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Trump Threatens Iran Amid Peace Talks

ट्रंप ने ईरान को दी खुली चेतावनी, कहा- लेबनान में प्रॉक्सी नहीं रोके तो होगा और भीषण हमला

Deepshikha जून 22, 2026 0
US President Donald Trump speaks as he issues a fresh warning to Iran amid ongoing peace talks in Switzerland.
Donald Trump Warns Iran During Switzerland Peace Talks

 

Donald Trump Iran Warning: मध्य पूर्व में शांति बहाली की कोशिशों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में अमेरिका, ईरान, पाकिस्तान और कतर के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत जारी है, लेकिन इसी दौरान ट्रंप ने ईरान को सीधे सैन्य कार्रवाई की चेतावनी देकर तनाव बढ़ा दिया है।

ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर दी धमकी

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक सख्त पोस्ट साझा करते हुए कहा कि ईरान को लेबनान में सक्रिय अपने समर्थित सशस्त्र गुटों और प्रॉक्सी संगठनों को तुरंत हिंसक गतिविधियां रोकने के लिए कहना चाहिए।

ट्रंप ने लिखा,
"यदि ईरान ने अपने भारी भुगतान पाने वाले प्रॉक्सी संगठनों को तबाही मचाने से नहीं रोका, तो अमेरिका फिर से बड़ा हमला करेगा। यह हमला पिछले सप्ताह की कार्रवाई से भी कहीं अधिक भीषण होगा।"

शांति वार्ता के बीच बढ़ा कूटनीतिक दबाव

ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है, जब स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के लिए महत्वपूर्ण वार्ता चल रही है। इस बैठक में पाकिस्तान और कतर मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं और परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा तथा आर्थिक प्रतिबंधों जैसे मुद्दों पर चर्चा हो रही है।

ट्रंप की नई चेतावनी ने इस शांति प्रक्रिया पर अनिश्चितता के बादल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति का यह बयान ईरान पर अतिरिक्त कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा है।

लेबनान में ईरान समर्थित गुटों को लेकर अमेरिका चिंतित

अमेरिका लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि ईरान लेबनान में सक्रिय अपने समर्थित संगठनों, विशेष रूप से हिज्बुल्लाह, के जरिए क्षेत्र में अस्थिरता पैदा करता है। वॉशिंगटन का मानना है कि इन संगठनों की गतिविधियां न केवल इजरायल बल्कि पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा के लिए चुनौती हैं।

ट्रंप ने अपने संदेश में स्पष्ट संकेत दिया कि यदि ईरान ने इन समूहों पर नियंत्रण नहीं किया, तो अमेरिका सैन्य विकल्प अपनाने से पीछे नहीं हटेगा।

वार्ता पर पड़ सकता है असर

विश्लेषकों का कहना है कि एक तरफ शांति वार्ता और दूसरी तरफ सैन्य कार्रवाई की खुली चेतावनी, दोनों मिलकर अमेरिका-ईरान संबंधों को और जटिल बना सकते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि ईरान ट्रंप की चेतावनी पर क्या प्रतिक्रिया देता है और क्या स्विट्जरलैंड में जारी वार्ता किसी ठोस समझौते तक पहुंच पाती है।

मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच ट्रंप का यह बयान एक बार फिर इस क्षेत्र की नाजुक स्थिति को उजागर करता है।

 

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Surbhi

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British PM resignation
ब्रिटिश PM स्टार्मर का इस्तीफा, 100 से ज्यादा सांसद विरोध में थे  7 साल में ब्रिटेन के पांचवें प्रधानमंत्री ने पद छोड़ा

