीन का प्रस्ताव भेजा गया था। बाद में प्रस्ताव में संशोधन करते हुए जमीन का क्षेत्रफल बढ़ाकर 38.23 एकड़ कर दिया गया। इस अतिरिक्त जमीन का इस्तेमाल पुनर्वास क्षेत्र में संस्थागत, औद्योगिक और व्यावसायिक सुविधाओं के विकास के लिए किया जा सकेगा। अस्पताल से शॉपिंग कॉम्प्लेक्स तक होंगी सुविधाएं प्रस्तावित भूमि पर विस्थापित परिवारों के लिए कई तरह की सुविधाएं विकसित करने की योजना है। इनमें प्रमुख रूप से अस्पताल, सामुदायिक भवन और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स शामिल हैं। इसके अलावा सूक्ष्म उद्योग और वस्त्र उद्योग जैसी गतिविधियों को भी बढ़ावा देने की योजना है। इससे एक ओर पुनर्वास क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं, वहीं दूसरी ओर लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए दूर नहीं जाना पड़ेगा। रिपोर्ट के बाद प्रशासन ने तेज की प्रक्रिया बेलगड़िया की जमीन सरकारी खाते में दर्ज होने के बावजूद म्यूटेशन नहीं होने और लीज प्रक्रिया में आ रही अड़चनों को लेकर पहले रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद जिला प्रशासन ने मामले को आगे बढ़ाया। इसके बाद प्रशासन की ओर से राजस्व विभाग को पत्र भेजकर जमीन को JRDA के नाम लीज पर देने का अनुरोध किया गया है। अब प्रस्ताव पर विभागीय स्तर पर निर्णय की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। दिसंबर 2028 तक मास्टर प्लान पूरा करने का लक्ष्य झरिया पुनर्वास योजना को लेकर संशोधित मास्टर प्लान को दिसंबर 2028 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। उपायुक्त सह JRDA के उप मुख्य कार्यकारी पदाधिकारी की ओर से भेजे गए पत्र में इसका उल्लेख किया गया है। योजना का मुख्य उद्देश्य झरिया के अग्नि प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले विस्थापित परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर आधुनिक नागरिक सुविधाओं के साथ पुनर्वासित करना है। पुनर्वास योजना को मिलेगी गति बेलगड़िया की 38.23 एकड़ जमीन का प्रस्तावित इस्तेमाल केवल आवासीय पुनर्वास तक सीमित नहीं रहेगा। यहां संस्थागत, औद्योगिक और व्यावसायिक सुविधाएं विकसित करने की योजना है। यदि 99 साल की लीज की प्रक्रिया पूरी होती है, तो इससे बेलगड़िया पुनर्वास क्षेत्र में आधारभूत सुविधाओं के विस्तार का रास्ता साफ हो सकता है। साथ ही झरिया के अग्नि प्रभावित इलाकों से विस्थापित परिवारों के पुनर्वास की लंबित प्रक्रिया को भी गति मिलने की उम्मीद है। अब नजर इस बात पर है कि राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग प्रस्ताव पर क्या निर्णय लेता है और जमीन JRDA को लीज पर देने की प्रक्रिया कब तक पूरी होती है।
