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Trump Claims US-Iran Peace Deal Reached

अमेरिका-ईरान शांति समझौते का दावा, 19 जून को स्विट्जरलैंड में हो सकते हैं हस्ताक्षर; होर्मुज स्ट्रेट खोलने का ऐलान

Deepshikha जून 15, 2026 0
Donald Trump and Iranian officials amid reports of a potential US-Iran peace deal and reopening of the Strait of Hormuz.
Iran Peace Deal and Hormuz Strait Reopening

 

वॉशिंगटन/तेहरान: पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की खबरों ने वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजारों में हलचल बढ़ा दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दावा किया है कि दोनों देशों के बीच शांति समझौते पर सहमति बन गई है। वहीं, ईरान की ओर से भी इस दिशा में सकारात्मक संकेत दिए गए हैं।

ट्रंप ने होर्मुज स्ट्रेट खोलने का किया ऐलान

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर लिखा कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता पूरा हो चुका है। उन्होंने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) को फिर से खोलने और अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की घोषणा की।

ट्रंप ने लिखा, "इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के साथ समझौता अब पूरा हो चुका है। सभी को बधाई। दुनिया के जहाज अब अपने इंजन शुरू करें, तेल का प्रवाह जारी रहने दें।"

ईरान ने रखी अपनी शर्तें

ईरान के कानूनी एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा कि तेहरान प्रस्तावित 60 दिन की वार्ता प्रक्रिया में तभी शामिल होगा, जब अमेरिका युद्ध समाप्त करने, नाकेबंदी हटाने और ईरानी संपत्तियों को मुक्त करने जैसे अपने वादों को पूरा करेगा।

उन्होंने कहा कि समझौते का अर्थ यह नहीं है कि ईरान अमेरिका पर पूरी तरह भरोसा कर रहा है। तेहरान अमेरिकी प्रतिबद्धताओं के क्रियान्वयन की लगातार निगरानी करेगा।

शहबाज शरीफ ने भी किया समझौते का दावा

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दावा किया कि लंबी बातचीत और गहन वार्ताओं के बाद अमेरिका और ईरान शांति समझौते पर सहमत हो गए हैं। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों ने लेबनान समेत विभिन्न मोर्चों पर सैन्य गतिविधियों को तत्काल और स्थायी रूप से समाप्त करने का निर्णय लिया है।

शरीफ के अनुसार, समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर 19 जून को स्विट्जरलैंड में किए जा सकते हैं।

कतर, सऊदी अरब और तुर्किये की भूमिका अहम

शहबाज शरीफ ने इस मध्यस्थता प्रक्रिया में कतर, सऊदी अरब और तुर्किये की भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि इन देशों के कूटनीतिक प्रयासों ने दोनों पक्षों को बातचीत की मेज तक लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

परमाणु कार्यक्रम पर भी रहेगा फोकस

डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि प्रस्तावित समझौते के तहत ईरान के परमाणु कार्यक्रम की निगरानी को और मजबूत किया जाएगा। इसमें निरीक्षण व्यवस्था को सख्त करने तथा परमाणु सामग्री के प्रबंधन से जुड़े प्रावधान शामिल किए जा सकते हैं।

वैश्विक ऊर्जा बाजार की नजरें समझौते पर

यदि 19 जून को प्रस्तावित हस्ताक्षर होते हैं और होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह खुलता है, तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल आपूर्ति और ऊर्जा बाजारों पर पड़ सकता है। पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की स्थिति में कच्चे तेल की कीमतों में भी राहत देखने को मिल सकती है।

अमेरिका, ईरान और अन्य संबंधित पक्षों की ओर से समझौते के अंतिम दस्तावेज और आधिकारिक विवरण सार्वजनिक होने का इंतजार किया जा रहा है।

 

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हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

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लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Surbhi

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Taiwan human rights activist Lee Ming-che raises concerns over China's summer camp for Taiwanese students
ताइवान के छात्रों के लिए चीन का समर कैंप सवालों के घेरे में, मानवाधिकार कार्यकर्ता ने जताई AI डीपफेक और ब्लैकमेल की आशंका