लंदन, एजेंसियां। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने सोमवार को प्रधानमंत्री और लेबर पार्टी के नेता पद से इस्तीफा दे दिया है। 10 डाउनिंग स्ट्रीट के बाहर राष्ट्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि लेबर पार्टी को नहीं लगता कि मैं अगले चुनाव में नेतृत्व करने के लिए सही व्यक्ति हूं। स्टार्मर का इस्तीफा ऐसे समय आया है जब लेबर पार्टी के भीतर उनके नेतृत्व को लेकर असंतोष बढ़ रहा था। लेबर पार्टी के 400 सांसदों में से 100 से ज्यादा सांसदों ने अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। सांसदों का कहना था कि या तो स्टार्मर तुरंत प्रधानमंत्री का पद छोड़ें, या फिर यह तारीख तय करें कि वे किस दिन इस्तीफा देंगे। इनके अलावा स्वास्थ्य मंत्री वेस स्ट्रीटिंग, रक्षा मंत्री जॉन हीली और एक अन्य मंत्री जेस फिलिप्स ने स्टार्मर के इस्तीफे की मांग को लेकर पद छोड़ दिया था। 7 साल में 5 प्रधानमंत्रियों ने पद छोड़ा स्टार्मर पिछले 7 साल में कार्यकाल पूरा होने से पहले पद छोड़ने वाले पांचवें प्रधानमंत्री हैं। इससे पहले थेरेसा मे, बोरिस जॉनसन, लिज ट्रस और ऋषि सुनक ने पीएम पद से इस्तीफा दिया था। 17 जुलाई तक ब्रिटेन को नया प्रधानमंत्री मिलेगा स्टार्मर ने कहा कि लेबर पार्टी जुलाई के मध्य तक अपना नया नेता चुन लेगी। नए नेता और प्रधानमंत्री के चुने जाने तक वह अपने पद पर बने रहेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि वह अपने उत्तराधिकारी को पूरा सहयोग देंगे। स्टार्मर ने बताया कि उन्होंने सोमवार सुबह ब्रिटेन के किंग चार्ल्स III को अपने फैसले की जानकारी दे दी। अब लेबर पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारी समिति (NEC) नए नेता के चुनाव का कार्यक्रम तय करेगी। इसके तहत 9 जुलाई से नामांकन प्रक्रिया शुरू होगी और 17 जुलाई से शुरू होने वाले संसद के ग्रीष्मकालीन अवकाश से पहले नए नेता का चुनाव पूरा करने की कोशिश की जाएगी। ब्रिटेन में जनता सीधे प्रधानमंत्री नहीं चुनती। लोग अपने-अपने क्षेत्र से सांसद चुनते हैं। जिस पार्टी के पास संसद में बहुमत होता है, उसी पार्टी का नेता प्रधानमंत्री बनता है। अभी लेबर पार्टी की सरकार है। इसलिए जो व्यक्ति पार्टी का नया नेता बनेगा, वही प्रधानमंत्री बनने का सबसे बड़ा दावेदार होगा। इसके लिए पूरे देश में आम चुनाव कराने की जरूरत नहीं होती। स्टार्मर की जगह लेने के सबसे बड़े दावेदार बर्नहैम बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक एंडी बर्नहैम उनके उत्तराधिकारी बनने की दौड़ में सबसे आगे हैं। बर्नहैम ने हाल ही में मेकरफील्ड उपचुनाव जीतकर संसद में वापसी की है और उन्हें लेबर सांसदों के बड़े वर्ग का समर्थन