कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है। Mamata Banerjee के नेतृत्व वाली All India Trinamool Congress (टीएमसी) के 20 बागी सांसदों ने पार्टी से अलग होकर Nationalist Citizens Party of India (एनसीपीआई) में विलय का ऐलान कर दिया है। इतना ही नहीं, बागी गुट अब तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिह्न 'जोड़ाफूल' (दो फूल) पर भी दावा करने की तैयारी में है।
तृणमूल के बागी सांसद Arup Chakraborty ने सोमवार को दावा किया कि उन्होंने पार्टी नहीं छोड़ी है, बल्कि पार्टी को "सुधारने" की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा, "एक नया खेल शुरू हो गया है… खेला होबे।"
अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि बागी सांसद ही असली तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनके पास पार्टी के 20 सांसदों का समर्थन है।
उन्होंने कहा,
"हमने तृणमूल नहीं छोड़ी है। हम तृणमूल में ही हैं और पार्टी को ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं। पार्टी को नुकसान क्यों पहुंचा, इस पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। हमारे पास 20 सांसद हैं, इसलिए हम चुनाव चिह्न के लिए कानूनी लड़ाई लड़ेंगे।"
उन्होंने यह भी दावा किया कि इस राजनीतिक बदलाव से पश्चिम बंगाल में विकास और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि ममता बनर्जी डरी हुई हैं और पार्टी की बैठक तक बुलाने की स्थिति में नहीं हैं।
उन्होंने आरोप लगाया,
"ममता बनर्जी चुनाव से पहले अपने क्षेत्र में एक बैठक भी नहीं कर सकीं। पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक चर्चा समाप्त हो चुकी है।"
रविवार को बागी सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने Om Birla से मुलाकात कर सदन में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की। सांसदों ने घोषणा की कि वे एनसीपीआई में विलय कर चुके हैं और एक अलग संसदीय समूह के रूप में मान्यता चाहते हैं।
एनसीपीआई एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है, जिसने वर्ष 2023 में त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में हिस्सा लिया था।
तृणमूल कांग्रेस ने बागी सांसदों के कदम को संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत अवैध बताया है।
Sagarika Ghose ने कहा कि केवल सांसदों के समूह का अलग होना पर्याप्त नहीं है।
उन्होंने कहा,
"दलबदल विरोधी कानून के तहत पहले संसद के बाहर मौजूद पूरी राजनीतिक पार्टी का विलय या विभाजन होना चाहिए। केवल सांसदों का समूह अलग होकर किसी अन्य पार्टी में शामिल नहीं हो सकता।"
तृणमूल के वरिष्ठ नेता Sougata Roy ने कहा कि असली तृणमूल कांग्रेस वही है, जिसकी अध्यक्ष ममता बनर्जी हैं और जिसका चुनाव चिह्न 'जोड़ाफूल' है।
उन्होंने आरोप लगाया कि बागी सांसदों ने मतदाताओं के साथ विश्वासघात किया है।
सौगत रॉय ने कहा,
"तृणमूल के टिकट पर जीतकर सांसद बने लोगों ने एक अज्ञात पार्टी में शामिल होकर एनडीए का समर्थन करने का फैसला किया है। यह जनता के जनादेश के साथ धोखा है।"
छह बार के सांसद Sudip Bandyopadhyay भी बागी गुट में शामिल हो गए हैं। उन्होंने दावा किया कि बागी समूह ही असली तृणमूल कांग्रेस है और वह चुनाव चिह्न तथा पार्टी की मान्यता के लिए कानूनी लड़ाई लड़ेगा।
तृणमूल पर नियंत्रण की लड़ाई केवल संसद तक सीमित नहीं है। हाल ही में पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी पार्टी के 80 में से 64 विधायकों ने अलग समूह के रूप में मान्यता हासिल करने का दावा किया है। इससे संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति में बड़ा पुनर्संयोजन देखने को मिल सकता है।