China Summer Camp: चीन द्वारा ताइवान के छात्रों के लिए आयोजित किए जा रहे कम लागत वाले समर कैंप को लेकर नए विवाद खड़े हो गए हैं। ताइवान के मानवाधिकार कार्यकर्ता ली मिंग-चे ने आरोप लगाया है कि यह कैंप सांस्कृतिक आदान-प्रदान के बजाय चीन के राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने का माध्यम है। उन्होंने आशंका जताई कि छात्रों की निजी जानकारी का इस्तेमाल AI डीपफेक तकनीक के जरिए ब्लैकमेल करने के लिए किया जा सकता है। कम लागत वाले समर कैंप पर उठे सवाल समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, चीन ताइवान के छात्रों के लिए एक विशेष समर कैंप आयोजित कर रहा है, जिसमें यात्रा, होटल और भोजन की लागत बेहद कम रखी गई है ताकि अधिक से अधिक छात्र इसमें हिस्सा लें। हालांकि, ली मिंग-चे का आरोप है कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य सांस्कृतिक आदान-प्रदान नहीं, बल्कि ताइवान के युवाओं को चीन के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करने और उन पर राजनीतिक प्रभाव डालने का प्रयास है। छात्रों से ली जा रही निजी जानकारी ली मिंग-चे ने दावा किया कि कैंप के दौरान छात्रों से मोबाइल नंबर और अन्य व्यक्तिगत जानकारियां एकत्र की जा रही हैं। उनके अनुसार, इन जानकारियों का इस्तेमाल बाद में छात्रों को चीन समर्थक प्रचार सामग्री, वीडियो और संदेश भेजने के लिए किया जा सकता है। AI डीपफेक से ब्लैकमेल की आशंका मानवाधिकार कार्यकर्ता ने सबसे बड़ी चिंता AI डीपफेक तकनीक को लेकर जताई। उनका कहना है कि छात्रों की तस्वीरों और व्यक्तिगत जानकारी का उपयोग कर फर्जी या आपत्तिजनक वीडियो तैयार किए जा सकते हैं। उन्होंने आशंका व्यक्त की कि ताइवान लौटने के बाद ऐसे वीडियो दिखाकर छात्रों पर दबाव बनाया जा सकता है और उन्हें चीन के पक्ष में काम करने के लिए ब्लैकमेल किया जा सकता है। पांच साल चीन की जेल में रह चुके हैं ली मिंग-चे रिपोर्ट के अनुसार, ली मिंग-चे स्वयं पांच वर्ष तक चीन की जेल में रह चुके हैं और वर्ष 2022 में रिहा होकर ताइवान लौटे थे। उनका कहना है कि इस तरह के समर कैंप चीन की राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा हैं और इन्हें केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। चीन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं फिलहाल चीन की ओर से ली मिंग-चे के आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं, ताइवान में इस मुद्दे को लेकर सुरक्षा और गोपनीयता से जुड़ी चिंताएं बढ़ गई हैं, खासकर AI और डिजिटल तकनीक के संभावित दुरुपयोग को लेकर।  

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Donald Trump 2028 Strategy: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नजर अब केवल आगामी मिडटर्म चुनावों पर नहीं, बल्कि 2028 के राष्ट्रपति चुनाव पर भी है। रिपोर्टों के मुताबिक, ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी के भविष्य और अगले राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के चयन में निर्णायक भूमिका निभाना चाहते हैं। उनका लक्ष्य पार्टी पर अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखना और अपनी विरासत को आगे बढ़ाना है। 2028 के लिए अभी से रणनीति तैयार समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, ट्रंप की प्राथमिकता रिपब्लिकन पार्टी के अगले राष्ट्रपति उम्मीदवार के चयन में प्रभावी भूमिका निभाना है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वह अपनी राजनीतिक विरासत को किसी अन्य नेता के हाथों आसानी से छोड़ने के पक्ष में नहीं हैं और पार्टी की भविष्य की दिशा तय करने में सक्रिय रहना चाहते हैं। मिडटर्म चुनाव भी अहम ट्रंप चाहते हैं कि रिपब्लिकन पार्टी प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) और सीनेट दोनों में मजबूत प्रदर्शन करे। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि यदि डेमोक्रेटिक पार्टी कांग्रेस में बढ़त हासिल करती है, तो ट्रंप प्रशासन को अधिक राजनीतिक और संसदीय चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। जांच और टकराव की संभावना रिपोर्ट के अनुसार, यदि डेमोक्रेट्स कांग्रेस पर नियंत्रण हासिल करते हैं, तो ट्रंप के परिवार, कारोबारी गतिविधियों और प्रशासनिक फैसलों की जांच तेज हो सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे हालात में व्हाइट हाउस और कांग्रेस के बीच संवैधानिक टकराव की स्थिति भी बन सकती है। पार्टी पर पकड़ मजबूत करने की कोशिश अगर रिपब्लिकन पार्टी सीनेट में बहुमत बनाए रखती है और प्रतिनिधि सभा में भी बेहतर प्रदर्शन करती है, तो ट्रंप समर्थक नेताओं का प्रभाव और बढ़ सकता है। इससे पार्टी के भीतर ट्रंप की स्थिति और मजबूत होने की संभावना जताई जा रही है। वेंस और रुबियो पर नजर रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप भविष्य में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो जैसे नेताओं को पार्टी के प्रमुख चेहरों के रूप में आगे बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं। माना जा रहा है कि 2028 के संभावित रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए ट्रंप का समर्थन बेहद महत्वपूर्ण रहेगा। 2028 की तैयारी अभी से राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की रणनीति केवल वर्तमान कार्यकाल तक सीमित नहीं है। उनका फोकस रिपब्लिकन पार्टी के भविष्य, नेतृत्व और 2028 के राष्ट्रपति चुनाव में अपनी निर्णायक भूमिका सुनिश्चित करने पर है। फिलहाल, यह रिपोर्ट राजनीतिक विश्लेषणों और सलाहकारों के हवाले से सामने आई है, जबकि ट्रंप की ओर से इस रणनीति पर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।  