है। वे ब्रिटेन की राजनीति में काफी लोकप्रिय चेहरा माने जाते हैं। उन्हें पार्टी के लेफ्ट और सेंट्रिस्ट दोनों गुटों का समर्थन हासिल है। बर्नहैम पहले स्वास्थ्य मंत्री समेत कई अहम सरकारी पद संभाल चुके हैं। कोविड महामारी के दौरान उन्होंने मैनचेस्टर के लिए केंद्र सरकार से खुलकर टक्कर ली थी। उस समय उनकी छवि आम लोगों के हितों के लिए लड़ने वाले नेता की बनी, जिससे उनकी लोकप्रियता बढ़ी। मेकरफील्ड उपचुनाव में जीत के बाद एंडी बर्नहैम की स्थिति और मजबूत हुई है। कई राजनीतिक जानकार मानते हैं कि वह स्टार्मर की जगह लेने के सबसे बड़े दावेदार हैं। अभी तक किसी ने उम्मीदवारी पेश नहीं की हालांकि अभी तक किसी उम्मीदवार ने आधिकारिक तौर पर अपनी दावेदारी पेश नहीं की है। पार्टी के दूसरे नेता भी मैदान में उतर सकते हैं। ऐसे में नेतृत्व का चुनाव मुकाबले वाला भी हो सकता है। लेबर पार्टी के सांसदों और कार्यकर्ताओं का रुख भी काफी अहम रहेगा। अगर बड़ी संख्या में नेता और सांसद बर्नहैम के समर्थन में आ जाते हैं, तो उन्हें बिना ज्यादा मुकाबले के नेता चुना जा सकता है। बर्नहैम सबसे आगे, लेकिन 3 बड़े नेता भी दौड़ मे बर्नहैम लेबर पार्टी के अलग-अलग गुटों में स्वीकार्य माने जाते हैं। वे अलग-अलग विचारधाराओं के बीच आसानी से खुद को फिट कर लेते हैं। समर्थक इसे उनकी ताकत मानते हैं, जबकि उनके आलोचकों का कहना है कि बर्नहम अक्सर अपने राजनीतिक रुख बदलते रहे हैं, जिससे यह साफ नहीं हो पाता कि वे किन विचारों पर मजबूती से कायम हैं। बर्नहम इससे पहले भी दो बार लेबर नेतृत्व चुनाव हार चुके हैं। 2010 में वह एड मिलिबैंड से हार गए थे और 2015 में जेरेमी कॉर्बिन से। हालांकि इस माना जा रहा है कि वे आसानी से लेबर नेतृत्व का चुनाव जीत लेंगे। एंजेला रेनर, यवेट कूपर और वेस स्ट्रीटिंग जैसे नाम भी संभावित दावेदारों में गिने जा रहे हैं। एंजेला रेनर फिलहाल लेबर पार्टी की उपनेता हैं और पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है। यवेट कूपर को अनुभवी नेता माना जाता है और उन्होंने कई अहम सरकारी पद संभाले हैं। वहीं वेस स्ट्रीटिंग पार्टी की नई पीढ़ी के नेताओं में शामिल हैं और हाल के वर्षों में उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है। स्टार्मर पर पद छोड़ने का दबाव क्यों बढ़ा स्टार्मर ने 2024 में लेबर पार्टी को बड़ी चुनावी जीत दिलाई थी, लेकिन उसके बाद उनकी लोकप्रियता लगातार घटी है। कई विवादों, नीतिगत यू-टर्न और जीवनस्तर में सुधार के वादों को पूरा नहीं कर पाने की वजह से उनकी इमेज को नुकसान पहुंचा। स्टार्मर की मुश्किलें तब और बढ़ गईं, जब उनके विरोधी एंडी बर्नहैम ने शुक्रवार को उपचुनाव जीत लिया। इस जीत के बाद बर्नहैम पार्टी