रांची: झारखंड में 3120 प्लस टू शिक्षकों की नियुक्ति के लिए हुई JSSC PGT परीक्षा के केंद्रवार आंकड़ों ने परीक्षा की पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। परीक्षा 24 केंद्रों पर CBT मोड में हुई थी। पहले चरण के रिजल्ट में अनारक्षित वर्ग से सीधी नियुक्ति के लिए कुल 804 अभ्यर्थी सफल हुए। इनमें से 479 अभ्यर्थी केवल छह परीक्षा केंद्रों से सफल हुए। सबसे ज्यादा चर्चा बोकारो के केंद्र संख्या 102 की है, जहां से अकेले 147 अभ्यर्थी पास हुए। अभय तिवारी ने भी इसी केंद्र से दी थी परीक्षा मामले में अभय तिवारी का नाम भी चर्चा में है। रिपोर्ट के अनुसार, TDPL के मार्केटिंग मैनेजर बताए गए अभय तिवारी ने भी केंद्र संख्या 102 से JSSC PGT की परीक्षा दी थी। उन्होंने अंग्रेजी विषय में सफलता हासिल की। उनकी नियुक्ति देवघर के शशि भूषण राय प्लस-टू हाई स्कूल, सिमरा में हुई थी। इसके बाद उनकी प्रतिनियुक्ति आर मित्रा जिला मुख्यमंत्री उत्कृष्ट विद्यालय, देवघर में कर दी गई थी। हालांकि, रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने वहां योगदान नहीं दिया। विषयवार परिणाम में भी केंद्र 102 आगे केंद्र संख्या 102 का आंकड़ा सिर्फ कुल सफल अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं है। विषयवार परिणाम में भी इस केंद्र से सफल उम्मीदवारों की संख्या अधिक रही। भौतिकी में कुल 94 अभ्यर्थी सफल हुए थे, जिनमें 29 अकेले केंद्र 102 से थे। यानी करीब 30 फीसदी सफल उम्मीदवार इसी केंद्र से आए। जीव विज्ञान में 90 अभ्यर्थी सफल हुए, जिनमें 21 इसी केंद्र से थे। वहीं भूगोल में कुल 72 अभ्यर्थी सफल हुए थे। इनमें 41 अभ्यर्थी बोकारो के दो केंद्रों से थे। कुछ अन्य परीक्षा केंद्रों से एक भी अभ्यर्थी सफल नहीं हुआ। बाकी केंद्रों की तुलना में बड़ा अंतर केंद्रवार आंकड़ों में केंद्र 102 से 147 उम्मीदवार सफल हुए, जबकि केंद्र 101 से सिर्फ 8 और केंद्र 110 से 5 उम्मीदवार सफल हुए। केंद्र 103, 108 और 123 से क्रमशः 67, 69 और 69 अभ्यर्थी सफल हुए। यही बड़ा अंतर अभ्यर्थियों के बीच चर्चा का कारण बना हुआ है। क्या इन आंकड़ों से गड़बड़ी साबित होती है? नहीं। केवल केंद्रवार सफलता के आंकड़े किसी परीक्षा में गड़बड़ी का अंतिम प्रमाण नहीं हैं। किसी केंद्र पर अधिक संख्या में योग्य उम्मीदवार होने या विषयवार उम्मीदवारों के अलग-अलग वितरण से भी परिणाम में अंतर हो सकता है। लेकिन जब किसी एक केंद्र से सफलता का आंकड़ा बाकी केंद्रों की तुलना में काफी ज्यादा हो और उसी केंद्र से परीक्षा देने वाले किसी व्यक्ति का नाम भी चर्चा में हो, तो अभ्यर्थी विस्तृत जांच की मांग कर रहे हैं। ऐसी जांच में CCTV फुटेज, कंप्यूटर लॉग, परीक्षा के दौरान की गतिविधियां, उपस्थिति रिकॉर्ड, सीटिंग प्लान और परीक्षा केंद्र से जुड़े कर्मचारियों की जानकारी की जांच की जा सकती है। फिलहाल इन आंकड़ों ने JSSC PGT परीक्षा की निष्पक्षता को लेकर बहस जरूर तेज कर दी है। अब सवाल यह है कि आयोग इन आंकड़ों और अभ्यर्थियों की शिकायतों पर क्या कदम उठाता है। आपकी इस मामले पर क्या राय है? क्या JSSC को सभी परीक्षा केंद्रों के आंकड़ों और तकनीकी रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच करानी चाहिए? कमेंट में अपनी राय बताएं और खबर को शेयर करें।