राजनीतिक और कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, किसी राजनीतिक दल का चुनाव चिह्न तभी दूसरे गुट को मिल सकता है जब पार्टी में वास्तविक विभाजन, संगठनात्मक समर्थन और निर्वाचन आयोग के समक्ष पर्याप्त कानूनी आधार साबित हो। इसलिए बागी सांसदों के दावे के बावजूद अंतिम फैसला Election Commission of India और न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
फिलहाल इतना तय है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर शुरू हुआ यह नया 'खेला' पश्चिम बंगाल की राजनीति को आने वाले महीनों में पूरी तरह बदल सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
चेन्नई, एजेंसियां। तमिलनाडु में कावेरी जल विवाद को लेकर आयोजित एक रैली के दौरान डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन की अभिनेत्री तृषा को लेकर की गई कथित टिप्पणी पर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद विपक्षी दलों तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने डीएमके पर तीखा हमला बोला है और टिप्पणी को अनुचित बताते हुए कार्रवाई की मांग की है। रैली के दौरान हुई विवादित टिप्पणी तंजावुर में कावेरी जल विवाद पर आयोजित रैली में उदयनिधि स्टालिन मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की आलोचना कर रहे थे। इसी दौरान भीड़ से अभिनेत्री तृषा के नाम के नारे लगाए गए। वायरल वीडियो के अनुसार, उदयनिधि ने इस पर मुस्कुराते हुए एक टिप्पणी की, जिसे सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री विजय और अभिनेत्री तृषा को लेकर चल रही चर्चाओं से जोड़कर देखा गया। हालांकि, बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका इशारा केवल कावेरी के पानी की ओर था। TVK ने जताई कड़ी आपत्ति TVK विधायक रेवंत चरण ने उदयनिधि की टिप्पणी को आपत्तिजनक और अस्वीकार्य बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि डीएमके राजनीतिक संवाद का स्तर गिरा रही है और ध्यान भटकाने के लिए उकसावे वाली राजनीति कर रही है। रेवंत चरण का कहना है कि कावेरी मुद्दे पर आयोजित प्रदर्शन को अपेक्षित जनसमर्थन नहीं मिला, इसलिए विवादित बयान देकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जा रही है। BJP ने गिरफ्तारी की मांग की तमिलनाडु भाजपा ने भी इस बयान की कड़ी आलोचना की है। पार्टी के प्रवक्ता नारायणन तिरुपति ने टिप्पणी को अशोभनीय और अभद्र बताते हुए उदयनिधि स्टालिन की गिरफ्तारी की मांग की। उन्होंने डीएमके नेतृत्व और पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की चुप्पी पर भी सवाल उठाए। कावेरी विवाद के बीच बढ़ा राजनीतिक तनाव यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब तमिलनाडु सरकार ने कावेरी जल विवाद को लेकर कर्नाटक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। राज्य सरकार का आरोप है कि कर्नाटक, कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) के निर्देशों के बावजूद तमिलनाडु के हिस्से का निर्धारित पानी नहीं छोड़ रहा है। तमिलनाडु सरकार ने अपनी याचिका में कहा है कि कई बार निर्देश दिए जाने के बावजूद कर्नाटक ने तय मात्रा में पानी जारी नहीं किया, जिससे राज्य के किसानों और सिंचाई व्यवस्था पर असर पड़ रहा है। सोशल मीडिया पर जारी बहस उदयनिधि स्टालिन की कथित टिप्पणी का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इसे लेकर राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है, जबकि डीएमके की ओर से अब तक इस विवाद पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने E20 पेट्रोल नीति के खिलाफ आंदोलन तेज करने का ऐलान किया है। केजरीवाल ने कहा कि वह 4 अगस्त को दोपहर 12 बजे 100 ऐसे