की कमान संभालने की दावेदारी पेश कर सकते हैं। जीत के बाद बर्नहैम ने कहा कि वह देश को नई दिशा देना चाहते हैं। बर्नहैम के सहयोगी स्टार्मर से इस्तीफा देने की मांग कर रहे हैं। पूर्व स्वास्थ्य मंत्री वेस स्ट्रीटिंग ने भी संकेत दिया कि वह जरूरत पड़ने पर स्टार्मर को नेतृत्व के लिए चुनौती दे सकते हैं। हालांकि, स्टार्मर ने 19 जून को साफ कहा था कि मैं अपने नेतृत्व के खिलाफ आने वाली किसी भी चुनौती का सामना करूंगा। साथ ही लेबर पार्टी के नेताओं से आपसी खींचतान से बचने की अपील की थी।   ब्रिटेन को 7 साल में छठा प्रधानमंत्री मिलेगा 2016 में ब्रेक्जिट जनमत संग्रह में हार के बाद डेविड कैमरन ने इस्तीफा दिया था। उनके बाद प्रधानमंत्री बनीं थेरेसा मे संसद से ब्रेक्जिट समझौता पारित नहीं करा सकीं और 2019 में पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद बोरिस जॉनसन ने कोविड लॉकडाउन के दौरान सरकारी आवास पर हुई पार्टियों और कई राजनीतिक विवादों के बीच 2022 में इस्तीफा दिया। जॉनसन के बाद लिज ट्रस प्रधानमंत्री बनीं, लेकिन उनकी आर्थिक नीतियों से बाजार में भारी उथल-पुथल मच गई। वह सिर्फ 49 दिन ही पद पर रह सकीं और अक्टूबर 2022 में इस्तीफा देना पड़ा। उनके बाद ऋषि सुनक प्रधानमंत्री बने, लेकिन बढ़ती महंगाई और आर्थिक चुनौतियों की वजह से आम चुनाव में कंजर्वेटिव पार्टी की हार हुई, जिससे वे दोबारा प्रधानमंत्री नहीं बन सके। अब कीर स्टार्मर के इस्तीफे के साथ ब्रिटेन को सात साल में छठा और 10 साल में सातवां प्रधानमंत्री मिलने जा रहा है। प्रधानमंत्री बार-बार बदलने की वजह संसदीय व्यवस्था एक्सपर्ट्स के मुताबिक ब्रिटेन में प्रधानमंत्री बार-बार बदलने की बड़ी वजह वहां की संसदीय व्यवस्था है। वहां प्रधानमंत्री को लोग सीधे नहीं चुनते, बल्कि उनकी पार्टी के सांसद उनका समर्थन करते हैं। प्रधानमंत्री तब तक पद पर बने रहते हैं, जब तक पार्टी के सांसद उनके साथ खड़े हों। अगर सांसदों को लगने लगे कि किसी नेता की घटती लोकप्रियता से अगले चुनाव में पार्टी को नुकसान हो सकता है, तो वे बिना आम चुनाव कराए भी नया नेता चुनने की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं। यही वजह है कि ब्रिटेन में पार्टी का समर्थन कमजोर पड़ते ही प्रधानमंत्री बदलने की नौबत जल्दी आ जाती है। ब्रिटेन की बड़ी पार्टियों के नियम भी नेताओं को हटाने का रास्ता आसान बना देते हैं। कंजर्वेटिव पार्टी में अगर 15% सांसद किसी नेता के खिलाफ चिट्ठी लिख दें, तो उसके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है। वहीं, लेबर पार्टी में कोई दूसरा नेता तब दावेदारी पेश कर सकता है, जब उसे पार्टी के 20% से ज्यादा सांसदों और सदस्यों का समर्थन मिल जाए।