रांची। झारखंड की पहचान केवल घने जंगलों और प्राकृतिक संपदा से नहीं, बल्कि जंगलों से मिलने वाली पारंपरिक खाद्य सामग्री से भी है। इन्हीं में ‘बस करील’ यानी बांस की कोमल कोंपल खास स्थान रखती है। बारिश के मौसम में बांस के पौधों से निकलने वाली नई कोंपलों को स्थानीय लोग जंगल और आसपास के बांस के झुरमुटों से एकत्र करते हैं और इससे कई तरह के पारंपरिक व्यंजन तैयार किए जाते हैं। उत्तर छोटानागपुर क्षेत्र में करील के खाद्य उपयोग की पुरानी परंपरा रही है। रांची, हजारीबाग, चतरा, रामगढ़, बोकारो, गिरिडीह, धनबाद और कोडरमा सहित कई जिलों में इसका इस्तेमाल भोजन के तौर पर किया जाता है। इसकी उपलब्धता मुख्य रूप से जुलाई से सितंबर के बीच रहती है। सब्जी ही नहीं, अचार और चटनी में भी इस्तेमाल करील की खासियत यह है कि इसे केवल सब्जी के रूप में ही नहीं खाया जाता। इससे चटनी, अचार और दूसरे पारंपरिक व्यंजन भी बनाए जाते हैं। ताजा करील की सब्जी बनाई जाती है, जबकि इसे सुखाकर या किण्वित करके लंबे समय तक सुरक्षित रखने की भी परंपरा रही है। स्थानीय खान-पान में करील को चावल के साथ-साथ रोटी के साथ भी परोसा जाता है। इसकी सब्जी या चटनी में मिलने वाली हल्की खटास और खास सुगंध इसे दूसरी हरी सब्जियों से अलग स्वाद देती है। बारिश के मौसम में जंगलों में मिलती है करील बांस की नई कोंपल बाहर से परतदार और सख्त दिखाई देती है, लेकिन अंदर का कोमल हिस्सा खाने योग्य होता है। बारिश के साथ जंगलों और बांस के झुरमुटों में निकलने वाली इन कोंपलों को स्थानीय लोग एकत्र करते हैं। कई परिवार इसे घरेलू भोजन के लिए इस्तेमाल करते हैं, जबकि कुछ लोग बाजार में बेचकर आय भी अर्जित करते हैं। पारंपरिक प्रसंस्करण के बाद किया जाता है इस्तेमाल ताजा बांस की कोंपल को सीधे खाने के बजाय पारंपरिक तरीके से तैयार किया जाता है। इसकी बाहरी परत हटाकर कोमल हिस्से को काटा जाता है और कई जगह इसे पानी में भिगोने, उबालने या किण्वित करने के बाद भोजन में इस्तेमाल किया जाता है। इससे इसका स्वाद भी बेहतर होता है और कोंपल में मौजूद कुछ प्राकृतिक यौगिकों का प्रभाव कम करने में मदद मिलती है। ग्रामीण आजीविका से भी जुड़ी है करील बस करील केवल झारखंड की पारंपरिक थाली का स्वाद नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था से भी जुड़ी वन उपज है। स्थानीय समुदाय इसे जंगलों से एकत्र कर घरेलू उपयोग के साथ बाजार में भी बेचते हैं। करील से अचार, सूखे उत्पाद और दूसरे खाद्य पदार्थ तैयार कर इसे मूल्यवर्धित उत्पाद के रूप में बाजार तक पहुंचाने की संभावनाएं भी हैं। झारखंड की थाली में करील इस बात की मिसाल है कि यहां जंगल पीढ़ियों से भोजन और आजीविका का महत्वपूर्ण स्रोत रहे हैं। सब्जी, चटनी, अचार या रोटी के साथ परोसा जाने वाला बस करील आज भी राज्य की पारंपरिक खाद्य संस्कृति में अपनी खास पहचान बनाए हुए है।