लोगों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास की ओर पैदल मार्च करेंगे, जो लाठीचार्ज से नहीं डरते। इस दौरान वह E20 नीति के विरोध में दो लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर वाली याचिका प्रधानमंत्री को सौंपने की कोशिश करेंगे। E20 नीति के खिलाफ केजरीवाल का प्रदर्शन केजरीवाल ने यह घोषणा नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में आयोजित ‘नेशनल टाउन हॉल अगेंस्ट E20’ कार्यक्रम के दौरान की। उन्होंने E20 ईंधन को लेकर केंद्र सरकार की नीति पर सवाल उठाए और उपभोक्ताओं के हित में बदलाव की मांग की। उन्होंने कहा कि इस मार्च में बड़ी भीड़ जुटाने के बजाय वह केवल 100 लोगों को साथ लेकर जाएंगे। उनके मुताबिक ये ऐसे लोग होंगे जो लाठीचार्ज से नहीं डरते। प्रधानमंत्री को सौंपेंगे 2 लाख से ज्यादा हस्ताक्षर केजरीवाल के अनुसार, E20 नीति के खिलाफ ऑनलाइन याचिका पर दो लाख से ज्यादा लोगों ने हस्ताक्षर किए हैं। वह इन हस्ताक्षरों की प्रति प्रधानमंत्री को सौंपकर इस मुद्दे पर जनता की चिंताओं से अवगत कराने की कोशिश करेंगे। AAP का कहना है कि E20 को लेकर उपभोक्ताओं को अपनी पसंद का विकल्प मिलना चाहिए और पेट्रोल पंपों पर सामान्य पेट्रोल तथा E20 के बीच चुनाव की सुविधा होनी चाहिए। E20 पर केजरीवाल की प्रमुख मांगें केजरीवाल ने E20 पेट्रोल को लेकर सरकार से कई बदलावों की मांग की है। इनमें उपभोक्ताओं को सामान्य पेट्रोल या E20 में से चुनाव का विकल्प देना प्रमुख मांग है। उनका आरोप है कि E20 नीति को पर्याप्त परामर्श के बिना लागू किया गया है और इससे वाहन मालिकों पर आर्थिक असर पड़ सकता है। हालांकि, E20 समर्थक नीति का उद्देश्य पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घटाना, इथेनॉल के इस्तेमाल को बढ़ावा देना और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करना बताते हैं। E20 को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस लगातार तेज हो रही है।
कर्नाटक दौरे पर मुख्यमंत्री विजय की योजना के बीच DMK ने विरोध प्रदर्शन का ऐलान, दोनों दलों में बयानबाज़ी तेज चेन्नई, एजेंसियां। तमिलनाडु की सियासत में सत्तारूढ़ तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) और विपक्षी द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) के बीच टकराव और तेज हो गया है। विवाद की वजह मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय (TVK) का प्रस्तावित कर्नाटक दौरा और मेकेदातु बांध परियोजना को लेकर दोनों दलों के अलग-अलग रुख हैं। DMK ने किया विरोध प्रदर्शन का ऐलान DMK ने 3 अगस्त को तंजावुर में बड़े विरोध प्रदर्शन की घोषणा की है। पार्टी का आरोप है कि मुख्यमंत्री विजय का कर्नाटक दौरा ऐसे समय हो रहा है जब मेकेदातु परियोजना तमिलनाडु के जल हितों के लिए गंभीर मुद्दा बनी हुई है। DMK नेताओं ने कहा कि राज्य के जल अधिकारों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। TVK ने आरोपों को बताया राजनीतिक TVK सरकार ने DMK के आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया है। सरकार का कहना है कि मुख्यमंत्री विजय का दौरा दोनों राज्यों के बीच संवाद बढ़ाने और लंबित मुद्दों का समाधान तलाशने के उद्देश्य से प्रस्तावित है। TVK ने स्पष्ट किया कि तमिलनाडु के जल अधिकारों की रक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। सियासी माहौल हुआ गर्म हाल के दिनों में स्वास्थ्य, जल और प्रशासनिक मुद्दों को लेकर TVK और DMK लगातार एक-दूसरे पर हमलावर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मेकेदातु विवाद ने दोनों दलों के बीच टकराव को और तेज कर दिया है तथा आने वाले दिनों में यह मुद्दा तमिलनाडु की राजनीति के केंद्र में रह सकता है।