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Taiwanese coast guard vessels patrol regional waters as concerns grow over China’s hybrid warfare strategy in the Taiwan Strait.
अमेरिका-ईरान में शांति वार्ता के बीच चीन का नया पैंतरा, ताइवान के खिलाफ हाइब्रिड युद्ध की तैयारी में ड्रैगन

  ताइपे/बीजिंग: एक ओर स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने और मध्य पूर्व में शांति बहाल करने के लिए बातचीत जारी है, वहीं एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन ने ताइवान को लेकर नई रणनीति अपनानी शुरू कर दी है। ताइवान के एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी ने दावा किया है कि बीजिंग अब सीधे सैन्य टकराव के बजाय "हाइब्रिड युद्ध" (Hybrid Warfare) के जरिए ताइवान पर दबाव बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। ताइवान राष्ट्रीय सुरक्षा संस्थान के उप महासचिव हो चेंगहुई ने स्थानीय मीडिया से बातचीत में कहा कि चीन अपनी रणनीति में तटरक्षक बल, वैज्ञानिक अनुसंधान पोत, आर्थिक दबाव, दुष्प्रचार अभियान और मनोवैज्ञानिक रणनीतियों का इस्तेमाल कर रहा है। उनका कहना है कि बीजिंग बिना औपचारिक युद्ध छेड़े ताइवान की सुरक्षा और जनमत को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है। क्या होता है हाइब्रिड युद्ध? हाइब्रिड युद्ध ऐसी रणनीति है, जिसमें किसी देश पर दबाव बनाने के लिए सीधे सैन्य कार्रवाई के बजाय साइबर हमले, दुष्प्रचार, आर्थिक प्रतिबंध, राजनीतिक हस्तक्षेप, खुफिया अभियानों और कानूनी दावों जैसे गैर-पारंपरिक उपायों का इस्तेमाल किया जाता है। इसका उद्देश्य प्रतिद्वंद्वी देश को अंदर से कमजोर करना और अपने रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाना होता है। रूस-यूक्रेन और ईरान संघर्ष से सबक ले रहा चीन हो चेंगहुई के अनुसार, रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान से जुड़े हालिया घटनाक्रमों ने चीन को यह एहसास कराया है कि खुले युद्ध के जरिए राजनीतिक लक्ष्य हासिल करना कठिन और महंगा साबित हो सकता है। ऐसे में बीजिंग अब ऐसी रणनीतियों पर अधिक ध्यान दे रहा है, जो युद्ध की सीमा से नीचे रहकर भी प्रतिद्वंद्वी पर दबाव बना सकें। उन्होंने कहा कि चीन समुद्री दावों, तटरक्षक जहाजों की तैनाती और प्रचार अभियानों के माध्यम से ताइवान के साथ-साथ जापान और फिलीपींस जैसे क्षेत्रीय देशों पर भी कूटनीतिक दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। तटरक्षक बल बना चीन की नई रणनीति का हथियार ताइवान के सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि चीन का तटरक्षक बल उसकी हाइब्रिड रणनीति का सबसे अहम हिस्सा बन चुका है। चीनी जहाज विवादित समुद्री क्षेत्रों में लगातार गतिविधियां बढ़ा रहे हैं, जिससे अनिश्चितता और तनाव का माहौल पैदा हो रहा है। हो चेंगहुई ने ताइवान के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ), ताइवान स्ट्रेट की मध्य रेखा और किनमेन-मात्सु द्वीपों के आसपास के समुद्री इलाकों को भविष्य में चीनी गतिविधियों का संभावित केंद्र बताया है। फिलीपींस मॉडल अपनाने की सलाह ताइवान के सुरक्षा विशेषज्ञों ने सरकार को फिलीपींस की "पूर्ण पारदर्शिता नीति" अपनाने की सलाह दी है। उनके अनुसार, फिलीपींस ने चीनी समुद्री घुसपैठ की घटनाओं को सार्वजनिक कर और उनका दस्तावेजीकरण करके बीजिंग के दुष्प्रचार का प्रभावी मुकाबला किया है। उन्होंने सुझाव दिया कि ताइवान भी अपने बाहरी द्वीपों के आसपास तटरक्षक गश्त का लाइव प्रसारण शुरू कर सकता है। साथ ही जापान और फिलीपींस के साथ खुफिया जानकारी साझा करने, संयुक्त समुद्री निगरानी और कानून प्रवर्तन सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका-ईरान वार्ता के बीच चीन की यह नई रणनीति एशिया-प्रशांत क्षेत्र में एक नए प्रकार की भू-राजनीतिक चुनौती को जन्म दे सकती है, जहां सीधे युद्ध के बजाय हाइब्रिड रणनीतियां भविष्य की प्रतिस्पर्धा का प्रमुख माध्यम बन सकती हैं।  