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भारत समेत 60 देशों पर ट्रंप के टैरिफ को अदालत में चुनौती, 25 अमेरिकी राज्यों ने दायर किया मुकदमा

Trump Tariff News: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत समेत 60 व्यापारिक साझेदार देशों पर लगाए गए नए टैरिफ के खिलाफ कानूनी विवाद गहरा गया है। 25 डेमोक्रेटिक नेतृत्व वाले अमेरिकी राज्यों ने ट्रंप प्रशासन के इस फैसले को अदालत में चुनौती देते हुए कहा है कि यह कदम कानून की तय सीमाओं से बाहर है। 25 राज्यों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया सोमवार (3 अगस्त) को न्यूयॉर्क स्थित अमेरिकी कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में दायर याचिका में भारत सहित 60 देशों से आयात होने वाले उत्पादों पर लगाए गए 10% से 12.5% तक के नए टैरिफ को चुनौती दी गई है। ये शुल्क 1974 के ट्रेड एक्ट के सेक्शन 301 के तहत लगाए गए हैं। राज्यों का आरोप है कि ट्रंप प्रशासन पहले अदालत द्वारा सवाल उठाए जा चुके व्यापक आयात शुल्कों को अब नए कानूनी आधार के जरिए दोबारा लागू करने की कोशिश कर रहा है। याचिका में क्या कहा गया? ओरेगन, न्यूयॉर्क समेत 25 राज्यों की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि सेक्शन 301 का उद्देश्य उन देशों या उद्योगों के खिलाफ कार्रवाई करना था, जिन पर अनुचित व्यापार (Unfair Trade Practices) का आरोप हो। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस प्रावधान का इस्तेमाल लगभग सभी देशों से आने वाले सामान पर व्यापक टैरिफ लगाने के लिए नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि ट्रंप प्रशासन इस कानून की मूल भावना से आगे बढ़कर कार्रवाई कर रहा है। पहले भी घिर चुकी है ट्रंप की टैरिफ नीति यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप की टैरिफ नीति कानूनी चुनौती का सामना कर रही है। इससे पहले भी अमेरिकी अदालतें उनके कई आयात शुल्क संबंधी फैसलों पर सवाल उठा चुकी हैं। हालांकि, कानूनी चुनौतियों के बावजूद ट्रंप प्रशासन लगातार अपनी संरक्षणवादी व्यापार नीति को आगे बढ़ाता रहा है। भारत समेत कई देशों पर असर नए टैरिफ का असर भारत सहित 60 व्यापारिक साझेदार देशों से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर पड़ सकता है। यदि अदालत इस मामले में राज्यों के पक्ष में फैसला देती है, तो ट्रंप प्रशासन की नई टैरिफ नीति को बड़ा झटका लग सकता है। वहीं, यदि नीति बरकरार रहती है, तो इससे वैश्विक व्यापार और अमेरिका के प्रमुख साझेदार देशों के साथ व्यापारिक संबंधों पर भी असर पड़ने की संभावना है।  

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