Deepshikha जून 22, 2026 0
US Vice President JD Vance attends peace talks with Iranian delegates in Switzerland amid efforts to ease Middle East tensions.

अमेरिका ने ईरान के सामने रखी दोस्ती की बड़ी शर्त, मिडिल ईस्ट में शांति के लिए स्विट्जरलैंड में मंथन जारी

Bangladesh news update

बांग्लादेश में राम प्रतिमा निर्माण पर रोक, इस्लामिक कट्टरपंथी पर मानवाधिकार संगठन ने उठाए गंभीर सवाल

US President Donald Trump speaks as tensions rise over Iran and the strategic Strait of Hormuz during talks in Switzerland.

'होर्मुज बंद हुआ तो अपने देश नहीं लौट पाओगे', ट्रंप की चेतावनी से बढ़ा अमेरिका-ईरान तनाव

Pakistan Defence Minister Khawaja Asif addresses the media amid rising tensions over the Indus Waters Treaty with India.
पानी को लेकर भारत को युद्ध की धमकी, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के बयान से बढ़ा तनाव

  इस्लामाबाद/नई दिल्ली: सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने पानी के मुद्दे को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए भारत के खिलाफ युद्ध की चेतावनी दी है। उनका बयान ऐसे समय आया है, जब भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि सिंधु जल संधि को निलंबित रखने के अपने फैसले में फिलहाल कोई बदलाव नहीं होगा। पानी के लिए युद्ध की चेतावनी पाकिस्तानी न्यूज चैनल ARY से बातचीत में रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि यदि पाकिस्तान की जल सुरक्षा को खतरा महसूस हुआ तो देश भारत के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के विकल्प पर विचार कर सकता है। उन्होंने कहा, "पानी हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा है। अगर हमें लगा कि भारत हमारी जल आपूर्ति को रोकने या प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है, तो हम युद्ध का रास्ता भी अपना सकते हैं।" ख्वाजा आसिफ ने यह भी दावा किया कि यदि इस्लामाबाद को ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि भारत पाकिस्तान के हिस्से के पानी को रोकने की दिशा में कदम उठा रहा है, तो पाकिस्तान उचित जवाब देने के लिए तैयार रहेगा। भारत ने सिंधु जल संधि निलंबित रखने का फैसला बरकरार रखा भारत ने वर्ष 1960 की सिंधु जल संधि को निलंबित रखने के अपने फैसले पर सख्त रुख कायम रखा है। नई दिल्ली का कहना है कि अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले, जिसमें 26 लोगों की मौत हुई थी, के बाद यह कदम उठाया गया। भारत ने स्पष्ट किया है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के ढांचे को खत्म करने के लिए ठोस, विश्वसनीय और स्थायी कार्रवाई नहीं करता, तब तक संधि की बहाली पर विचार नहीं किया जाएगा। पाकिस्तान की कृषि व्यवस्था के लिए अहम है सिंधु जल संधि विश्व बैंक की मध्यस्थता में 1960 में हुई सिंधु जल संधि के तहत पाकिस्तान को सिंधु नदी प्रणाली के लगभग 80 प्रतिशत जल के उपयोग का अधिकार प्राप्त है। यह पानी पाकिस्तान की कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, क्योंकि देश की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है। कई जल विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान में मौजूदा जल संकट केवल बाहरी कारणों का परिणाम नहीं है। खराब जल प्रबंधन, जल संरक्षण की कमी, पुरानी सिंचाई व्यवस्था और नीतिगत कमजोरियां भी संकट को गंभीर बनाने के लिए जिम्मेदार हैं। पाकिस्तान में गहराता जल संकट पाकिस्तान इस समय गंभीर जल संकट, आर्थिक चुनौतियों और आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि देश के कई कृषि क्षेत्रों में जल संसाधनों का समुचित प्रबंधन नहीं होने के कारण पानी की उपलब्धता लगातार घट रही है। ऐसे में ख्वाजा आसिफ का बयान भारत-पाक संबंधों में नई तल्खी पैदा कर सकता है और सिंधु जल संधि को लेकर कूटनीतिक विवाद को और गहरा सकता है।  

Deepshikha जून 22, 2026 0
Iranian and American delegations at the Bürgenstock resort in Switzerland amid tense nuclear and regional security talks.

कैमरे चलते रहे, ईरानी प्रतिनिधिमंडल उठकर चला गया; जेडी वेंस देखते रह गए, स्विट्जरलैंड वार्ता की शुरुआत में बढ़ा तनाव

French police display a recovered Pablo Picasso painting seized during a drug trafficking raid near Paris.

ड्रग तस्करों पर छापेमारी में मिली पिकासो की दुर्लभ पेंटिंग, फ्रांसीसी पुलिस भी रह गई हैरान

US Vice President JD Vance arrives in Switzerland for talks with Iranian officials on nuclear issues and regional security.

स्विट्जरलैंड पहुंचे जेडी वेंस, ईरान को मिल सकता है 6 अरब डॉलर का फंड; परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज पर होगी अहम वार्ता

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Deepshikha जून 15, 2026 0

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